व्यंग्य : परवेज़ भाई और जुगाली

ये एक ग्लोबल दिन था- लोग ट्रंप-इस्लाम और फेडरर-नडाल के अलावा- एक देशी पर ग्लोबल समझा जाने वाले भारत और इंग्लैंड मैच पर भी आंख लगाये थे. पिछले कुछ मैच में आने वाली इंग्लैंड की जनता को देख कर ऐसा लगता था कि ये सब ५-१० साल में जब ऊपर निकल लेंगे तब इंग्लैंड में भी भारत और इंग्लैंड के मुकाबले में भारतीय ही इंग्लैंड के लिए ‘चियर’ करते दिखेंगे. अलबत्ता उनकी इकॉनमी की, ये हालत रही तो ‘चियर लीडर्स’ ज़रूर इंग्लैंड की होंगी. इधर टॉस होने ही वाला था कि दरवाज़े पे दनादन ३ घंटी बजीं. घर में सबसे छोटे होने के नाते दरवाज़े खोलना, सामान पकड़ना और कार की आखिरी सीट में बैठना हमारे ही काम था, तो हमने वो किया.

मुख़्तार अंसारी के बसपा में घुसने की तरह हमारे ‘वाट्स-एप’ वाले मामा दनदनाते हुए घर में घुस आये. ऐसा नहीं है कि डिजिटल इंडिया की तरह वो हमारे कोई डिजिटल मामा हैं या सिर्फ ‘वाट्स-एप’ पे बने अभी बने ग्रुप की तरह कोई फर्जी मामा. अभी हमने कुछ महीनों पहले उनके मोबाइल पे वाट्स-एप डाउनलोड कर दिया था और वो ‘जिओ’ के साथ जी भर के जी रहे थे. उन्होंने कहा था कि ‘जिओ जी भर के’ तो जिओ का टैगलाइन है, जिसपे हम ‘रीवाइटल’ बोलने पे खूब गाली खाए थे. हाल फिलहाल पूरा ज्ञान ‘वाट्स-एप’ से ही लाते थे. उनका मानना था कि जैसे ऋषि मुनियों के टाइम पे सूक्तियां चलती थीं और वो पुराणों में लिख के सर्कुलेट होंती होंगी, वैसे ही आज सारा ज्ञान ‘वाट्स-एप’ पे बंट रहा है, बस बटोरने वाले की श्रद्धा और डाटा में दम होना चाहिए. हालाँकि, एक दिन ग्रुप पे दो लगातार आये ज्ञान में एक में टमाटर को ‘एसिडिक’ और दूसरे में अमृत बताया गया था तो वो काफी कन्फ्यूज़ हो गए थे. हमने थोड़े मजे लिए तो चिढ के बोले जब ज्ञानी महात्माओं में मोक्ष प्राप्ति को लेकर मतभेद हो हो सकता है तो, ये तो टमाटर है. धीरे धीरे, वो हम भांजों के बीच बड़े मामा से ‘वाट्स-एप’ वाले मामा हो गए थे.

हमने पूछा “क्या हुआ मामा इतना सर्दी में कहाँ कडकडाते घूम रहे हो. हड्डी वड्डी चटक गयी तो सीधे मोदी से आडवानी बन जाओगे” उनका दिल बहुत बड़ा है तो जाहिर सी बात है, वो हर बात दिल पे ले लेते हैं. वो बोले- “न हम मुलायम हैं न आडवानी. हम तो मद्रास वाले पनीरसेलम हैं, ये सब धमकी अपनी मामी को दिया करो. जयललिता बनी बैंठी हैं, टीवी पे कब्ज़ा करे” हमने उस कमेंट की तकनीकी खामी पर कोई टिप्पणी नहीं की और उन के बगल में बैठने आ गया. पर अभी एक और छोटी सी चुल्ल हमारे पिछवाड़े में साक्षी जी महराज की तरह घुसी थी. “पर आप मैच कब से देखने लगे”. सही बात ये थी कि एक जगह इत्ती देर बैठे रहने का उनमें धीरज नहीं था. इसमें वो बिलकुल आज ‘फ़ास्ट फ़ूड’ जनरेशन जैसे थे- सब जल्दी चाइये.

“मैच कौन देखने आया है, हम तो टीम देखने आयें हैं” हमारे चौंके हुए चेहरे की तरफ देख कर बोले, “हमको सब पता है. वो एक कश्मीरी लड़का खेल रहा है न- क्या नाम..मुशर्रफ” हमने काटते हुए बोला, “परवेज़ रसूल”

“हाँ हाँ वही, देखने आये हैं कि इस टीम में उसको लिया कि, नहीं” मामा ने नाम किनारे किया और एजेंडा आगे बढ़ा दिया. हमें समझ न आया कि हम प्रोफेशनलिजम पे खुश हों कि या खिलाडी की बेजती से खफा. खैर, वो जारी रहे- “‘वाट्स-एप’ पे आया है कि वो ‘जन गन मन’ के टाइम पे चुन्गम चबा रहा था. और खड़ा भी एक दम आराम की पोजीसन में था” पहले तो मन हुआ कि उनको बोलें कि दंगल देखते समय जब दूसरी बार राष्ट्रगान हुआ था तो वो भी कमर का बहाना देके बैठे रहे थे और उससे पहले वाले पे बंटी भी ‘पॉपकॉर्न’ खुरखुरा रहा था. हमने सोचा- ‘नथिंग पर्सनल’ जाने दो. गन और गण तो उनकी क्षमता के ही बाहर था तो वो खुद ही चला गया. फिर भी हमने सोचा मजे तो लें “ तो आप क्या देखने आये हो, वो रहे या न रहे”. अपने देश के करोणों लोग की तरह मामा भी शायद नहीं समझ पाए थे उन्हें क्या चाहिए. तो वो भी कुछ भी बघारने लगे.

“याद है पुराने चट्टे पे हमारे पास एक भैंसी थी. जब कारगिल का युद्ध जीते थे, तो उसी समय उसको लाये थे. एक लाहौरी भैंसे और देसी भैंस से पैदा हुआ थी, तो हम उसको कश्मीर की कली कहते थे.” लाहौरी भैंसा १९९८-९९ में उनको कहाँ से मिला था इस बात पे हम उनसे जिरह करना नहीं चाहते थे. वो चालू रहे- “बहुत शानदार भैंस थी. जितना मन आये उतना दूध देती थी. उसकी वजह से दूर दूर से लोग उसका दूध तो लेते ही, देखने भी आने लगे.” हमने मन में सोचा कि गाय भैंस को देखने लोग आते थे, तो मतलब गाँव में लोग काफी खाली थे और मनरेगा काउंटर सिर्फ पैसे लेने ही आते होंगे.

इधर दोनों कप्तान फील्ड पे आ गए और मामा तब भी जारी रहे ,”कभी तो एक दम शांत रहती तो कभी एक दम बौरा जाती. जब उसपे ज्यादा ध्यान देते तो बाकी भैंसे बौरा जातीं. जब छोड़ देते तो ये पगुराने लगती. समझी न आता कि साला चक्कर क्या है. कई बार खूँटा उखाड़ने की सोचती, तो कभी खुली छूट के भी घर से जाने का नाम न लेती” हमें लगा मामा टॉपिक कहीं का कहीं ले जा रहे हैं. वो बड़े भावुक हो गए तो हमने अपना मुंह बंद ही ठीक समझा. वो फिर बोले, “हमको कभी न समझा उसको चाहिए क्या. एक बार नेताजी के चट्टे में मुंह मार के आई तो हम बहुत कष्ट में पूछे कि ‘बेटा तुमको क्या चाहिए’ तो हमारे कंधे पे अपना नथुना रगड़ीस और एक दम से खूब सारा गोबर कर दीस”. मामा के ‘मोमेंट’ में खलल पड़ गया था और मम्मी चाय लेके उनके नथुनो तक ले आई थी, “हम समझ गए कि इसको शायद खाना वहां है, और हगना यहाँ. फिर, कभी खाती यहाँ थी और हगती वहां. हम बहुत गुस्से में एक दिन कस के मारे, तो अगले दिन बंटी को सींग मार दी. काफी दिन तक जो भी उसके नज़दीक जाता उसको गिरा देती. फिर खुद ही कुछ दिन बाद मस्त होक दूध देने लगती.” हम अब बुरी तरह उकता गए थे तो हमने पूछ दिया, “तो मामा पॉइंट क्या है?”

उनकी हालत उस बल्लेबाज की तरह थी जो २०० होने से ३ रन पहले अचानक पारी समाप्ति की घोषणा होने से बौखला जाता है. इस कमज़ोर पल में चाय के प्याले ने उनका साथ दिया. कसके सुड़कते हुए बोले, “ जब भी कोई पूजा या हवन होता, सब की नज़र सिर्फ उसी भैंस पे होती. बाकी सारी भैंसे चाहे एक दम काएदे से खडी रहें या लोट जाएँ. लेकिन सब इसी को देखते, और ये ससुरी, हमेशा जुगाली करती रहती. सब बोलते- ‘अरे ये देखो २ मिनट शांत नहीं रह सकती, जुगाली तो करेगी कित्ता भी सिखा लो’ और हम मायूस से हो जाते. सोचते दूसरों को दिखाने को ही सही कभी स्थिर रह जा. पर हम कभी उसको मारे नहीं न कभी सताए.” उस समय हमको मामा बिलकुल आम इंसान नज़र आये, वो वैसे भी चाह के क्या उखाड़ लेते.

जब मुझे एहसास हुआ कि उन्होंने उदाहरण इतना गन्दा और बदतमीजी भरा लगाया है तो मैं बेचैन हो गया कि तभी वो चाय का एक और बड़ा सुडका मार के बोले, “ २ दिन से ये ‘वाट्स-एप’ पे मुशर्रफ का वीडियो और पिक्चर आ रहा है तब से हम यही सोच रहे हैं कि हम ठीक किये या नहीं, ये फैसला देश पे ही छोड़ दिया जाए.” वो फिर परवेज़ को मुशर्रफ बोले थे और हम अब टीवी की ओर मुंह करके देख रहे थे. हमसे उनकी ये बकवास झेली नहीं जा रही थी. हमने कहा,”ऐसा भी हो सकता है वो अच्छा न खेलता हो” ये बोलते ही ऋषिकेश कानिटकर के ३० मैच दिमाग में घूम गए और हम चुप हो गए.

“खेल वेल कोई भी हो, ये सब बातें पॉलिटिक्स से ही होतीं हैं. आज अगर उसको फिर से लिया और वो जुगाली किया तो हम मानेंगे की हम सही किए नहीं तो सोचंगे कि – “ ये वाक्य मामा ने पूरा नहीं क्या, शायद बिस्कुट मुंह में आ गया था. मामा अब तसल्ली से कुर्सी पे सरकार के अमिताभ बच्चन टाइप पसर गए थे. मामा ने फिर आखिरी सुड़का मारा और मैंने पलट के कहा, “मामा पनीरसेलम नहीं, पन्नीरसेल्वम. और मद्रास नहीं, तमिलनाडु है स्टेट” मामा ‘वाट्स-एप’ पे घुस गए थे. शायद वहां उन्हें टीम की खबर पहले ही आ गयी होगी. अब सिर्फ उनको ही नहीं हम सभी को टीम की परवाह मैच से ज्यादा थी.

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