Tuesday, August 11, 2020
Home Hindi मोदी और खादी - सबको सम्मति दे भगवान

मोदी और खादी – सबको सम्मति दे भगवान

Also Read

डॉ नीलम महेंद्रhttp://drneelammahendra.blogspot.in/
Writer. Taking a small step to bring positiveness in moral and social values.
 

यह सही है कि लफ्जों में इतनी ताकत होती है कि किसी पुरानी डायरी के पन्नों पर कुछ समय पहले चली हुई कलम आज कोई तूफान लाने की क्षमता रखती है लेकिन किसी डायरी के खाली पन्ने भी आँधियाँ ला सकते हैं ऐसा शायद पहली बार हो रहा है।

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के 2017 के वो कैलेंडर और डायरी आज देश भर में चर्चा में हैं जिनके बारे में तो अधिकतर भारतीयों को शायद इससे पहले पता भी न हो।

कारण है गाँधी जी की जगह मोदी की तस्वीर।

इस तस्वीर से गांधी को नुक्सान है या किसी और को?

पूरा देश गाँधी प्रेम में उबल रहा है कि गाँधी की जगह कोई नहीं ले सकता,केवल चरखे के पीछे बैठकर फोटो खिंचाने से कोई गाँधी नहीं बन सकता आदि आदि।

सही भी है आखिर गाँधी जी इस देश के राष्ट्रपिता हैं और पूरा देश उनसे बहुत प्यार करता है और उनकी इज्जत करता है।

 

लेकिन गाँधी जी को सही मायनों में हममें से कितनों ने समझा है?

गाँधी जी कहते थे कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है। आज जो लोग गाँधी जी के नाम को रो रहे हैं इनमें से कितनों ने अपने भय या असुरक्षा की भावना पर विजय हासिल की है?

यह असुरक्षा की भावना नहीं तो क्या है कि एक तरफ आप चिल्ला रहे हैं कि गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता और दूसरी तरफ इसे बेमतलब मुद्दा भी बना रहे हैं! क्योंकि आप केवल इन शब्दों को ‘कह’ रहे हैं, इनके सहारे जनमानस को बहकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। अगर आप अपने कहे शब्दों को ‘समझते’ तो इस बात को मुद्दा नहीं बनाते क्योंकि यह तो अटल सत्य है ही कि गाँधी जी की जगह कोई नहीं ले सकता।

 

गाँधी जी ही हमारे गाँधी हैं और रहेंगे।

लेकिन जो असली भावना आपको डरा रही है वो यह है कि आप ही की गलतियों के कारण आज मोदी भी उस मुकाम पर पँहुच गए हैं कि कोई उनकी जगह भी नहीं ले सकता।विपक्ष तो क्या सरकार या फिर खुद उनकी ही पार्टी में भी उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं है कम से कम आज तो नहीं।

गाँधी जी को आज जो रो रहे हैं और कह रहे हैं कि गाँधी को खादी से और खादी को गाँधी से कोई अलग नहीं कर सकता उन्होंने इतने साल गाँधी के लिए या फिर खादी के लिए क्या किया।

दरअसल वो गाँधी को नहीं उस नाम को रो रहे हैं जिस नाम को उन्होंने अपने कापी राइट से अधिक कभी कुछ नहीं समझा।

इतने सालों गाँधी जी के लिए कुछ किया गया तो यह कि देश भर में लगभग 64 सरकारी स्कीमें उनके नाम पर खोली गईं, 24 खेलों के टूर्नामेंट और ट्रोफी उनके नाम पर रखे गये, 15 स्कालरशिप उनके नाम पर दी गई, 19 स्टेडियम उनके नाम पर खोले गए, 39 अस्पतालों का नाम उनके नाम पर रखा गया, 74 बिल्डिंग और सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे गए, 5 एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा गया आदि आदि लिस्ट बहुत लम्बी है।

इसके अलावा 2 अक्तूबर को बापू की समाधि पर फूल चढ़ाकर उनके प्रिय भजनों का आयोजन और दूरदर्शन पर ‘गाँधी’ फ़िल्म का प्रसारण। बस कर लिया बापू को याद!

क्या यहीं तक सीमित है हमारा ‘बापू प्रेम’? हमारे राष्ट्र पिता के प्रति इतनी ही है हमारी भक्ति? यही सच्ची श्रद्धा है जिसके हकदार हैं हमारे बापू?

तो फिर वो क्या है जब देश का प्रधानमंत्री जिसके नाम के साथ गाँधी तो नहीं लगा लेकिन आजादी के 70 साल बाद जब देश की बागडोर अपने हाथों में लेता है तो गाँधी जी के सपने को यथार्थ में बदलने के उद्देश्य से ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत करता है और उसका प्रतीक चिह्न गाँधी जी के चश्मे को रखता है?

वो क्या है जब यही प्रधानमंत्री गाँधी जी की 150 वीं जयन्ति के अवसर पर 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करने का बीड़ा उठाता है? यहाँ इस प्रश्न पर तो बात ही नहीं की जा रही कि इतने सालों जिस ‘गाँधीवादी’ पार्टी का शासन था उसने इस दिशा में क्या कदम उठाए या फिर आजादी के इतने सालों बाद भी किसी  प्रधानमंत्री को इस मूलभूत स्तर पर काम क्यों करना पड़ रहा है।

वो क्या है जब प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ में देशवासियों से ‘गाँधी की खादी’ अपनाने का आह्वान करते हैं तो खादी की बिक्री में 125% की बढोत्तरी दर्ज होती है (इंडिया टुडे की रिपोर्ट)।

वो क्या है जब मोदी नारा देते हैं “खादी फार नेशन, खादी फार फैशन”? वो क्या है जब प्रधानमंत्री खादी के उन्नयन के लिए पंजाब में 500 महिलाओं को चरखा बाँटने वाले आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं?

गाँधी जी अपने बाथरूम की सफाई खुद ही करते थे तो आज जो गाँधी के नाम पर विलाप कर रहे हैं उनमें से कितने उनका अनुसरण करते हैं?

और वो क्या है जब इस देश का प्रधानमंत्री उनका अनुसरण करते हुए न सिर्फ खुद हाथ में झाड़ू पकड़ कर सफाई अभियान की शुरुआत करते हैं बल्कि पूरे देश को प्रेरित करते हैं?

इससे भी गांधी का नुक्सान?

लेकिन यह अजीब सी बात है कि जब प्रधानमंत्री के हाथों में झाड़ू होता है तो कोई सवाल नहीं करता लेकिन उन्हीं हाथों में चरखा आ जाता है तो मुद्दा बन जाता है?

आपको इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता कि खादी की बिक्री जो कि कांग्रेस के शासन काल के 50 सालों में 2 से 7% थी पिछले दो वर्षों में बढ़कर 34% तक पहुँच गई।

आपको इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले भी 6 बार जब बापू इस कैलेंडर में नहीं थे वो भी आप ही के शासन काल में 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013 में तब आपने इसे मुद्दा नहीं बनाया था, तो आपके लिए गाँधी जी की ही प्रिय प्रार्थना ‘आप सबको सम्मति दे भगवान’।

गाँधी जी केवल चरखा और खादी तक सीमित नहीं हैं वो एक विचारधारा हैं जीवन जीने की शैली हैं नैतिकता सच्चाई दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस के साथ साथ अहिंसा के प्रतीक हैं। वे व्यक्ति नहीं अपने आप में एक संस्था हैं।

इससे बड़ी बात क्या होगी कि वे केवल भारत में नहीं अपितु पूरे विश्व में अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजे जाते हैं। जब भारत के गाँधी पर अमेरिका के जान ब्रिले  फिल्म लिखते हैं और रिचर्ड एटनबोरो निर्देशित करते हैं तो वे गाँधी को हमसे छीनते नहीं हैं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को उनके व्यक्तित्व एवं विचारधारा से अवगत कराते हैं, उनकी सीमाएं भारत को लाँघ जाती हैं।

तो जो लोग आज कैलेंडर की तस्वीर पर बवाल मचा रहे हैं वे अपनी असुरक्षा की भावना से बाहर निकल कर समझें कि गाँधी जी इतने छोटे नहीं कि किसी तस्वीर के पीछे छिपाए जांए।

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

डॉ नीलम महेंद्रhttp://drneelammahendra.blogspot.in/
Writer. Taking a small step to bring positiveness in moral and social values.

Latest News

राम मंदिर और भारतीय संस्कृति

राम मंदिर का निर्माण भारतीय संस्कृति की रक्षा एवं उत्थान की ओर बड़ी छलांग है, सदियों से विदेशी आक्रांताओं ने न केवल भारत को लूटा अपितु उसकी संस्कृति को नष्ट भ्रष्ट करने का यथासम्भव प्रयास किया।

Here’s why the idea of placing a time capsule beneath Ram temple should be taken seriously

Burying of a time capsule, if at all done, should bury the claim that Hinduism is the other face of Indian nationalism. Its time to change the narrative test Hindutva should become BJP’s achilles heel.

Ayodhya: From secular to a Hindu state

Ayodhya existed before the temple, will it cease to exist and be changed to RamJanmBhoomi or will it thrive despite the best efforts of politicians to ruin it?

Ayatollah Khamenei’s Hindi Twitter account: What is cooking?

Iran's supreme leader Ayotallah Khamenei has opened a twitter account in Hindi. This action is serious, Indian intelligence agencies and Bhartiyas must be on alert, especially since this action comes in a span of few days of the Bhumi Pujan ceremony of Shri Ram Janma Bhumi.

Why my village celebrated Diwali on 5th August

Ram Mandir has been a hot political issue since decades but should that reduce the glory of this auspicious day?

In fight between secularists and nationalists, journalism loses its purpose

It is needless to remind, in democratic system of governance, the institution of media or the profession of journalism plays one of...

Recently Popular

Are Indian history text books really biased?

Contributions of many dynasties, kings and kingdoms find no mention in our text books. Post independence history is also not adequately covered in our text books.

सामाजिक भेदभाव: कारण और निवारण

भारत में व्याप्त सामाजिक असामानता केवल एक वर्ग विशेष के साथ जिसे कि दलित कहा जाता है के साथ ही व्यापक रूप से प्रभावी है परंतु आर्थिक असमानता को केवल दलितों में ही व्याप्त नहीं माना जा सकता।

The story of Lord Jagannath and Krishna’s heart

But do we really know the significance of this temple and the story behind the incomplete idols of Lord Jagannath, Lord Balabhadra and Maa Shubhadra?

Striking similarities between the death of Parveen Babi and Sushant Singh Rajput: A mere co-incidence or well planned murders?

Together Rhea and Bhatt’s media statements subtly and cleverly project Sushant as some kind of a nut job like Parveen Babi, another Bhatt conjuring.

Two nation theory after independence

Two Nation Theory was the basis of partition of India. Partition was accepted based on the assumption that the Muslims staying back in India because they rejected the Two Nation theory. However, later decades proved that Two Nation Theory is not only subscribed by a large section of Indian Muslims but also being nourished by the appeasement politics.
Advertisements