बागों में बहार थी, जब अपनी सरकार थी……

रवीश जी एक बार फिर आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की घनघोर चिंता हुई, अपना स्टैण्डर्ड फॉर्मेट छोड़कर नयी नौटंकी करनी पड़ी. इस बार तो इतना गंभीर था मामला कि अपनी कहानी की शुरुआत आपको नचिकेता की कहानी सुनाकर करनी पड़ी. नचिकेता की उसी कहानी में आगे एक जगह यमराज बोले हैं कि:

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः
[कठोपनिषद 1:21]

जिसका हिंदी अर्थ है – पुराने ज्ञानी देवता तक भी यहाँ आकर भ्रमित हो जाते हैं, इसके पीछे का सत्य इतना सूक्ष्म और गूढ़ है कि आम मनुष्य की तो समझ से ही परे है. कहा होगा किसी के लिए, हमें क्या. बस आपका प्रोग्राम देखकर ऐसे ही याद आ गयी थी ये लाइन. उसी कठोपनिषद में आगे लिखा है:

अविद्यायामन्तरेवर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः
[कठोपनिषद 2:5]

इसका मोटा-मोटी अर्थ है कि ज्ञान के घमंड में डूबे बड़े विद्वान लोग सांसारिक माया जमा करते हैं और इनके द्वारा मिस-गाइडेड भोले भाले लोग अंधों की तरह (इनके पीछे) भटकते रहते हैं. ये किसके लिए कहा गया है आप बेहतर जानते हैं. आप भी बड़े विद्वान हैं.

रवीश जी वाकई आप बहुत बड़े …………. हैं, बहुत ही ………. इंसान हैं और उससे भी ज्यादा ……… पत्रकार. मैंने दोनों विशेषण नहीं लिखे. लेकिन यहाँ सत्य इतना गूढ़ नहीं है. आप पहली बार में ही समझ जायेंगे कि वहां कौन कौन से विशेषण आने चाहिए. आप ही नहीं हर कोई समझ जाएगा और बिलकुल सही समझेगा. इस “हर कोई” में पहले श्लोक के आम मनुष्य और दूसरे श्लोक के भोले-भाले मनुष्य दोनों ही शामिल हैं. आपने अपने दो जोकरों वाले प्रोग्राम में सवाल पूछा था कि बिना शब्दों के डेमोक्रेसी का स्टार्टअप कैसे शुरू करें, तो ये आइडिया वहीँ से आया.

आपकी स्टाइल को इससे ज्यादा कॉपी नहीं कर सकता, आइये अब बिलकुल सीधे और बिना लाग लपेट के बात करते हैं. पिछली बार जब अपने एजेंडा के तहत “भारत तेरे टुकड़े होंगे” वालों को बचाने की जरूरत थी तब आपने पूरे मीडिया को बीमार, देश को जहरीला और अपने से इतर राजनीतिक मत वालों को गुंडा करार दिया. इसके लिए कई सारी बड़ी-बड़ी संकल्पनाओं जैसे देशभक्ति, लोकतंत्र, मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी आदि की दुहाई दे दी. लगे हाथों अपने राइवल अर्नब गोस्वामी को जी भर के गरियाया. आरएसएस और मोदी को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ये सदियों पुरानी तरकीब है लिबरल लोगों की. जब तथ्यों और तर्कों से किसी वाहियात को जायज बताना संभव नहीं होता है तो गोल-मोल बातें करके, कलात्मक रूप देने का दिखावा करते हुए उसे तोड़-मरोड़ कर किसी ऊंचे और स्थापित संकल्पना से जोड़ देना, तथ्यों और तर्कों को कविता और कला की आड़ में मार देना और फिर उसको जस्टिफाई करने की जरूरत ही नहीं बचती. फिल्म इंडस्ट्री में काफी दिखता है ये. सीधे-सीधे वासनामय विवाहेतर संबंधों को दिखाना समाज में स्वीकार्य नहीं है इसलिए वो लिबरल रास्ता अपनाते हैं. इसीलिए वो इसको घुमा-फिराकर कर “प्रेम” का नाम दे देते हैं. नग्न नारी शरीर को “प्राकृतिक कलात्मकता” बोल कर दिखाते हैं. यही काम बिना लिबरल-लॉजिक लगाये किया जाय तो इसको पोर्न कहा जाएगा. बिलकुल इसी तरह आप आतंकवादियों की खैरख्वाही को मानवता और नैतिकता से जोड़ देते हैं. तथ्यों और तर्कों को आप स्क्रीन काली करके गायब कर देते हैं. ये बात आपको पहले भी बोली थी मैंने. [Link]

कुछ साल पहले तक एक सत्ता होती थी जिसमें लोकतंत्र के नाम पर राजशाही जारी थी. लोकतंत्र में सत्ता और जनता के बीच संवाद का एक ही जरिया था; मीडिया. लेकिन जब लोकतंत्र की आड़ में राजशाही जारी रही तब पत्रकारिता की आड़ में दलाली भी शुरू हो गयी. जो सत्ताधारी जनता द्वारा चुने जाने चाहिए थे वो किसी राजवंश से आने लगे तब पत्रकारिता पर भी पूरी तरह दलालों का कब्ज़ा हो गया. जनता के पास सवाल पूछने का कोई रास्ता नहीं बचा. जनता ईमानदार है, जमीर नहीं बेचा करती इसीलिए जीने के लिए, कमाने के लिए खून-पसीना बहाना पड़ता है. काम-काज में व्यस्त रहने वाली जनता को ज्यादा समय नहीं मिलता था ये सब सोचने के लिए. और ऊपर से सत्ता के दलाल जनता को ये बताकर भरमाते रहते थे कि “बागों में बहार है, चुनी हुई सरकार है“. कभी कभी अपने अन्नदाताओं द्वारा भेजी गयी सवालों की लिस्ट में पढ़कर कुछ सवाल भी पूछ लिया करते थे ये दलाल सत्ताधीशों से. जनता इनके बहकावे में आती रही. जनता को सत्ताधीशों ने नहीं, दलालों ने लूटा है. ध्यान दीजियेगा, पत्रकारों ने नहीं, दलालों ने.

इन्ही सबमें 60-70 साल बीत गए. जनता भी सोचने लगी कि जब “बागों में बहार है, फिर देश क्यों बीमार है?”. सवाल बहुत थे; “बागों में बहार है, फिर युवा क्यों बेरोजगार है?”. दलालों की बदकिस्मती से इसी बीच सोशल मीडिया का उद्भव हुआ. जनता को अब सवाल पूछने का और जवाब जानने का रास्ता मिल गया. जनता समझ गयी कि “बागों में बहार है, लेकिन दलालों से घिरी सरकार है“. और पिछले लोकसभा चुनाव में जनता ने फैसला कर लिया. राजवंश से सत्ता छीनकर एक चुने हुए नेता को दे दी. पुराने सत्ताधीश भी सत्ता से ऊब चुके थे, सोचे बहुत खा लिया, अब कुछ कुछ दिन जुगाली कर ली जाय, सो चुप हो गए. सबसे ज्यादा बेचैन हुए ये दलाल लोग. तिलमिला से गए. कभी पत्रकारिता कर रहे एंकर को गरियाते तो कभी देश को जहरीला बताते.

जनता ने अब सवाल पूछने शुरू कर दिए थे. सिर्फ सत्ता से ही नहीं बल्कि उन दलालों से भी. ये दलालों के लिए दोहरा झटका था. आजतक उनसे कोई सवाल नहीं पूछता था, और सत्ता से सवाल पूछने का हक़ सिर्फ उनका था. अब ये दोनों बातें नहीं रहीं. चूंकि लोकतंत्र भी आ गया था, सो लोकतंत्र की परिभाषा के अनुसार जनता ही असली शासक भी थी. जनता और सत्ता के बीच कोई दीवार या सीमा नहीं रही. जनता अब खुद को सत्ता का हिस्सा समझने लगी. इसीलिए कभी कभी दलाल द्वारा सत्ता से पूछे गए सवालों का जवाब जनता भी देने लगी. ये तीसरा बड़ा झटका था.  सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं, सवाल अभिव्यक्ति पर एकाधिकार का था. आपका एकाधिकार छिन गया. भयंकर तिलमिलाहट. यही इस बार के आपके प्रोग्राम का एजेंडा था.

अब आगे की कहानी, पठानकोट हमले के समय आपके चैनल ने ख़ुफ़िया जानकारी प्रसारित की. ये परंपरा कारगिल युद्ध के समय बरखा ने शुरू की, 26/11 के मुंबई हमलों में पूरे देश ने देखा. पठानकोट में फिर वही किया. कायदे से आपके चैनल पर देशद्रोह का मुक़दमा चलना चाहिए, लेकिन चूंकि मीडिया का मामला है इसलिए बस 1 दिन के लिए प्रसारण बंद करने को कहा गया. न्यूज चैनल में काम करने वाले प्लंबर की गाड़ी पर भी “प्रेस” लिखा देखकर पुलिस उनको बिना हेलमेट जाने देती है, आप तो असली प्रेस हैं. सरकार ने डरना ही था.

कानून में सजा के कई सारे प्रकार हैं, सबका अलग-अलग उद्देश्य है. मुख्य चार प्रकार हैं:
1. Deterrent: सजा के डर से दूसरे लोग अपराध करने से डरें. [चैनल पर बहुत बड़ा फाइन, जिससे आर्थिक रूप से विकलांग हो जाये.]
2. Retributive: बदला, आँख के बदले आँख. [किसी चैनल की गोपनीय सूचनाएं सार्वजनिक कर के]
3. Preventive: अपराधी को अपराध करने से रोक देना. [न्यूज चैनल को हमेशा/लम्बे समय के लिए बंद करवा देना]
4. Reformative: अपराधी को सुधारने के लिए सांकेतिक सजा देना. [क्लास के बहार खड़ा करना, न्यूज चैनल का प्रसारण 1-2 दिन के लिए रोक देना]

पहले तीन प्रायः न्यायालयों तक ही सीमित हैं, लेकिन आखिरी तरीका सरकारें और गैर-न्यायिक संस्थाएं भी उपयोग में लेती हैं.
आपके चैनल के लिए उचित तो था कि पहली तीन में से कोई एक सजा दी जाए, जैसा कि पहले की सरकारें कई बार कर चुकी हैं, पत्रकारिता को सजा दे चुकी हैं. लेकिन तब जनता को पता नहीं चला क्योंकि संवाद तंत्र दलालों के हाथ में था, “बागों में बहार थी, सैयां की सरकार थी“. अब ऐसा नहीं है. आप तिलमिलाए हुए तो थे ही, इसी को आपने लिबरल लोगों की तरह मौका बना लिया. इस reformative सजा को आपने retributive करार दिया. NDTV के 1 दिन के प्रसारण बंद होने को आखिरकार आपने ये साबित कर दिया कि कैसे सरकार देश के सारे चैनलों को बंद कर दिया है, हमेशा के लिए, आपातकाल आ गया है. कारण आपने ये बता दिया कि आपने सरकार से सवाल पूछे थे इसलिए सरकार गुस्से में थी, बदला ले लिया. पठानकोट का नाम तक नहीं लिया, बीच में भोपाल एनकाउंटर केस ले आये. वही केस जिसकी भूमिका में आप व्यथित थे कि जब उन आठ लोगों को सजा नहीं हुई थी तो उनके लिए आतंकवादी शब्द का प्रयोग क्यों हो रहा है? जो आठ निर्दोष लोग सिर्फ दो बार जेल तोड़कर भागे और भागने से पहले सिर्फ एक पुलिस वाले का गला रेता उनको लोग दोषी क्यों मान रहे हैं. और उसी में आगे आप उनको “SIMI कार्यकर्ता” बोलते हैं. कार्यकर्ता?? सच में?? रवीश जी, SIMI एक घोषित और प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन है, इसका हर सदस्य आतंकवादी है. पत्रकारों को ये पता होता है. खैर छोड़िये… आप भी जानते हैं कि 1 दिन का ये बैन आपके मृतप्राय चैनल के लिए असल में संजीवनी बूटी है. जिस तरह आप गालियाँ देखकर खुश होते हैं, इस सजा पर भी हुए होंगे. अगर आपको लगता कि सरकार गलत है तो आप स्क्रीन काली और मुंह सफ़ेद करने की बजाय कोर्ट में जाते. लेकिन ऐसा आप नहीं करेंगे. आप तो खुश हैं इस बैन से और भुनाएंगे इसको. आपकी असल तिलमिलाहट तो ये थी कि जनता ने आपसे सवाल पूछ लिए थे और सरकार से पूछे गए आपके प्रायोजित सवालों के जवाब जनता ने दे दिए थे. तिलमिलाहट में आप आखिर बोल ही गए कि सरकार से ज्यादा जवाब “ट्रोल” दे देते हैं, और इससे आपको डर लगने लगा है.

आगे आप किसी राजकमल झा को कोट करते हैं जिन्होंने कहा है कि “सरकार का हमसे नाराज होना हमारे लिए सम्मान की बात है.” फिर से वही घटिया तर्क. लिबरल तकनीक. Propositional Calculas में इसको fallacy of the inverse कहा जाता है. सरल हिंदी में “दवा अगर अच्छी है तो स्वाद अच्छा नहीं होगा” से ये निष्कर्ष निकालना कि “गोबर का स्वाद अच्छा नहीं है, इसलिए ये अच्छी दवा साबित होगा”. पत्रकार अगर अच्छा काम करे तो सरकार नाराज होगी, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सरकार अगर नाराज है तो पत्रकार अच्छा काम ही कर रहे हैं. हो सकता है वो गोबर खा रहे हों. यहाँ वही हुआ था. आप देशद्रोह कर रहे थे. शर्मिंदा होना चाहिए आप सबको.

आगे आप बोलते हैं कि सरकार आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन रही है. और यही बात आपकी पूरी बिरादरी रात-दिन चिल्ला रही है. और क्या कहा जाय इस विडम्बना पर. जिस सरकार को हमने चुना है उसको ये जिम्मेदारी भी दी है कि जब देश की सुरक्षा पर खतरा हो तो दोषियों को रोके, दण्डित करे. सरकार वही कर रही है. आपको सुधरने का मौका दे रही है. ऐसा करना सरकार का कर्तव्य ही नहीं बाध्यता भी है. अगर वो ऐसा नहीं करेगी तो हम उससे सवाल करेंगे. करते भी हैं.
इस सवाल-जवाब वाली जनता को निपटाने का भी आपने वही लिबरल तरीका अपनाया है. जो आपको जवाब दे उसको आप ट्रोल बोल देते हैं. जो सवाल करे उसको आप “अब्यूजिव” करार देते हैं. कुछ लोग होते हैं हर जगह, कमजोर आत्म-नियंत्रण वाले जो आपकी हरकतों से तिलमिला कर गाली देने जैसा गिरा हुआ काम कर देते हैं और उस एक गाली की आड़ में आप सारे सवाल गायब कर देते हैं. गाली तो वैसे आप भी देते हैं, अपने इस चर्चित प्रोग्राम में आपने सवाल पूछने वाली जनता को “दंत चियार, दलाल, गुंडा” सब बोला है. एक दिन आप युवाओं के पलायन के मामले में बिहार और महाराष्ट्र की तुलना कर रहे थे. भयंकर आंकड़ों में भारी गलती थी आपके. मैंने इंगित करने की कोशिश की [Link]. आपने देखकर भी अनदेखा कर दिया.

उसके बाद आप रोज टीवी और ट्विटर पर आते रहे, कभी भी इसकी चर्चा नहीं की. कुछ दिन बाद किसी ने आपको “वैश्या का पुत्र” बोल दिया. निश्चय ही गलत और निंदनीय है ये. लेकिन आप अपनी प्राथमिकता देखिये. सज्जन पत्रकार को चाहिए कि राज्यों से पलायन के आंकड़ों को गंभीरता से ले, गालियों को अनसुना करे. आपने आंकड़ों को अनदेखा कर दिया और उस एक गाली को छाती से चिपकाए बैठे हैं. बैठे भी क्यों न? आखिर जब तर्क ख़तम हो जाते हैं तो वही गाली ढाल बनकर आपको बचाती है. आपने कम से कम 20 बार उस गाली का जिक्र किया है. एक बार तो पूरा ब्लॉग लिख दिए कि आपकी माँ वैश्या भी हों तो आपको समस्या नहीं, वैश्या होना गलत नहीं है. खैर वो आपकी निजी सोच और पारिवारिक मामला है. लेकिन ये जरूर है कि आपको सही आंकड़े देने वाले को आपने ब्लाक कर दिया और गाली देने वाले को नहीं किया. आपको अब भी लगता है कि आपकी नग्नता छिपी हुई है तो नमन आपकी बेशर्मी को.

पूरे एक घंटे आपने तमाशा किया और प्रोपगंडा करने की कोशिश करते रहे कि कैसे एक दोयम दर्जे के चैनल के 1 दिन के बैन को आपातकाल बना दिया जाए. एक बार फिर आपने तथ्यों और तर्कों को गायब किया, ड्रामा और तमाशा करते रहे. अपने विचारों को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” और “माइम आर्ट” के लिबास से ढांपकर परोसते रहे. रवीश जी, कहीं कोई आपात काल नहीं आ रहा, जब हम 60 साल पुराने, दलालों से लैस, अनुभवी राजवंश को झटके में उखाड़ सकते हैं तो ये सरकार तो कुछ ही साल पुरानी है. अब तो हमारे पास सवाल पूछने का तरीका भी है. जिस दिन आपातकाल लाने के बारे में ये सरकार सोचेगी भी उस दिन आपके स्क्रीन काली करने से पहले हम इसको उखाड़ फेंक चुके होंगे.

अब भी वक़्त है रवीश जी. जगाइए अपने जमीर को, हटाइये इस पर पड़े परदे को. आपको जवाब देना पसंद नहीं, मत दीजिये, लेकिन सवाल तो पूछिए. हमसे अच्छे सवाल आपके होंगे. आप मार्गदर्शक बनिए. कुछ ऐसा कीजिये कि लोग भी कहें कि “बागों में बहार है, रवीश दलाल नहीं पत्रकार है.” और हाँ जिस दिन आप इस सवाल-जवाब वाली जनता को ट्रोल कहना बंद कर देंगे, वो आपको दलाल कहना बंद कर देगी.

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