जातिगत आरक्षण ने हमेशा प्रतिभा को कुचला है, किसका भला हुआ है इससे, देश का? बिलकुल नहीं

आज की वर्तमान परिस्थिति में हमारा देश दो हिस्सों में बँट गया है. एक हिस्सा जो आरक्षण को वरदान मानता है और दूसरा हिस्सा जो आरक्षण को अभिशाप मानता है. क्यों है ऐसा, हमने कभी सोचने की कोशिश नहीं की है अब तक.

वरदान- आज के दलित (जो वास्तव में सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गए हैं) आरक्षण को वरदान मानते हैं.
अभिशाप- पढ़े लिखे प्रगतिशील युवा, चाहे वो दलित हो या सवर्ण, आरक्षण को अभिशाप मानते हैं.

आरक्षण के अगर लाभकारी गुण हैं तो इसके अनेक दुष्परिणाम भी हैं.

आरक्षण का प्रयोजन संविधान के निर्माण एवं देश की स्वतंत्रता के पश्चात् सिर्फ १० सालों के लिए था. परंतु, भ्रष्टाचारी राजनेताओं एवं सरकारों ने आरक्षण को वोट बैंक की पालिसी बना कर देश के विकास को बाधित किया है.

भारत देश के संविधान में समता का अधिकार दिया गया है हरेक भारतवासी को, परंतु आरक्षण उस अधिकार के साथ सिवाय एक भद्दे मजाक से ज्यादा कुछ भी नहीं है. आये दिन समाचार पत्रों में हिन्दू मुस्लिम वैमनस्यता के साथ साथ सवर्ण और दलित वैमनस्यता के समाचार पढ़ने को मिलते हैं. कभी किसी भी राजनैतिक दल अथवा सरकार के प्रतिनिधियों ने इस का मूल कारण जानने की न कोशिश करी है और न ही करेंगे. जातिगत आरक्षण आपसी भेदभाव को मिटने का नहीं अपितु भेदभाव बढ़ाने का मूल मंत्र है, जिसका इस्तेमाल राजनैतिक पार्टी अपने वोटबैंक को मजबूत करने के लिए करती हैं.

भारत की एक बहुत बड़ी आबादी को मुफ्त का हर चीज पा लेने में ख़ुशी मिलती है, परंतु उस वर्ग या समाज ने कभी ये नहीं सोचा की ये मुफ्त की आदत बुरी है या अच्छी. मित्रों, अब समय आ गया है की जातिगत भावना या दुर्भावना एवं साम्प्रदायिकता से ऊपर उठ कर देश तथा अपने भारतीय समाज को एक करने एवं मजबूत करने के लिए सही प्रयास करें. आज हिंदुस्तान चार अलग प्रान्तों में बँट गया है- हिन्दू, मुस्लिम, सवर्ण एवं दलित.

आरक्षण ने हमेशा प्रतिभा को कुचला है, किसका भला हुआ है इससे, देश का, बिलकुल नहीं.

समता का अधिकार मतलब आरक्षण बिलकुल नहीं है. मित्रों, समता का अधिकार का मतलब है- सर्वधर्म समभाव, सर्वजन समभाव.

हर व्यक्ति को उसके विकास के उचित अवसर के साथ उचित साधन उपलब्ध कराना ही समता का अधिकार की विवेचना है. न की आरक्षण देकर किसी एक वर्ग के बुद्धिमत्ता को कुचल कर दूसरे वर्ग के बुद्धिमत्ता को विकसित होने से रोक देना.

मैं आरक्षण पर दो विकल्प के बारे में सोचता हूँ- अगर देश के विकास के लिए आरक्षण सचमुच सहायक है तो इसे जातिगत न रखकर आर्थिक स्थिति के आधार पर प्रयोग में लाया जाय अथवा आरक्षण को पूर्ण रूपेण समाप्त कर दिया जाय एवं देश के हर नागरिक को उचित अवसर के साथ साथ साधन उपलब्ध कराये जाएँ ताकि देश में प्रतिभा को सम्मान मिले एवं सभी जाति एवं समुदाय के बिच नफरत की दीवार को गिरा कर भाईचारा की भावना को मजबूत किया जा सके.

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