Saturday, January 23, 2021
Home Hindi क्योंकि वो कन्हैया नहीं है

क्योंकि वो कन्हैया नहीं है

Also Read

K. S. Dwivedi
नया कुछ भी नहीं है, सब सुना हुआ ही है यहाँ.

आदरणीय भारत भाग्य विधाता, गरीबों के तारनहार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के धुरंधर!

वो भी गरीब परिवार से है, वो भी एक बिहार के एक छोटे से गाँव से आकर दिल्ली में रहता है. उसकी भी कुछ समस्याएं हैं. उसके जैसे हजारों हैं जो उसी दुःख से ग्रस्त हैं. वो भी पिछले साल भर से उन हजारों लोगों के साथ अपनी बात रखता है, रैली करता है, नारे लगाता है. लेकिन उसे सुनना तो दूर कोई देखता तक नहीं. उसके लिए किसी नेशनल टी वी चैनल की स्क्रीन काली करना तो दूर, उसको तो क्षेत्रीय भाषा के किसी सांध्य दैनिक का झोलाछाप रिपोर्टर भी भाव नहीं देता. बात तक नहीं करता. शायद कमी उसके नाम में है, कन्हैया या खालिद नहीं है उनमें से कोई. या शायद उनका तरीका गलत है. वो बात करते हैं आपके और उनके बीच असंवाद की दीवार तोड़ने की. काश! उन्होंने भी देश को तोड़ने की बात की होती तो आज उनकी बात को भी नेशनल टी वी चैनल्स दिखाते, वो भी शायद पैनल डिस्कशन का मुद्दा होते. या शायद उनकी कहानी में वो दर्द नहीं है जो करदाताओं के पैसे पर पल कर, वर्षों तक सरकारी पैसे से बहुत बड़े केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अपनी अय्याशी से ऊब कर, एडवेंचर के लिए देश को गाली देने वाले कन्हैया की कहानी में हैं. उसकी कहानी साधारण है. गरीब मां-बाप ने एक-एक पैसा जोड़कर स्नातक करवाया.

घर को गरीबी ने बाहर निकालने का दबाव इतना ज्यादा था कि स्वार्थी बनना पड़ा, “समाज”, “दलित” और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” जैसे महत्वपूर्ण विषयों के लिए सोच भी नहीं पाया. स्नातक के बाद नौकरी करने चला गया. जब उसके अन्य सहकर्मी गाड़ी और इंदिरापुरम वाले फ़्लैट की कीमतें भर रहे थे तब वो खोड़ा कॉलोनी के सिंगल रूम में रहकर पैसे बचा रहा था. छोटे भाई, बहनों की पढाई की जिम्मेदारी उसे ही उठानी थी. उससे निवृत्त होकर कुछ पैसे अपने लिए बचाए. विलास के नामपर 6000 का एक नया मोबाइल फोन खरीद लिया था. उसमें ऍफ़ एम रेडियो भी था. दिल्ली की चकाचौंध को देखकर अँधेरे में डूबे अपने गाँव पर तरस आता था उसको, जहाँ आज़ादी के इतने साल बाद भी सड़क नहीं पहुंची. बिजली ना आने की शिकायत नहीं थी. सड़क आये तब तो बिजली आये. एक दिन बोला अब जिम्मेदारियों का बोझ कुछ हल्का होने पर मुझे भी अपने गाँव और समाज के लिए कुछ करने की इच्छा हुई है. लेकिन अब समझ आ रहा है कि तरीका गलत चुन लिया उसने. उसने मेहनत कर के आई ए एस बनने की सोची. कुछ दिन तक नौकरी के साथ तैयारी की, संभव नहीं हो पाया. सो पाई-पाई जमा करके अगले एक साल का खर्चा जोड़ा और नौकरी छोड़कर तैयारी में लग गया. इसी बीच अपने जीवन का उनतीसवां पतझड़ भी देखा. UPSC का ये उसका पहला और आखिरी मौका था. जी जान से जुट गया. लोग एक-एक दो-दो साल पहले से तैयारी करते हैं, उसके पास बस 8 महीने थे सो मेहनत भी औरों से ज्यादा करनी थी. दो वैकल्पिक विषय पढने शुरू किये, फिर ख़तम किये. फिर अचानक पता चला कि पाठ्यक्रम बदल गया है. एक ही वैकल्पिक विषय पढ़ना है. UPSC जैसी परीक्षा में सिर्फ चार महीने में बदले हुए पाठ्यक्रम को देखकर हिम्मत जवाब देने लगी. फिर भी लगा रहा. कुछ हम लोगों ने हौसला बढ़ाया, कुछ उसकी ने गाँव और समाज के लिए करने की ललक. हिम्मत करके परीक्षा दी. जिसका डर था वही हुआ. चयन नहीं हुआ. पिछले साल भी कुछ लोगों के साथ ऐसा ही हुआ था. परीक्षा से कुछ महीने पहले पाठ्यक्रम बदला गया. आखिरी मौका था, निकल गया सो वो भी रोजगार की तलाश में लग गया.

हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के साथ UPSC के भेदभाव का मुद्दा बहुत पुराना था. लोग बहुत पहले से आवाज उठा रहे थे. लेकिन चुनावी वर्ष होने की वजह से इस बार राहुल गांधी जी ने सुन लिया. उसके बाद मीडिया ने भी सुना और सबको सुनाया. वो अलग बात है कि जो असल मुद्दा था और जो मीडिया ने सुनाया उसमें जमीन आसमान का अंतर था. मुद्दा था CSAT का पेपर जो ग्रामीण परिवेश से आने वालों के लिए कठिन था. इसका एक कारण था UPSC द्वारा अंग्रेजी से अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ और हिंदी में किया जाने वाला घटिया स्तर का अनुवाद, मीडिया ने मुद्दा बना दिया “UPSC का अंग्रेजी प्रेम”. बहरहाल परीक्षा से तीन महीने पहले सरकार ने कहा कि इस बार लोगों को दो अतिरिक्त मौके मिलेंगे. लेकिन इसमें भी पिछले साल वालों को मौका नहीं दिया. जबकि सबसे बड़ा अन्याय उन्हीं के साथ हुआ. तीन महीने में तैयारी संभव नहीं थी, सो उसने सोचा कि एक और मौका है. उसके लिए कोशिश करेगा. तब तक अपनी आर्थिक स्थिति भी सुधार लेगा वो. हम सबने भी यही सलाह दी. एक बार फिर से तैयारी में जुट गया. बदले हुए पाठ्यक्रम में CSAT बहुत महत्वपूर्ण हो गया था, उसपर अतिरिक्त मेहनत की. और एक बार फिर UPSC ने परीक्षा से 3 महीने पहले बताया कि अब CSAT के नंबर नहीं जुड़ेंगे. इस बार प्री नहीं निकाल पाया. CSAT में ज्यादा मेहनत की, वही हट गया. तकनीकी रूप से उसे 3 मौके मिले लेकिन एक भी साबुत नहीं. हर बार परीक्षा से 3-4 महीने पहले का बदलाव असहनीय था. कुछ लोग विगत वर्षों से मांगकर रहे हैं कि CSAT होना चाहिए, कुछ का कहना है कि नहीं होना चाहिए. लेकिन एक बहुत बड़ा वर्ग उसके जैसों का भी है. जो कहते हैं कि आप सरकार हैं, आपकी परीक्षा है, कुछ भी पूछिए. लेकिन पढने का समय तो दीजिये. IES के पाठ्यक्रम में बदलाव हुआ और उन्होंने डेढ़ साल पहले बता दिया. हमको क्यों 3-4 महीने पहले बताया जाता है? वो भी तब जबकि पूरा देश जानता है कि लोग सालों पहले से इसके लिए तैयारी शुरू कर देते हैं. उसके जैसों को आपके पाठ्यक्रम में बदलाव से कोई समस्या नहीं है. न होगी. बस पढने का समय दे दिया होता. ये वो लड़ाई हारा जिसमें उसे लड़ने का समय ही नहीं दिया गया. अपनी अपनी ठीक-ठाक नौकरी छोड़कर बेरोजगार भटक रहा है. पिछले दो साल से UPSC के छात्र अपनी मांग उठा रहे हैं, सुनने वालों ने गलत सुना, और वो मांग भी पूरी कर दी जो नहीं मांगी. लेकिन जो मूल मुद्दा था वो तो सुना ही नहीं. अब सबका मुंह भी बंद करा दिया ये बोलकर कि “भाग जाओ, कुछ लोगों को 2 साल अतिरिक्त दिए थे, तुममें काबिलियत ही नहीं है, हारे हुए हो तुम”.

हर साल 8-10 लाख लोग परीक्षा देते हैं, पाठ्यक्रम कुछ भी हो, कुछ लोग तो निकल ही आयेंगे. जो भी हो, लेकिन वो खुद को हारा हुआ नहीं मानता. आपने लड़ने का मौका कब दिया उसे? भविष्य से खिलवाड़ किया उसके और उस जैसे हजारों के साथ. लेकिन हार नहीं मानी है, आज भी ट्यूशन पढ़ाने जाएगा, आने के बाद आज भी किसी सड़क पर नारे लगाते हुए भटकेंगे वो लोग. पिछले एक साल से भटक रहे हैं. कभी 10 जनपथ, कभी 11 अशोक रोड और कभी जंतर-मंतर. आज शायद मुखर्जी नगर में धरना देंगे. मैं जानता हूँ कि, वो भटक रहा हैं लेकिन “भटका हुआ” कभी नहीं बनेगा. ये जानते हुए भी कि जैसे ही वो “भटका हुआ” बनेंगा उसको भी देखकर “लुटियन की दिल्ली” जय कन्हैया लाल की बोलकर गले लगा लेगी और आप भी तब पूरे ध्यान से उसकी बात सुनेंगे.

उसने फैसला कर लिया है, वो कन्हैया नहीं बनेगा, क्योंकि वो स्वाभिमानी है. वो अपने अपने गरीब होने का फायदा उठा कर दूसरों की कमाई पर पलना नहीं चाहता. वो चाहता है कि वो अपनी मेहनत से कमाकर खुद को और अपने जैसों को गरीबी से बाहर निकाले. उसको फासीवाद या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता नहीं है, उसको चिंता है अपने गाँव में नहीं पहुची सड़क की. और उसके लिए वो किसी सरकार को दोष नहीं देता, वो खुद कुछ करने की सोचता है. लेकिन आपको उसकी आवाज नहीं सुनाई देगी, उसका दर्द नहीं दिखेगा, उसके मां-बाप की गरीबी नहीं दिखेगी, आप अपनी टीवी की स्क्रीन काली नहीं करेंगे क्योंकि वो देश तोड़ने की बात नहीं करता, गरीबी का बंधन तोड़ना चाहता है, क्योंकि वो कश्मीर की आज़ादी नहीं चाहता, वो अपने गाँव के दलितों की दलितपने से आज़ादी चाहता है, क्योंकि वो गरीब मां-बाप को उनके हाल पर छोड़ सरकारी पैसों पर किसी विश्वविद्यालय में ऐयाशी नहीं कर रहा बल्कि अपनी जिम्मेदारियों का बोझ उठाते हुए कन्हैयाओं के लिए भारत सरकार को टैक्स देता रहा है. क्योंकि वो वन्दे मातरम बोलता है, क्योंकि वो कन्हैया नहीं है.

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

K. S. Dwivedi
नया कुछ भी नहीं है, सब सुना हुआ ही है यहाँ.

Latest News

The historic and hopeful January 20, 2021

Let January 20 serve as a stark reminder for the world at large that the democracy may have been halted temporarily but it has returned with greater hope and not fear.

खालसा पंथ की सिरजना के पीछे का ध्येय और गुरु गोबिंद सिंह जी

गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा स्थापित खालसा पंथ और उनकी बलिदानी परंपरा के महात्म्य को समझने के लिए हमें तत्कालीन धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियों पर विचार करना होगा।

कश्मीरी हिन्दूओ का नरसंहार और 31 साल का इंतजार

19 जनवरी 1990 का वो दिन कोई भी कश्मीरी हिन्दू कभी नहीं भूल सकता। 19 जनवरी 1990 का वो दिन न सिर्फ भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए एक काला दिन है।

धार्मिक आतंकवाद

समाज का एक धड़ा है जो कि शकुनि और मंथरा से भी लाखों गुना कपटी और क्रूर है, जो धर्मनिपेक्षता, उदारवादिता और बुद्धिजीविता का नक़ली मुखौटा लगाये आपकी मानकिसकता पर क़ब्ज़ा कर आपके आत्मसम्मान और पहचान को अपंग बनाये बैठा है।

Tale of India’s greatest test victory in Australia

Finally the Indian flag hung around one of the unbreached fortresses at Gabba. The haughtiness which Australians displayed on the field was put down to dust by fearless Indians.

USA is now a constitutional relic & not a republic

All the founders of the US Constitution and even our own framers from the Constituent Assembly must be squirming in their graves, on what is playing out in the US.

Recently Popular

Daredevil of Indian Army: Para SF Major Mohit Sharma’s who became Iftikaar Bhatt to kill terrorists

Such brave souls of Bharat Mata who knows every minute of their life may become the last minute.

गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

एक सफल शासन की नींव समुद्रगप्त ने अपने शासनकाल में ही रख दी थी इसीलिए गुप्त सम्राटों का शासन अत्यधिक सफल रहा। साम्राज्य की दृढ़ता शांति और नागरिकों की उन्नति इसके प्रमाण थे।

5 Cases where True Indology exposed Audrey Truschke

Her claims have been busted, but she continues to peddle her agenda

Taj Mahal Secrets (part-2)

Some unexplainedfacts of Taj Mahal

Girija Tickoo murder: Kashmir’s forgotten tragedy

her dead body was found roadside in an extremely horrible condition, the post-mortem reported that she was brutally gang-raped, sodomized, horribly tortured and cut into two halves using a mechanical saw while she was still alive.