खालिश हिंदी के नाम पर त्रिभाषी साइनबोर्ड का विरोध

वर्ष 2011 से बेंगलुरु में मेट्रो ट्रेन पटरियों पर दौड़ रही है, जिसे नम्‍मा मेट्रो के नाम से जाना जाता है। हाल ही में जब बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने त्रिभाषा नीति का पालन करते हुए अपने स्‍टेशनों के साइनबोर्डों को कन्‍नड़, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में लिखवाया तो बहुत से अंग्रेजीदां लोग इसके विरोध में उतर आए और इस मुद्दे को ट्वीटर पर ट्रोल किया जाने लगा। इसके लिए तर्क यह दिया जा रहा है कि हिंदी भारत की राष्‍ट्रभाषा नहीं है इसलिए साइनबोर्ड पर केवल अंग्रेजी एवं कन्‍नड़ में ही लिखा जाए। यह तो हास्‍यास्‍दपद तर्क है क्‍योंकि अंग्रेजी भी भारत की राष्‍ट्रभाषा नहीं है तो फिर अंग्रेजी के लिए कैकई-विलाप किस बात के लिए किया जा रहा है। तर्क देने वाले तो यह भी तर्क देते हैं कि अंग्रेजी अंतर्राष्‍ट्रीय भाषा है इसलिए इसे साइनबोर्ड पर जगह मिलनी चाहिए, मगर वे ये भूल जाते हैं कि बेंगलूरु में केवल विदेशी नहीं भारत के विभिन्‍न प्रातों से आए स्‍वदेशी लोग भी रहते हैं।

नम्‍मा मेट्रो का संचालन केंद्र सरकार एवं राज्‍य सरकार मिलकर कर रही हैं। बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड में केंद्र सरकार एवं राज्‍य सरकार का स्‍टेक 50-50 प्रतिशत है। कार्पोरेशन के बोर्ड में दोनों ही सरकारों की ओर से पॉंच-पॉंच निदेशक नियुक्‍त किए गए हैं। भारत की राजभाषा हिंदी है तथा कर्नाटक की राजभाषा कन्‍नड़, इस द्ष्टिकोण से मेट्रोरेल के साइनबोर्ड पर कन्‍नड़ एवं हिंदी का प्रयोग किया जाना विधिसम्‍मत है।

दूसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि दुबई, हांगकांग और कुआलालंपुर जैसे मेट्रो शहर बेंगलुरू की तुलना में बहुत अधिक महानगरीय हैं और वहॉं की मेट्रो में केवल दो भाषाऍं हैं, एक उनकी अपनी नेटिव भाषा और दूसरी अंग्रेजी। तर्कशास्‍त्री यह भूल जाते हैं कि जिन शहरों के नाम उन्‍होंने गिनाए हैं, उन शहरों के देशों की अपनी-अपनी राष्‍ट्रभाषाऍं हैं जिनका प्रयोग अंग्रेजी के साथ-साथ प्राथमिकता से किया गया है। लेकिन भारत के महानगरों से उनकी कोई तुलना नहीं की जा सकती क्‍योंकि भारत के महानगरों में पूरा भारत बसता है और इस युवा भारत की अपनी-अपनी राज्‍य भाषाऍं हैं। अत: बेंगलुरू में रहने वाले लोग जो मेट्रो रेल की सेवाओं का प्रयोग करेंगे चाहे वे किसी भी प्रदेश के हों या तो उन्‍हें कन्‍नड़ आती होगी या फिर हिंदी। पंरतु भारत की त्रिभाषा नीति का अनुपालन करते हुए साइनबोर्ड पर अंग्रेजी का भी प्रयोग किया जाना चाहिए क्‍योंकि बेंगलुरू में ऐसे विदेशी लोग भी रहते हैं जिन्‍हें हिंदी एवं क्षेत्रीय दोनों भाषाओं का ज्ञान नहीं है, ऐसी स्थिति में उन्‍हें अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ता है।

तर्क यह भी है ​​कि दिल्ली मेट्रो में केवल दो भाषाओं यथा हिंदी और अंग्रेजी का प्रयोग किया गया है तो नम्‍मा मेट्रो में क्‍यों नहीं। तर्कशात्री यह भूल रहे हैं कि दिल्‍ली देश की राजधानी हैऔर दिल्‍ली की राज्‍य भाषा हिंदी है। यदि दिल्‍ली में मेट्रो रेल के साइनबोर्ड पर भारत की आठवीं अनुसूची में दर्ज 22 भाषाओं का प्रयोग किया जाने लगेगा तो अलग से ही साइनबोर्ड के लिए एक कंपनी का गठन करना पड़ेगा और वहाँ केवल साइनबोर्ड दिखेंगे, दिल्‍ली मेट्रो नहीं।

तर्क यह भी है कि तमिलनाडू के चेन्‍नई मेट्रो में केवल तमिल एवं अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया गया है उसी तरह बेंगलूरु मेट्रो में भी हिंदी को छोड़कर केवल क्षेत्रीय भाषा एवं अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए था। तर्कशात्रियों को संभवत: संवैधानिक उपबंधों का ज्ञान नहीं है क्‍योंकि संविधान में राजभाषा नियम, 1976 के तहत कुछ उपबंधों में तमिलनाडु को छूट दी गई है। राजभाषा नियम, 1976 के नियम 11 के तहत सूचना पट्ट हिंदी एवं अंग्रेजी भाषाओं में लिखे जाने हेतु अनिवार्य किए गए हैं। किंतु इस नियम में तमिलनाडु राज्‍य को छूट दी गई है, इस आधार पर यदि चेन्‍नई मेट्रो में तमिल के अलावा केवल अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया गया है तो इसमें कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है।

समाचार पत्रों में छपी खबरों से प्रकाश में आया है कि बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने एक आरटीआई के जवाब में कहा है कि बीएमआरसीएल ने अपनी भाषा नीति तैयार की है और हिंदी को साइनबोर्ड में शामिल करने का फैसला किया है। कुछ लोगों का तर्क यह है कि भले ही यह भाषा नीति आंतरिक रूप से बीएमआरसीएल द्वारा बनाई गई हो पर इसमें हिंदी क्यों शामिल किया गया जबकि हिंदी की तुलना में अधिक योग्य भाषाऍं मौजूद हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि जनसंख्या जनगणना के अनुसार, कन्नडिगा के बाद बेंगलुरु में सबसे अधिक आबादी वाला भाषाई समुदायों में तेलुगू, उर्दू और तमिल भाषी हैं, जबकि ‘नम्मा मेट्रो’ के साइनबोर्ड में उनकी कोई भी भाषा का उपयोग नहीं किया गया है। किसी भी सरकारी कार्यालय में किसी नीति को तैयार करने के लिए सहयोगी दस्‍तावेजों की आवश्‍यकता होती है तथा प्रस्‍तावित नीति को बनाते समय केंद्र सरकार, राज्‍य सरकार एवं माननीय न्‍यायालयों के निर्देशों की अनुपालना करना आवश्‍यक होता है। अतएव, अपनी आंतरिक नीति बनाते समय बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने यदि राज्‍य सरकार, भारतीय रेल तथा केंद्र सरकार द्वारा अपनायी गई नीति पर गौर करते हुए फैसला लिया है तो इसमें कहीं कोई गलती नहीं दिखायी पड़ती है।

एक और तर्क दिया जा रहा है कि वर्ष 2011 के भारतीय पाठक सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि कन्नड़ अखबार के पाठक सर्वाधिक हैं तथा दूसरे स्‍थान पर अंग्रेजी दैनिक अखबारों पाठक बेंगलुरु में हैं। बेंगलुरु के शीर्ष 10 समाचार पत्रों की सूची में में एक भी हिंदी दैनिक नहीं है। यदि इस तर्क को आधार मान भी लिया जाए तो पूरे भारत में केवल तीन फीसदी लोग अंग्रेजी बोलते हैं इस आधार पर तो भारत की दूसरी आधिकारिक भाषा अंग्रेजी को भी को-ऑफिशियल लेंग्‍वेज के पद से हटा लिया जाना चाहिए क्‍योंकि अंग्रेजी से ज्‍यादा तो कई क्षेत्रीय भाषाऍं ऐसी हैं जो अधिकाधिक बोली एवं पढ़ी जाती हैं।

बेंगलुरु एक मेट्रो शहर है जिसमें आज कई संस्‍कृतियों वाले देशी विदेशी लोग रहते हैं । यहॉं भारत 25 से अधिक राज्यों और कई देशों से आए हुए लोग बसते हैं, जिनकी भाषाऍं भी स्‍वभावत: भिन्‍न भिन्‍न हैं। बेंगलूरु केवल कर्नाटक की ही राजधानी नहीं है यह भारत का एक उभरता हुआ मेट्रो शहर है, ग्‍लोबलाइजेशन के दौर में भाषायी तौर पर इसे केवल कनार्टक तक बांधना कतई उचित प्रतीत नहीं होता। हमें नम्मा मेट्रो नेटवर्क में उत्साह के साथ त्रिभाषा सिद्धांत को अपनाना चाहिए। इससे सभी लोगों को फायदा होगा, जिन कम पढ़े लिखे लोगों को कन्‍नड़ नहीं आती वे अपना रास्‍ता हिंदी साइनबोर्ड से ढू़ंढ़ लेंगें और विदेशी मेहमान अंग्रेजी से अपना काम चला लेंगें।

भारत की अपनी बहुभाषी पहचान है, उसकी कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है लेकिन भाषाशास्त्रियों का मानना है कि साधारणतया केंद्र की राजकीय भाषा को ही राष्‍ट्रभाषा का दर्जा प्राप्‍त होता है और भारत की राजकीय भाषा हिंदी है जो आज पूरे देश में संपर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है।
लेकिन क्षेत्रीय भाषा को सदैव प्राथमिकता देनी होगी, इस क्रम में प्रधान भाषा को कन्नड़ होनी चाहिए और संपर्क भाषा के रूप में क्रमश: हिंदी एवं अंग्रेजी दूसरे एवं तीसरे स्‍थान पर साइनबोर्डों में प्रदर्शित की जानी चाहिए। इससे बहुभाषी बेंगलुरु का सम्मान होगा, नम्‍मा मेट्रो का उपयोग करने वाले लोग समाज के विभिन्‍न सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों से आते हैं। कुछ कन्नड़ जानते हैं, कुछ हिंदी, कुछ अंग्रेजी और अन्‍य भाषाएँ।

कन्नड़ में ‘नम्मा’ का अर्थ है ‘हमारा’ और इस नम्‍मा में यह भाव सभी भाषाओं के प्रति होना चाहिए, चाहे जिस किसी भी भाषा समूह का व्‍यक्ति इस मेट्रो का उपयोग करता है। अब समय आ गया है कि साइनबोर्ड में उक्‍त तीनों भाषाओं के साथ साथ ब्रेन लिपि का भी प्रयोग किया जाना चाहिए।

Advertisements
The opinions expressed within articles on "My Voice" are the personal opinions of respective authors. OpIndia.com is not responsible for the accuracy, completeness, suitability, or validity of any information or argument put forward in the articles. All information is provided on an as-is basis. OpIndia.com does not assume any responsibility or liability for the same.