वामपंथी तथा पश्चिमी शिक्षा-व्यवस्था : अलगाववादी राजनीती की मूल जड़

भारत की शिक्षा व्यवस्था में अधिकतर बड़े विश्विद्यालयों में कला क्षेत्र में सामाजिक विज्ञान में बच्चों को शुरू से यह पढाया जाता है के भारत एक ऐसा देश है जहाँ हमेशा से दलितों पर अत्याचार होते आये हैं | इन अत्याचारों को साबित करने के लिए अक्सर शम्भूक (रामायण), एकलव्य और कर्ण (महाभारत), अम्बेडकर आदि के उदाहरण दिए जाते हैं | इसके बाद मनुस्मृति तथा वर्ण व्यवस्था को गाली देते हुए वामपंथी दलित चिन्तक बात को घुमा फिर कर हिन्दू धर्म और ऋग वेद से जोड़ देते हैं | अंत में निष्कर्ष यह निकाला जाता है की हिन्दू धर्म में आधारित जाती व्यवस्था ही दलित शोषण की जड़ है तथा जब तक हिन्दू धर्म रहेगा तब तक जाती प्रथा रहेगी और तब तक दलितों पर अत्याचार होता रहेगा , अतः यदि शोषण समाप्त करना है तो हिन्दू धर्म को समाप्त कर दिया जाए क्योंकि यह पूरी तरह ब्राह्मणों के कब्जे में हैं और वो सबको गुलाम बना कर रखना चाहते हैं |

यह पूरी बात जो मैंने कुछ शब्दों में ऊपर लिखी है, यह समझाने के लिए कई सामाजिक विज्ञान, समाज कार्य तथा समाजशास्त्र पढ़ाने वाले बड़े विश्वविध्यालय २-३ साल का समय लेकर या कई बार पीएचडी करने तक युवाओं के मन में भरते चले जाते हैं | इससे ना सिर्फ हिन्दुओ के प्रति नफरत बच्चों के मन में पैदा होती है बल्कि भारत की हर प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति भी इनके मन में नफरत का भाव पैदा होता है | क्योंकि यह शिक्षक बहुत खूबसूरती से हर प्राचीन भारतीय संस्कृति को हिन्दुओं से जोड़ चुके होते हैं ( जैसे वेद, उपनिषद, संस्कृत, पुराण, नालंदा आदि )| इस तरह की पढाई का नतीजा दो तरह के छात्रों के रूप में बाहर आता है –

पहले वो छात्र जिन्होंने हिन्दू धर्म या भारतीय संस्कृति के बारे में घर में कभी ज्यादा पढ़ा या जाना नहीं होता | यह छात्र पूर्ण रूप से हिन्दू विरोधी तथा भारतीय संस्कृति के विरोधी हो जाते हैं और ऊंची जातियों को गालियाँ देने लगते हैं तथा हिन्दू धर्म को नष्ट करना ही उनके अकादमिक पेशे का लक्ष्य बन जाता है | यह जिस भी एनजीओ, संस्था , अख़बार , मीडिया आदि में काम करते हैं , यह हमेशा इसी फ़िराक में रहते हैं के किसी तरह से दलितों के शोषण का सहारा लेकर ब्राह्मणों और ऊँची जाती और हिन्दुओं के खिलाफ बोला या लिखा जाय | इस तरह के छात्रों से वामपंथी बहुत खुश रहते हैं तथा कई बार उन्हें अपने साथ या तो छात्रवृत्ति दे देते हैं या फिर उन्हें सहायक-प्राध्यापक बना लेते हैं | इन छात्रों को चीन, पाकिस्तान, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका भी कई तरह की नौकरी और छात्रवृत्ति प्रदान करते हैं ताकि यह उनकी छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वार) रणनीतियों में भारत को तोड़ने के काम आ सकें | उदाहरण के तौर पर फोर्ड फाउंडेशन, एमनेस्टी इंटरनेशनल, ग्रीन पीस, कश्मीर के अलगाववादी एनजीओ आदि |

दुसरे वो छात्र होते हैं जो या तो थोडा बहुत भारत और भारतीय संस्कृति तथा धर्म के विषय में पढ़े होते हैं या फिर घर में इन्हें कुछ धार्मिक संस्कार मिले होते हैं जिसके कारण इन्हें हिन्दू धर्म तथा भारत की थोड़ी बहुत समझ होती है | इन छात्रों को समाजशास्त्र के क्षेत्र में मेकाले समर्थक तथा वामपंथी समर्थक शिक्षको द्वारा रोज अपमानित किया जाता है | जब भी यह इनके धर्म या संस्कृति का पक्ष लेने का प्रयास करते हैं तब इन्हें तुरंत चुप कराकर बैठा दिया जाता है या अन्य छात्रों के सामने बेईज्ज़त किया जाता है | इसका नतीजा यह होता है के ३ साल या ५ साल में नम्बर प्राप्त करने तथा कैंपस में बैठने के लालच में यह विरोध करना बंद कर देते हैं | पर मन ही मन देश तथा धर्म के अपमान का घूंट रोज पीकर हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं तथा खुद को सेक्युलर कहने लगते हैं | यह छात्र बोलते हैं हम नास्तिक है हमें हिन्दू धर्म से लेना देना नहीं है | इनके मन में हीन भावना इस हद तक बैठ जाती है के इन्हें सच में लगने लगता है के इनकी जाती , इनका धर्म और इनकी संस्कृति ही भारत की समस्याओं की मूल जड़ है तथा ये इस विषय में किसी से चर्चा करने में भी डरने लगते हैं | इन्हें डर लगने लगता है की जैसे ही यह भारत की सभ्यता या संस्कृति की बात करेंगे, तो पढ़े लिखे बुद्धिजीवी लोग इन्हें संघी गुंडा, तालिबानी या अराजक तत्व कहकर बुद्धिजीवी वर्ग से जात-बाहर कर देंगे | इनमे से कई छात्रों को कॉलेज से निकलने के बाद लगने लगता है के यह सब कॉलेज की शिक्षा व्यवस्था दलितों ने या अन्य संप्रदाय के लोगों ने बनायीं है अतः वह बाहर निकलकर दलित या मुस्लिम विरोधी हो जाते हैं |

दुःख की बात यह है की इन दोनों ही तरह के छात्रों के मानसपटल पर भारत की संस्कृति एवं सभ्यता के प्रति इज्जत बहुत कम रह जाती है तथा समाज को आपस में बांटने की प्रवृति अधिक बढ़ जाती है | अपने धर्म के प्रति इनके मन में सम्मान की भावना ना के बराबर शेष रह जाती है | इसका मूल कारण वह शिक्षा होती है जो इन्हें कालेजो में दी जाती है | इन्ही में से कई छात्र अनजाने में ही कई ऐसे कई पक्षपात पूर्ण शोध कर बैठते हैं जो दुसरे देशों में भारत की छवि को धूमिल कर देते हैं | यही कारण है के दुनिया में भारत की छवि कभी सपेरों का देश, कभी जादू टोना करने वालों का देश, कभी महिला विरोधी तथा बलात्कारी देश तो कभी दलित वर्ग का शोषण करने वाले देश की बना दी जाती है | इससे ना सिर्फ भारत की छवि दुनिया में धूमिल होती है बल्कि भारत में आ रहे विदेशी निवेश पर भी इसका गहरा असर होता है तथा इसमें भारी कमी होती है | यह भी एक कारण है के हमारे दुश्मन देश कई बार ऐसे शोधकर्ताओं को पैसा एवं पुरूस्कार देते हैं, जिससे भारत विश्व की बड़ी शक्ति ना बन सके  |

मेकाले के समय से इस तरह की शिक्षा की शुरुआत हुई है | उस समय अंग्रेजो ने भारत के आत्मसम्मान को गिराने तथा अंग्रेजों के प्रति सम्मान को बढाने के नजरिये से इस शिक्षा की शुरुआत की थी | पर अफ़सोस के भारत के आजाद होने तक कई सारे लोग इसी शिक्षा में पढ़ लिखकर हमारे सारे विश्वविद्यालयों में शिक्षक तथा प्राध्यापक बन गए और बाद में इन्होने अंग्रेजों के ही द्वारा कराई गयी रिसर्चों को आगे बढाया जैसे सती-प्रथा, दलित शोषण, मनुस्मृति में कमियां आदि| बाद में वामपंथियों ने इसे ही आगे बढाया क्योंकि इसमें उनका राजनैतिक हित भी था | पर आज इसी कारण देश कई समुदायों में बंट गया है कहीं दलित-ब्राह्मण लड़ रहे हैं, कही द्रविड़-आर्य, कही उत्तर पूर्वी राज्यों में विरोध चल रहा है , कहीं मूलनिवासी के नाम पर आदिवासियों में नफरत का जहर भरा जा रहा है | आज जरुरत है भारत की शिक्षा नीति में बदलाव की, आज जरुरत है देश की सोच में बदलाव की |

आज भारत में जितने भी देश विरोधी आन्दोलन चल रहे हैं असल में इनमे से कई युवा देशद्रोही नहीं हैं बल्कि इनके दिमागों में अलगाववादी शिक्षा के द्वारा जहर भरा गया है चाहे यह कश्मीरी अलगाववादी हों, नक्सलवादी हों या फिर तमिलनाडु में ‘आर्य या हिंदी’ विरोधी संगठन , इसी तरह कई आन्दोलन जो दलित पुनरुत्थान या महिला सशक्तिकरण के नाम से चल रहे हैं इनमे से कई विदेशी चंदे से तथा विदेशियों के इशारे पर, या तो भारत को आपस में बांटने, या फिर आपस में लड़ाने के लिए चल रहे हैं | इनमे काम करने वाले अधिकतर भोले भाले लोगों को पता ही नहीं है के अनजाने में वो भारत तोड़ने की बड़ी साजिश का हिस्सा बनते जा रहे हैं | अतः सरकार को इस विषय को गंभीरता से लेते हुए इस शिक्षा को नयी शिक्षा नीति में सख्ती से बदलने के विषय में सोचना चाहिए ताकि भारत का भविष्य अंधकार में जाने की जगह सही दिशा में जाए | हमारे युवा ही हमारी शक्ति हैं तथा इन्ही के दम पर भारत विश्वगुरु बनेगा पर यदि इन्हें ही ऐसी शिक्षा दी गयी के यह “भारत तेरे टुकड़े होंगे ….”, “हमें चाहिए भारत से आजादी ……”, “ भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी ….” आदि नारे लगाने लगे तो भारत की अस्मिता तथा अखंडता को अन्दर से ही खतरा हो जायेगा तथा सोवियत यूनियन की तरह हमारे देश के टुकड़े होने से भी कोई नहीं रोक पायेगा | अतः सभी भारतियों को इस विषय में सोच कर सही और गलत का फैसला लेना चाहिए तथा जहाँ भी इस तरह की जहरीली शिक्षा मिल रही हो उन संस्थानों का बहिष्कार करना चाहिए , तथा सरकार को चाहिए के नयी शिक्षा नीति में भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्रीयता पर  आधारित शिक्षा का प्रचार प्रसार देश में करें, जिससे देश के गौरवमयी इतिहास का पुनर्जागरण करके , देश को पुनः सोने की चिड़िया बनाया जा सके

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