यह कैसी आज़ादी?

पिछले कई दिनों से देश में एक दंगल चल रहा है। अखाड़े में एक तरफ “आज़ादी” खड़ी है तो दूसरी तरफ “राष्ट्रवाद”। दर्शक छात्र और विश्वविद्यालय है। विचारधाराओं की अड्डाबाजी हो रही है। कहीं टिका-टिपण्णी मीडिया वाले कर रहे हैं तो कहीं बुद्धिजीवी वर्ग। खूब नारेबाजी हो रही है। बाजार गर्म है। जे. एन.यू और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में अगर देश विरोधी नारे लगे और हमारा खून न खौले तो सच में हमारे खून में न देश का नमक है और ना ही पानी। नेहरू जी के समय से जे एन यू जैसे शैक्षणिक संस्थान वामपंथी विचारधाराओं का एक मजबूत अड्डा रहा है और ऐसे देश विरोधी कार्य उस समय से चलते आ रहे हैं पर यह दुर्भाग्य है की ये सब आज तक एक किताब के अंदर बंद रहा है क्यों की अन्य विचारधाराओं का कोई वजूद और अस्तित्व नहीं था। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में जेएनयू के छात्र उमर खालिद को बुलाए जाने पर हुए विवाद में दोनों गुटों में हाथापाई के बाद लड़ाई तेज हो गई है। अब यह लड़ाई राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह की हो गई है। कुछ साल पहले जे एन यू में एक राष्ट्रवादी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मजबूत हुई है और इसी कारण अब वामपंथीयों के कुकर्म उजागर हो रहे हैं जो उनको अब पच नहीं रहा है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और सबको बोलने की आज़ादी है। संविधान ने आज़ादी की एक लक्ष्मण रेखा तय की है और हमें उसी तक सीमित रहना चाहिए।

जो कुछ कैंपस में हो रहा है और जो देश को तोड़ने के नारे लग रहे हैं उससे ये पता चलता है की हमारे शिक्षकों ने किस तरह से छात्रों पर एक विचाधारा का प्रचार कर प्रभाव डाला है। हमारे शैक्षिक संसथान में बहुत विद्वान शिक्षक हैं जो अपने कार्य तक सीमित है पर कई हैं जो कैंपस में राजनीती करने आते हैं, सरकार को संज्ञान लेना चाहिए। भारत हमारी माँ हैं और भारत माँ हमारी माता इसलिए राष्ट्रवाद तो हर हाल में मुद्दा है। एबीवीपी के विचारधारा से में बहुत प्रभावित हूँ क्यों की वो देश की बात करती है और राष्ट्रवाद तो हर हाल में उनका प्रमुख मुद्दा है। मेरा मानना है कि अधिकांश छात्र जो भारत को अपना देश मानते हैं, महिलाओं का सम्मान करते हैं, कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं और सबसे बड़ी बात उनमें राष्ट्रवाद की भावना है वह सब राष्ट्रवादी हैं। संविधान में स्वतंत्रता के अधिकार को अनुच्छेद १९ से २२ में शामिल किया गया है। परन्तु हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी ये भूल जाते हैं की कोई भी मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं होते। बोलने की आज़ादी में कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है जैसे की राष्ट्रीय सुरक्षा एवं शांति। देश में आपको बोलने की पूर्ण आज़ादी है लेकिन एक सिमा रेखा तक, लड़ना है तो देश के हित के लिए लड़ो। जेएनयू में महिषासुर दिवस का मनाया जाना, अंतरराष्ट्रीय वेदांत सम्मेलन में योग गुरु रामदेव के विरोध जैसी बातों से हमारे शिक्षण संस्थान हिंदुत्ववाद और ब्राह्मणवाद के विरोध का अड्डा बन गए है। कैंपस में नारे लग रहे, “अफजल तेरे खून से इंकलाब आएगा,अफज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं, भारत तेरे टुकड़े होंगे।” सामने आया दिल्‍ली यूनिवर्सिटी में हुए प्रदर्शन का वीडियो इसमें प्रदर्शनकारी नारा लगाते हैं, “हम क्‍या चाहते आजादी, कश्‍मीर मांगे आजादी”। जब भारत ही नहीं रहेगा तो इनकी राजनीती कैसे चलेगी? हम सब को अब एक होना होगा और भारत की रक्षा के लिए राष्ट्रविरोधी ताकतों को कमज़ोर करना होगा।

कुछ दिनों से दिल्ली विश्वविद्यालय की एक लड़की गुरमेहर कौर मीडिया सेलिब्रिटी बननी हुई है। गुरमेहर ने दावा किया की वह बोलने की आजादी के लिए आवाज़ उठाई है पर उसनें सिर्फ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को इसके विरुद्ध बताया। कोई भी राजनीती से सम्बन्ध रखने वाला व्यक्ति को पता होगा की यह पक्षपातपूर्ण है। फिर भी गुरमेहर ने परिषद् को बोलने की आजादी के विरुद्ध बताया। हमारी लेफ्ट निष्ठावान मीडिया ने पूरी कोशिश कर इससे एक सुसमाचार सत्य और शहीद की बेटी के द्वारा इससे एक भावुक रंग देनी की कोशिश की गई, क्यों की तथ्यों और तर्क में कोई जान नहीं था। गुरमेहर एक छात्र नहीं बल्कि एक सावधानी से तैयार की गई प्रचार है, और उसका वामपंथी संघठनो से पुराण नाता है। गुरमेहर एक सामान्य छात्र नहीं बल्कि एक अनुभवी राजनितिक सामाजिक मीडिया उपयोगकर्ता थी। दंगल होना चाहिए पर देश को दांव पर लगाकर नहीं। हरेक देश के दो बेटे होते है एक आज़ादी तो दूसरा राष्ट्रवाद। हारे कोई रोएगा तो देश ही। हमें आज़ादी तो चाहिए पर राष्ट्रवाद को हराकर नहीं। जय हिन्द!

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