Sunday, August 9, 2020
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रवीश कुमार के कारनामें, जो उन्होंने स्टूडियो में अंधेरा कर के किया

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क्योंकि ये अँधेरा ही ज़माने से NDTV की तस्वीर है… एक बार फिर से रविश आपको अँधेरे में लेकर आ चुके हैं, कोई तकनिकी खराबी नहीं है, आपके लिए कांग्रेस द्वारा भेजा हुआ सिग्नल बिल्कुल ठीक है…

माननीय वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार जी,

मैं भारत का एक आम नागरिक हूँ, नाम नीरज मिश्रा है, आपकी तरह ही टेलीविज़न और फिल्म के लिए काम करता हूँ, और ‘शायद’ आपकी तरह ही समाज को अपनी कला और क्षमता के अनुसार सन्देश देने कि इच्छा भी रखता हूँ। पर यहाँ पर ये शब्द ‘शायद’ मेरे लिए नहीं हैं, बल्कि आपके उद्देश्य की विश्वसनीयता पर एक प्रश्न चिन्ह हैं।

आपके कार्यक्रम कथनानुसार ना मुझे ‘टीवी’ की शिकायत हैं और ना ही मुझे ‘बीपी’ की शिकायत हैं, क्योंकि मैंने मेरे टेलीविज़न सेट को पिछले १० सालों से केबल-टीवी से दूर रखा है, क्योंकि मुझे लगा कि आप जैसे एंकर कोई चिल्ला कर, कोई मीठा मीठा ज़हर उगल कर मेरे ज़हन में ज़हर भरने की कोशिश करेगा। पर इंटरनेट और समाचारपत्र ने पीछा नहीं छोड़ा और उसी क्रम में, मैं आपके प्राइम टाइम शो ‘अँधेरा कायम रहे’ (व्यंग्यात्मक भाषा के लिए क्षमा चाहूँगा) से YouTube पर रु-ब-रु हुआ।

मैं ये साफ़ शब्दों में बता देना चाहता हूँ की मेरी विचारधारा मोदी-प्रेम या कांग्रेस-प्रेम या किसी सांप्रदायिक भावनाओं से परे हैं, और इस सन्दर्भ में ‘केजरीवाल’ जैसे शब्दों को में पूरी तरह उपेक्षित करूंगा। स्पष्टता से कहना चाहूँगा कि, मेरे देश, ‘भारत’ का जो भला सोचे व करे वो मेरे लिए भला हैं।

अब वापस आते हैं आपके प्राइम टाइम शो ‘अँधेरा कायम रहे’ पर, जिसे मैंने दो दिन पहले रात के २ बजे YouTube पर देखा, जिसको देखते ही मेरा BP ज़रूर ऊपर चला गया, और उस रात मैं ढंग से सो नहीं पाया। किस तरह से आपने काले स्क्रीन पर सफ़ेद एवं लाल रंग के प्रबल एवं दहला देने वाले शब्दों को चुन चुन डाला और आम जनता के मस्तिष्क पर लगातार ४० मिनट तक हैंमेरिंग करते रहे, और ये जताने कि कोशिश कि आप उनके सबसे बड़े हिमायती हैं। रिवर्स साइकोलॉजी एवं शातिर पत्रकारिता का उम्दा उदहारण दिया हैं आपने। मैं यहाँ ये भी बता दूँ कि मैं अपने विचार और वक्तव्य में, ‘फ्रीडम ऑफ़ स्पीच’ का पुरज़ोर प्रयोग करूंगा पर अपनी सीमाओं में रहकर।

 

वापस आते हैं, रिवर्स साइकोलॉजी एवं शातिर पत्रकारिता के ऊपर.. यहाँ मैं आपके पूरे शो के एक-एक बिंदु पर प्रकाश डालूँगा, जिससे साफ़ हो जाएगा कि इस कार्यक्रम के द्वारा आप भी वही कर रहे हैं जिसका आरोप आप दूसरों पर डाल रहे हैं और बड़ी चालाकी से खुद पर भी थोड़ा आरोप लेते हुए खुद को मासूम दिखाने की सफल कोशिश भी कर रहे हैं। मैं सिर्फ बातें इस शो के प्रसंग में ही करूंग, आपने अतीत में क्या किया, क्या कहा और क्या दिखाया, उन सबके ज़िक्र को मुख्य रूप से इस विश्लेषण से दूर ही रखने की कोशिश करूंगा। चलिए शुरू करते हैं:

१. पहले के कुछ मिनट में ही आप हमें और खुद को बीमार घोषित कर देते हैं, TRP से लेकर नैतिकता तक का पाठ पढ़ाते हैं और अंत मैं एक पत्र कि चर्चा करते हुए खुद को पीड़ित भी घोषित कर देते हैं कि आपको पत्र द्वारा जला देने कि धमकियां भी मिलती हैं। – यहीं से आपने ‘आप’ के सिद्धांत को अपना लिया, पहले खुद को भुक्तभोगी बताओ और फिर खुद को साधू बताते हुए सहानभूति बटोरो।

२. फिर बात शुरू होती हैं वाद-विवाद की, जवाबदेही से निशानदेही तक, आप ‘जनमत को मौत का खेल’ तक बुलाते हैं (साथ मैं कैमरामैन के इशारे पर आप परफेक्ट फ्रेम के लिए पानी का ग्लास भी एडजस्ट करते हैं) और कहते हैं कि कुछ लोग मिलकर ‘एक’ जनमत का राज कायम करने मैं जुट गए हैं। – यहाँ भी आप मासूम बनते हुए बुरी पत्रकारिता कि बात नहीं कर रहे बल्कि बीजेपी कि बुराई शुरू कर दी। इस कार्यक्रम अथवा शो का उद्देश्य आपने या तो ५वें मिनट मैं ही खो दिया, या शायद यही उद्देश्य था सिर्फ कहानी कहने का तरीका नया था।

 

३. उसके बाद आपका स्क्रीन अँधेरा हो जाता हैं और सबसे पहला निशाना होता हैं अर्नब पे, कैसे कुछ एंकर चिल्ला चिल्ला कर हमें गुस्सा दिलाते हैं – यहाँ पर आपने एक बार फिर से इस कार्यक्रम का उद्देश्य खो दिया। मेरा यही सवाल हैं, ये सारे टीवी चैनल्स कर क्या रहे हैं इतने सालों से? एक दूसरे पर हमला कर राजनीतिक सरपरस्ती हासिल करने की होड़, एक दूसरे को गलत साबित करने के नए नए तरीके ढूंढते रहते हैं, बरहाल आपको बधाई हो रविश जी, आपने उसी क्रम में एक नया तरीका ढूंढ लिया।

४. फिर आप स्क्रीन पे शुरू करते हो, ‘ललकारना’, ‘दुत्कारना’, ‘फटकारना’, ‘धमकाना’, ‘उकसाना’ जैसे शब्दों कि बौछार, हैंमेरिंग शुरू, साथ में चल रहे आपके आवाज़ मैं भी नाटकीय परिवर्तन आता हैं जैसे कोई मनोरोग विशेषज्ञ या पास्ट लाइफ रिग्रेशन एक्सपर्ट अपने मरीज़ से बात कर रहा हो। एक बार आप फिर कहते हैं – ‘हमारा काम सत्ता मैं जो हैं उनसे सवाल करना हैं, अंत अंत तक’। बड़े सफाई से एक बार फिर सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को घसीट लिया आपने। पर बेचारी जनता को आपके मासूमियत के आड़ में चल रहे मनोवैज्ञानिक खेल का अभी तक कोई अंदाज़ा नहीं हैं।

५. फिर आप और भी भारी शब्दों का चयन करते हैं और कहते हैं – “सबकी हताशा को अगर हम हवा देने लगे तो आपके भीतर भी गरम आंधी चलने लगेगी जो एक दिन आपको भी जला देगी”…..हम ये ना भूलें कि इन वौइस् ओवर के साथ-साथ काले स्क्रीन पर शब्दों की बौछार भी चल रही हैं, इसीलिए तकनीकी रूप से स्क्रीन पर अँधेरा नहीं हैं, सिर्फ उसका बैकग्राउंड काला करके उसके ऊपर म्यूजिक, शब्दों और वौइस् ओवर के द्वारा अच्छा मनोवैज्ञानिक खेल खेला जा रहा हैं।

६. अब बात शुरू होती हैं JNU के मुद्दे पर, जहाँ पर लोगों कि प्रतिक्रिया को उनके परिवार के अनुशाशन से तुलना करने कि कोशिश कि जाती हैं।रविश जी, एक भोला भला सिपाही जो बॉर्डर पे गोली चलता हैं वो अपने घर वापस आकर अपने घरवालों को गोली नहीं मारता। प्रतिक्रिया परिस्थिति, व्यक्ति, स्थान और विषय पर निर्भर करती हैं, आपके तुलना करने कि क्षमता थोड़ी विचारणीय हैं। कैसा महसूस करेंगे अगर मैं ये कहूँ कि आपमें और अर्नब मैं भी वही समानता हैं जो कि एक बन्दूक और मीठे ज़हर में हैं, इंसान मरते दोनों से ही हैं, पर तरीका अलग-अलग होता हैं। हर इंसान का सफर एक दूसरे से अलग होता है, और परिवेश के हिसाब से अलग समझ होती है, अगर आप उन्हें उकसाएंगे तो उनकी प्रतिक्रिया उनके समझ के अनुसार होगी और जिसके भिन्न-भिन्न करक हो सकते हैं। राष्ट्रीयता और देशभक्ति की भावना लोगों मैं अलग-अलग तरीके से होती हैं। हनुमनथप्पा की देशभक्ति और आपकी देशभक्ति में आसमान ज़मीन का फ़र्क़ हैं, सेंट्रली एयर कंडिशन्ड स्टूडियो में शब्दों से देशभक्ति का विश्लेषण करना ज़ाहिर सी एक अलग बात है।

७. आपका अगला हमला एंकर पर, आपने कहा, “एंकर क्या है – जो भीड़ बनता हो और भीड़ को उकसाता हो, मारो मारो पकड़ो पकड़ो मैंने भी चिल्लाया है, आपने कहाँ आपने ऐसी गलती सिर्फ एक बार की है, आपको उस रात नींद नहीं आई” – और आप भी यहां वही कोशिश कर रहे हैं, एंकर को एंकर के खिलाफ करके, ‘मारो-मारो’, ‘पकड़ो पकड़ो’, जैसे शब्द स्क्रीन पर बार बार दौड़ते हुए, साथ में आपकी नाटकीय आवाज़ और बैकग्राउंड में चलता हुआ डरावना म्यूजिक, अपने आप में गजब का मनोवैज्ञानिक खेल। हमारे जैसे लोग ऐसे शब्दों और संगीत का प्रयोग अक्सर काल्पनिक कहानियों को कहने में करते हैं।

८. मसला आ गया सैनिकों के शहादत पर, आपने कहा – ‘सैनिकों की शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है, उनकी शहादत के नाम पर किसी को भी गद्दार ठहराया जा रहा है’ – बीजेपी पर एक बार फिर से हमला, क्योंकि प्रधानमंत्री हनुमनथप्पा से मिलने जाते हैं? जाना तो सबको चाहिए, आपको भी और ‘आप’ को भी, कांग्रेस को भी, सीपीआई के मेम्बरों को भी और JNU के नुमाइंदो को भी, लेकिन रोटियां सेंकी जाती हैं अख़लाक़ और रोहित वेमूला के चिता पर, क्योंकि राजनीती तो वहां होती है। आपने अपने काले कार्यक्रम में हनुमनथप्पा और उसके साथियों का ज़िक्र तक करना उचित नहीं समझा, कारण आपकी सकारात्मक पत्रकारिता।

९. फिर आपने जिक्र किया कि कैसे जंतर मंतर पे सैनिकों के मेडल छीन लिए गए उनके कपडे फाड़ दिए गए – शहादत सर्वोच्च है पर क्या शहादत का इस्तेमाल भी सर्वोच्च है? फिर से बीजेपी पर हमला, बार बार शब्दों कि बौछार स्क्रीन पर, यहाँ पर सैनिकों को भी बीजेपी के खिलाफ भड़काने कि कोशिश कर रहे हैं, सच बोल देते कि OROP तो ज़माने से चल रहा हैं, कांग्रेस ने अनदेखा किया, बीजेपी तो मसले का हल ढूंढने की कोशिश तो कर रही हैं, पर आप वो नहीं कहेंगे, क्योंकि आपका उद्देश्य इस काले स्क्रीन वाले शो का कुछ और ही था। आप पूरी मासूमियत से ये कहने की कोशिश में लगे हैं कि बीजेपी ही हर समस्या की जड़ हैं। ध्यान देने वाली बात है कि, अभी तक आपके इस काले स्क्रीन वाले कार्यक्रम में आपने सोनिया, राहुल, कांग्रेस, ममता, अरविन्द, केरल, कर्नाटक, सीपीआई, वेस्ट बंगाल, किसी का कोई ज़िक्र नहीं। इससे क्या आपके शो का वास्तविक प्रयोजन साफ़-साफ़ ज़ाहिर नहीं होता होता????

१०. फिर अपने मुद्दा उठाया पीडीपी एंड बीजेपी, कश्मीर में भारत विरोधी नारे को JNU के नारे से तुलना की, कमाल की बात है, विषय, वस्तु और स्थान में कुछ फ़र्क़ ही नहीं समझते आप!!! एक बार फिर मासूमियत का मुखौटा पहन कर बीजेपी पर इल्जाम मढ़ दिया, ज़िक्र कर देते यूनिफार्म सिविल कोड का भी थोड़ा, क्यों हिम्मत नहीं हुई सच बोलने की??

११. आपने कहा, ‘कश्मीर की समस्या इस्लाम की समस्या नहीं है, उसकी अपनी जटिलता है, उसका भारत के अन्य मुसलमानों से कोई लेना देना नहीं है…उससे सरकारों पे छोड़ देना चाहिए’ – माना कश्मीर की समस्या इस्लाम की समस्या नहीं हैं, उसकी अपनी जटिलता हैं, उसका भारत के अन्य मुसलमानो से कोई लेना देना नहीं हैं, और निश्चित तौर पे उसे सरकार पर छोड़ देना चाहिए, तो क्यों नहीं छोड़ देते आप??? अभी आपने २ मिनट पहले, पीडीपी और बीजेपी की चर्चा की… JNU की घटना को कश्मीर से जोड़ दिया, क्यों?? और एक ऐसे कार्यक्रम में चर्चा कर रहे हैं जहाँ आप मीडिया में होकर अन्य मीडिया वालों को बईमान साबित करने में लगे हैं, ये सोच कर कि इससे आपकी ईमानदारी साबित हो जायेगी, पर कर आप वही रहे हैं, कीचड़ उछलने का काम, जो सब कर रहे हैं, बस मीठे लहजों का इस्तेमाल करके।

१२. फिर आपने कहा, ‘पत्रकारिता – जो हमें भड़काने की बात करे, उकसाने की बात करे, सामाजिक द्वेष फ़ैलाने की बात करे, उसका बयान ना दिखाना है ना छापना है’ – और देखिये अभी फिलहाल आप भी वही कर रहे है 🙂 हंमेरिंग थ्रू टेक्स्ट न म्यूजिक – बीजेपी के खिलाफ इस कार्यक्रम के द्वारा ये बताने की कोशिश की जा रही हैं कि कैसे मीडिया का अपहरण कर लिए गया हैं और पूरी मीडिया आपको छोड़ कर बीजेपी के हाथ की कठपुतली बन चुकी है। उस हिसाब से तो कांग्रेस और आपका रिश्ता भी तो जग जाहिर है। पाखण्ड की भी हद होती जनाब, समय के साथ आखिर आपने भी राजनेताओ से मीठी छुरी चलाने का हुनर सीख ही लिया।

१३. फिर आपका हमला शिफ्ट होता है TV टुडे एंड ABP न्यूज़ पर, आपने कहा – “कन्हैया का वीडियो नकली है, काट छांट, नारों को थोपा गया, अगर वीडियो नकली है तो कैसे हमें नतीज़ों पर मजबूर किया गया?” बिल्कुल सही, हम आपकी बात से सहमत हैं, पर आपको नहीं लगता ऐसे काम तो आप लोग भी सालों से करते आये हो, कई बार सन्दर्भ दिखाए बगैर, एडिटिंग के द्वारा एक लाइन पकड़ के किसी ऊपर हफ्ते भर निशानदेही करते हो, अगर इतनी ईमानदारी है तो उदहारण में अपने किये गए आचरण और व्यवहार को दिखाओ, कहो हमने ये ये गलतियां की है अतीत में, उदहारण में सिर्फ टीवी टुडे और अन्य न्यूज़ चैनल्स ही क्यों, उदहारण में बीजेपी ही क्यों, कांग्रेस, सीपीआई और आप की बात करो जो सरकार के हर काम में अड़ंगे डालना शुरू कर देते हैं, और अगर आप ईमानदार हैं तो आपको पता है ये अड़ंगे जनहित के लिए नहीं बल्कि स्वयंहित के लिए होता है। संसद का विंटर सेशन तो याद ही होगा, या GST बिल?? एक उदाहरण देता हूँ, आपके ही NDTV के वरिष्ठ पत्रकार ने ही बताया था, जगह – कश्मीर प्रॉक्सी वॉर शरणार्थी कैंप, रिपोर्टिंग के दौरान कैमरा रोल करने से पहले आपकी एक वरिष्ठ एवं प्रसिद्ध एंकर साहिबा पहले एक माँ और बच्चे को बैकग्राउंड में लाती हैं, फिर माँ की गोद में बैठे बच्चे को चुंटी काट कर रुलाने की कोशिश करती हैं और जब बच्चा रोने लगता था तो कैमरा को भी रोल कर दिया जाता है, कश्मीर के हालात को ऐसे परोसा जाता था। अब इन सब पे क्या कहूँ, तकलीफ ही हुयी ये सब जानकार, पत्रकारिता का दोगलापन और घिनौनापन नहीं है तो और क्या कहेंगे आप इसे? ये सिर्फ एक वाकया, पता नहीं कहाँ कहाँ क्या क्या हो रहा होगा!!

१४. चलिए आगे चलते हैं, कन्हैया को गरीबी से आज़ादी चाहिए, जातिवाद से आज़ादी चाहिए, फिर आपने कहा आज़ादी वो राजनेता थोड़े मांगेंगे जो उद्योगपति के गोद में बैठे हैं, एक बार फिर सीधा निशाना बीजेपी, साथ में अडानी, अम्बानी। कोई उद्योगपति या अमीर है तो क्या वो उसकी गलती है? धीरूभाई में हिम्मत थी तो पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरते भरते पेट्रोल रिफाइनरी के मालिक बन गए, एक चायवाले के बेटे में हिम्मत और लगन थी तो वो प्रधानमंत्री बन गया, ये तो वही बात हो गयी की खिसयानी बिल्ली खम्भा नोचे। मेहनत करो, आगे बढ़ो, लगन होगी तो कोई नहीं रोक सकता आपको, आप भी तो सारी काबिलियत रखते हो, कुछ ऐसा करके दिखा सको तो हमें भी नाज़ होगा। कन्हैया को भी राजनीती से ज़्यादा अपनी शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए, और अगर राजनीती ही करनी है तो लड़ो पर अपनी लड़ाई में नैतिकता लाओ, सद्भाव लाओ, जिसके स्थापना के लिए तुम लड़ाई लड़ रहे हो। रविश जी शायद ये सब बातें आपको अपने इस कार्यक्रम में कहनी चाहिए थी। क्या पत्रकारिता का काम नैतिकता का साथ देना नहीं है??

१५. फिर आप अपने वौइस् ओवर की जगह ऑडियो चलाते हैं और ये जताने कि कोशिश करते है कि सारी आवाज़ें तो नहीं मिल सकी, वही सुना रहा हूँ जो ऑनलाइन उपलबध थी। जनाब रविश जी, ऑनलाइन पे सब कुछ उपलब्ध है, आप भी हैं और अर्नब भी हैं, और ६८ साल पुराने नेहरू के भाषण भी उपलब्ध हैं जो आपने इसी शो में इस्तेमाल भी किया है, इससे कहते हैं जान बूझ कर वही सेलेक्ट करना या डाउनलोड करना जिससे इस शो का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सके, और उद्देश्य है, ‘बीजेपी सारी समस्या की जड़ और कांग्रेस सारी समस्या का हल’, और यही आप मासूम बनकर लोगों तक पहुँचना चाहते हैं, यही काम आपने वाजपेयी सरकार के दौरान किया और यही आप लोग अभी कर रहे हैं। गलत है कुछ तो सिर्फ बीजेपी और अन्य चैनल, सही है तो सिर्फ नेहरू-परिवार (जी हाँ गांधी परिवार बोल कर में गांधी शब्द का अपमान नहीं करना चाहूँगा) और NDTV के भोले-भले पत्रकार, वाह रे आपकी ईमानदारी।

१६. फिर आप आते हैं वापस अपने मनोवैज्ञानिक खेल पर, आपकी नाटकीय आवाज़ और फिर से वौइस् ओवर शुरू होता है और आप बड़े भोलेपन के साथ फिर कहते हैं कि, “मेरा मक़सद सिर्फ आपको सचेत करना है – सुनिए गौर से सुनिए, महसूस कीजिये की इससे सुनते वक़्त कब आपका खून खोलता है” – याद रहे ये सब साथ में स्क्रीन पर भी चल रहा है, काले स्क्रीन पर शब्दों कि बौछार, जहाँ ‘महसूस’, ‘खून’, ‘खौलता’ जैसे शब्दों को लाल रंग में दिखाया जा रहा है…..इससे साफ़ होता है कि आपका मक़सद भी वही है और आप भी तो वही उकसाने का काम कर रहे हैं, गुस्सा दिला रहे हैं लोगों को, बस तरीका नायाब ढूंढ निकाला है। मैं इसे ‘विषैली विनम्रता’ का नाम दूंगा।

१७. काले स्क्रीन पे शब्दों की बौछार अभी भी चल रही है, नाटकीय ऑडियो और शब्दों के द्वारा हमारे मस्तिष्क में उन विचार और शब्दों को ठूसा जा रहा है। फिर रविश कहते हैं, “कब आप उत्तेजित हो जाते हैं”, “यह भी ध्यान रखियेगा की कब आप उत्तेजित हो जाते हैं” – यहाँ अचानक से आपकी आवाज़ में कुटिलता साफ़-साफ़ झलकने लगती है, जैसे एक मनोरोग विशेषज्ञ अपने मनोरोगी को वश में करने की कोशिश कर रहा हो – क्या ये भड़काना नहीं है???? श्रीमान टीवी सच में बीमार हो चुका है और आप जैसे लोग इन हथकंडों से उस टीवी नामक बीमार हॉस्पिटल के डॉक्टर बनने की कोशिश में लगे हैं।

१८. फिर डार्क स्क्रीन पर इस कार्यक्रम को ‘पत्रकारिता का पश्चाताप’ बोलते हुए आप कन्हैया का ऑडियो चलाते हैं और स्क्रीन पर ‘देशद्रोही’, ‘गद्दार’, ‘हंगामा’, ‘सब्सिडी’, ‘चिल्लाना’, ‘बड़ा सवाल’ – एक एक करके इन शब्दों कि बौछार शुरू हो जाती है। माना कनैहया और ओमार खालिद मासूम छात्र हैं, पर इन सबमें कहीं से भी आपका उद्देश्य नैतिकतापूर्ण नहीं लग रहा है। क्योंकि जो आपका शो देख रहे हैं, उनके दिल और दिमाग पर इसका असर कोई सकारात्मक नहीं है, बल्कि आप उन्हें मजबूर कर रहे हैं कि उनके विचार इस पलड़े से निकल कर उस पलड़े में आ जाएँ। NDTV राजनीती का स्पोर्ट्स चैनल जहाँ थोड़ा बदलाव लाते हुए क्रिकेट कि जगह आप लॉन टेनिस दिखने की कोशिश कर रहे हैं।

१९. आपने अभी तक जितने भी ऑडियो इस कार्यक्रम में चलाये वो सब बीजेपी को कहीं न कहीं गलत साबित करने की कोशिश है। क्योंकि ऐसा कोई ऑडियो नहीं है जहाँ कोई अन्य पार्टी ने कुछ गलत किया हो या कहा हो, किसी अन्य पार्टी का कोई ऐसा नेता नहीं। कमाल का सेफ इनफार्मेशन डाउनलोड किया है आपने। ना केजरीवाल, ना राहुल, ना NDTV…..ये कैसे हो गया?? फिर रविश की आवाज़ शुरू होती है ठीक अर्नब के वौइस् ओवर के बाद, जहाँ पूरी तरह से रविश जी अर्नब पर आरोप मढ़ना शुरू कर देते हैं – आपने भी वही किया ना रविश जी, खुद को साफ़-सुथरा बता कर दूसरों पर हमला, बस यहाँ एक सफाई दिखाई आपने, रिवर्स साइकोलॉजी का इस्तेमाल कर के कुछ आरोप इस तरह से अपने ऊपर लिया कि, ‘मैंने भी ऐसा किया होगा’, ‘मैंने भी गलती कि होगी’, पर कमाल की बात है कि आपके पास आपकी गलतियों का ऑडियो तक उपलब्ध नहीं है, गजब का इत्तिफ़ाक़ है ना???

२०. रैली की आवाज़ शुरू होती काले स्क्रीन पर – रविश जी साफ़ साफ़ कहते हैं कि, ‘पहले आप ABVP की आवाज़ सुनेगे और फिर आप लेफ्ट और अन्य संगठनो की आवाज़ सुनेगे’ – यहाँ साफ़-साफ़ कह दिया इन्होने कि बीजेपी हो या ABVP, गलतियां सिर्फ यही दोनों करते हैं, बाँकी लोगों को सिर्फ सम्मानदायक “लेफ्ट और अन्य पार्टी” के नाम से जाना जाता है। और फिर शुरू होता है ABVP के रैली के साथ स्क्रीन पर शब्दों की बौछार, शब्दों में, ‘गद्दारों को’, ‘गोली मारो सालों को’, ‘राहुल गांधी देश द्रोही’, ‘अफज़ल गुरु देश द्रोही’….’भारत माता की जय’, ‘जितने अफज़ल आएंगे’, ‘उतने अफज़ल मारेंगे’, ‘वन्दे मातरम’, जैसे शब्दों से खेला जा रहा है, ताकि ये लगे कि ये सबके सब शब्द गलत हैं। मुझे भी कुछ देर के लिए ऐसा लगने लगा कि, ‘अफज़ल गुरु देशद्रोही है’ और ‘वन्दे मातरम’ दोनों ही नारा ग़लत हैं। मनोवैज्ञानिक खेल। रविश जी ये सब करने के बाद, ‘लेफ्ट और अन्य पार्टियों’ के पक्ष वाले नारे शुरू करते हैं जहाँ सिर्फ गरीबी, जातिवाद जैसे प्रसिद्ध राजनीतिक नारों का प्रयोग कर सहानभूति बटोरने कि कोशिश की जाती है।

२१. फिर पटियाला हाउस में वकीलों के द्वारा पत्रकार पे हुए हमले की चर्चा शुरू होती है, वौइस् ओवर के द्वारा ये भी बताया जाता है कि किस तरह से वारदात के बाद ऐसे वकीलों का स्वागत भी किया गया – और इसमें भी कहीं ना कहीं अप्रत्यक्ष रूप से एक बार फिर बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा दिया गया। रविश जी जैसा कि इस शो में आप ये बताने कि कोशिश कर रहे हैं (भोली-भली आम जनता को) ‘कैसे एंकर/पत्रकार आपको उकसाते हैं’, ‘आपको गुस्सा दिलाते हैं’, ऐसा कहते हैं कि ‘आपका खून खोलने लगता है’, तो ये भी तो हो सकता है कि आपके पत्रकार ने ही वकीलों को इस हद तक गुस्सा दिला दिया कि वो आपे से बाहर हो गए, क्योंकि इससे पहले पटियाला हाउस में कभी वकीलों ने पत्रकारों पर हमला नहीं किया, फिर ऐसा क्या हुआ कि ऐसी घटना हो गयी??? आपने जानने या चर्चा करने कि कोशिश कि???? बिल्कुल नहीं….और इन्ही सब बातों से आपके इस शो का दोहरा मापदंड जगजाहिर हो जाता है। फिर आप वकीलों की रैली की आवाज़ सुनाते हैं – यहाँ रविशजी का ही इंटरव्यू आता है, गौर करने वाली बात है यहाँ इस इंटरव्यू का ऑडियो उपलब्ध था रविश जी के पास। मुझे तो रविश जी ये सब लिखते-लिखते ही काफी हंसी आ रही है, कब छोड़ेंगे आप लोग मासूम जनता को बेवकूफ बनाना। थोड़ा तो अपने अंतरात्मा को झकझोरिये।

२२. वकीलों के रैली की आवाज़, अँधेरे स्क्रीन पर शब्दों का मेला लग जाता है, ऐसा लग रहा है जैसे शब्दों का बम फूट पड़ा हो। स्क्रीन पर, ‘गद्दार’, ‘देशद्रोही’, ‘भारत माता की जय’, ‘आतंकवादी गतिविधियाँ’, ‘पाकिस्तान जाएं’, ‘वन्दे मातरम नारा है’, ‘पाकिस्तान में रहे’, ‘JNU राजद्रोही’, ‘बवाल की कोशिश’, ‘JNU के छात्रों ने कहा देश छोड़ कर नहीं जाएंगे’, ‘घर घुस कर मारेंगे’, ‘आतंकियों का साथ’, ‘देश तोड़ने की बात’, ‘वकील नहीं बख्शेंगे’, ‘कुचलने के लिए’, ‘किसी हद तक जा सकते हैं’, ऐसे शब्दों के समूह को जोड़-तोड़ कर बार-बार दिखने कि कोशिश। रविशजी कैसी विनम्रता है ये, क्या कहना चाह रहे हैं आप??? काले स्क्रीन को ज़हर से भर दिया आपने। काश आपने स्क्रीन आम जनता को अँधेरे में ना रखा होता तो शायद आँख मिला कर ये सब कहने की हिम्मत ना होती आपकी। क्या ये एक मानसिक प्रताड़ना नहीं थी, ईमानदारी का ढकोसला नहीं था, संवेदना और भावनाओं के साथ एक कपट नहीं था तो और क्या था???

२३. रविश वापस आते हैं अपनी आवाज़ के साथ, फिर से बीजेपी पे हमला, उन्ही के शब्दों में एक बार फिर ‘जबाबदेही’ ‘निशानदेही’ बन जाती है, याद रहे इस शो के शुरुआत में उन्होंने ‘निशानदेही’ पर ही प्रश्न उठाया था। निशाने पर अब हैं, ओ प शर्मा, बीजेपी MLA , उनके शब्दों का ऑडियो चलाया जाता है, “बन्दूक होती तो गोली मार देते”… उस पर बार बार ज़ोर दिया जा रहा है। केरला में बीजेपी के कार्यकर्ता की निर्मम हत्या, बिहार में बीजेपी के प्रमुख नेताओं की हत्या, इन हत्याओं पर हत्यारों का कोई बयान नहीं है, तो वो आपके लिए ठीक है, एक ओ पी शर्मा देशभक्ति की भावना में बहकर गलती कर दी, एक गलत बयान दे दिया तो वो गलत हो गए, उन हत्याओं और हत्यारों के बारे में कोई बात क्यों नहीं कर रहा…सिर्फ वही बातें हो रही है जो बीजेपी ने गलत किया और कहा, क्यों? आपके इसी ऑडियो में उस पत्रकार की जिम्मेदारी कहाँ गयी जो उल्टे सवालों से कुछ भी बकवाने की कोशिश कर रहा है। आपने ही बिहार में लोकतंत्र कि जीत बताई थी ना, कहाँ गया वो लोकतंत्र, जहाँ एक बार फिर से हत्याएं आम बात हो चुकी है, कभी क्यों नहीं बात करते उसके बारे में, माफ़ी क्यों नहीं मांगते इस बात पर कि वास्तव में वो लोकतंत्र की हार थी, जिसे आप लोगों ने बढ़-चढ़ कर बड़े बड़े शब्दों में लोकतंत्र की जीत बताया था। जनाब रविश जी आपकी निशानदेही तो साफ़ हो गयी, जिम्मेदारी का तो खुदा ही मालिक है। अब सिर्फ एक कोशिश करें, कम से काम अपना स्क्रीन काला ही रखें।

रविश जी आपने तो आम जनता को ये भी सन्देश पहुँचा दिया कि, कल कोई नेता आपको गोली मारने की बात करेगा तो आप कैसा महसूस करेंगे, पर अभी-अभी आप ने इसी कार्यक्रम पर ये भी कहा कि, अगर हमारी पत्रकारिता से आपका खून खौलता है तो आप एक गलत पत्रकारिता को बढ़ावा दे रहे हैं। जी हाँ रविश जी, आपकी ऐसी बातों से, और ऐसी पत्रकारिता पर लोगों का बिलकुल खून खौल सकता है, और हमने गलत किया ऐसी पत्रकारिता को बढ़ावा देकर जो धूर्तता को ईमानदारी के नाम देकर स्वांग रचती हो।

२४. इन सबके बीच ‘गोली मार देंगे’ शब्द स्क्रीन पर साफ़-साफ़ चल रहा है, शब्द ‘गोली’ काले स्क्रीन पर लाल रंग में है, और साथ में ओ पी शर्मा का ऑडियो इंटरव्यू चल रहा है, पत्रकार उसे उकसाने कि कोशिश कर रहा है।

२५. फिर सहानभूति राहुल बाबा की तरफ खिसकती है, कोई उससे ऑडियो में को देशद्रोही बता रहा है। आपके द्वारा जगजाहिर एक नासमझ, बुद्धिहीन एवं मुर्ख नेता के लिए के लिए आप सहानभूति बटोरने का कठिन प्रयास करते हैं, ये कांग्रेस भक्ति नहीं हैं तो और क्या हैं??? साथ में काले स्क्रीन पर ‘गोली मार देंगे’ जैसे शब्द लगातार चल रहें है। रविश कुमार की जिम्मेदार पत्रकारिता का अनूठा उदहारण।

२६. फिर रविश जी कहते हैं कि – ‘ये टीवी अगर इनको गद्दार घोषित कर सकता है तो एक दिन ये आपको भी समूह में बाँध कर गद्दार घोषित कर देगा’, एक बार फिर से सरकार के खिलाफ भड़काने कि कोशिश……फिर रविश कहते हैं, ‘पत्रकारिता में हमें सिखाया गया है की साबित होने से पहले हम ‘कथित’ का इस्तेमाल करेंगे….अब आरोपी कोई नहीं है, एंकर की अदालत में सब सज़ायाफ्ता हैं ….कभी बीजेपी अपराधी है, कभी कांग्रेस अपराधी है, तो कभी आप अपराधी हैं।’ – ये रहा एक और उदहारण रिवर्स साइकोलॉजी का, जहाँ ‘अपराध’ जैसे शब्द पहले बीजेपी से बांध कर आम जनता तक पहुँचा दिया जाता है।

२७. बड़े युक्तिपूर्वक उसके बाद सहानभूति ओमर खालिद पर शिफ्ट होती है, उसके पिताजी कुछ कहते हैं, फिर एक बंगाली कम्युनिस्ट स्टूडेंट रविश को इंटरव्यू देते हुए बताते हैं कि ओमर कश्मीर पर भारत के कब्ज़े को गलत बताते हैं, पर क्या हुआ USA भी तो इस कब्ज़े को गलत बताता है। यहाँ ना ओमर गलत है, ना उसके पिता ना वो बंगाली छात्र जिसका आप इंटरव्यू कर रहे हैं। यहाँ गलत वो सन्देश है जो आप इन आवाज़ और शब्दों के खेल के जरिये हम सब तक पहुँचाने कि कोशिश कर रहे हैं। शुरुआत में आपने ही कहा कि, ‘कश्मीर एक जटिल मामला है, उससे सरकारों पर छोड़ देना चाहिए’, फिर कश्मीर पे चर्चा उसी शो पर दुबारा क्यों? क्यों आप अपने विचारों को अपने विचारों से ही खंडित कर रहे हैं।

२८. अब सहानभूति कि नोक खिसकती है उन NDTV के पत्रकारों पर जिन्हे ट्विटर पर निशाना बनाया जाता है, ये गलत है मानता हूँ पर क्या सिर्फ इन्हे ही ये सब झेलना पड़ता है, पत्रकारिता क्या सिर्फ NDTV तक सिमट कर रह गया है? सोशल मीडिया पे ऐसे जोखिम तो अवश्यम्भावी हैं, हर कोई निशाना बनता है, चाहे वो आम आदमी हो या पत्रकार। और ये भी कहना गलत नहीं होगा कि कई बार कुछ पत्रकार भी इसके लिए जिम्मेवार होते हैं, जिम्मेदारी से सुचना पहुँचना भी तो आपका धर्म है। पर अंत में सवाल और शो का उद्देश्य वहीं पे आकर रुकता है, ऐसा पहले नहीं होता था, जब से मोदी कि सरकार आई है, सब के अस्तित्व पर खतरा बढ़ गया है, पूरे दुनिया भ्रमण करने के बाद हर प्रश्न चिन्ह मोदी पे आकर ही अटक जाता है…क्या यही बताना इस कार्यक्रम का उद्देश्य है?

२९. अर्नब पे फिर से हमला करते हैं आप, ये कहते हुए कि, ‘वो एंकर सबसे बड़ा एंकर है, जो दूसरे को गद्दार घोषित करता है’ – ये कह कर आप कौन सी जिम्मेवारी दिखा रहे हैं। माना अर्नब को बहूत बोलने और चिल्लाने कि आदत है, पर उनके पत्रकारिता की उद्यत तरीकों का उल्लेख करके आप क्या हासिल कर रहे हैं?????? शायद आपको तो पता है ही, मुझे भी पता है।

३०. अब शुरू होती है आज़ादी कि बातें और आप कहते हैं, ‘हम क्या चाहते हैं, कांग्रेस से आज़ादी, संघ से आज़ादी’…..ऐसा लग रहा है कि आप ये कहने कि कोशिश कर रहे हैं कि भाई ले ली ना कांग्रेस से आज़ादी और अब जब संघ के चंगुल में फंस गए हो तो संघ से आज़ादी ले कर दिखाओ, और आप फिर सुनाते नेहरू का वो ऐतिहासिक भाषण (Tryst with destiny) जो १५ अगस्त १९४७ के मध्यरात्रि में दिया गया था, एक बार फिर से बड़ी घृष्टतापूर्वक आप ये बताने की फिर कोशिश कर रहे हैं की देश को नेहरू परिवार ही बचा सकता है, उसके बाद RJ साइना की आवाज़ शुरू होती रहमान साहब के नज़्म से, उसकी कुछ पंक्तियाँ यहाँ उल्लिखित कर रहा हूँ…

ये देश बना एक गुलदस्ता,
बदनाम ना होने देंगे इसे,
मज़हब के नाम पे बांटने का,
जो काम करे रोको उसे – (सन्देश: बीजेपी को रोको)

बस एक गुज़ारिश है तुमसे,
हर कदम उठे हर कौम हो साथ,
भूलें मज़हब और जाती को, दिल देश में हो,
हाथों में हाथ….

तब पता चले इस दुनिया को,
इस देश में अब भी नेहरू गांधी हैं (सन्देश: नेहरू परिवार अभी भी हैं)
ऐ जान से प्यारे हमवतनो अभी काम बहोत कुछ बाँकी है….

बहूत अच्छी नज़्म है, बहूत ही उम्दा सन्देश है, पर इस नज़्म में एक साजिश की बू आ रही है, क्योंकि इसका प्रयोग एक ऐसे सन्दर्भ और माहौल में किया जा रहा है, जहाँ ये मतलब साफ़ है कि वर्तमान सरकार मजहब के नाम पर देश को तोड़ देना चाहती है, और इस समस्या का हल एक ही परिवार है, नेहरू परिवार। ये भी कहा जा रहा हैं कि जो नेहरू है वही गांधी है, और इस गांधी का महात्मा से कोई लेना देना नहीं है। ज़रा सोचिये, हमारे देश के प्रधानमंत्री जो बिना रुके अपने देश के लिए दर-ब-दर भटक रहा है, अपने देश को आर्थिक एवं तकनिकी रूप से शक्तिशाली बनाने के लिए हर देश जाकर मदद मांग रहे हैं, वो इस देश को तोड़ देना चाहते हैं। रविश जी, ये अगर आपके सकारात्मक पत्रकारिता का तर्क हैं, तो वाह रे आपकी पत्रकारिता, वाह!!! रवीशजी अगर आज ये देश टूटता है तो उसमें किसके स्वार्थ की सिद्धि होती है?? आपको तो पता ही होगा। राजनीतिक इतिहास तो पढ़ा ही होगा, जिस पार्टी ने सत्ता की लालच में सुभाष चन्द्र बोस से लेकर लाल बहादुर शास्त्री तक को नहीं बक्शा उन्हें हम इस देश में वर्तमान समस्यों का हल बता रहे हैं। ज़रा ज़मीर को आवाज़ दें, अपने अंदर झांकें, और पूछें अपने आप से की क्या कर रहे हैं इस देश के लिए आप, अँधेरे स्क्रीन के द्वारा भारत को अँधेरे में भेजने की साजिश का हिस्सा तो नहीं बन रहे हैं आप???

३१. इसके बाद रविश जी की आवाज़ एक बार फिर से आती है, और वो कहते हैं, हमारे पास इतना ही मटेरियल उपलब्ध था…..

इसके बाद स्टूडियो की लाइट वापस आती है और रविश जी कहते हैं,

अब चलता हूँ….आप सो जाइए (विजयी कुटिल मुस्कान के साथ)

निष्कर्ष: रविश कुमार ने इस कार्यक्रम को एक सकारात्मक पत्रकारिता के ओट में शुरू किया पर कुछ ही मिनटों में वो वहीं पहुँच गए जिसके वो आदी हैं। जवाबदेही की बात का ज़िक्र किया, और कहा की निशानदेही गलत है, पर पूरे कार्यक्रम का निशाना बीजेपी और ABVP ही बनता रहा, ना कहीं केजरीवाल का ज़िक्र, ना कहीं सोनिआ, ना कहीं कांग्रेस, ना कहीं राहुल का ज़िक्र, ना सीपीआई का ज़िक्र, JNU और पटिआला हाउस के अलावा किसी और घटनाओं का कोई ज़िक्र नहीं। रविश जी आपकी पत्रकारिता की सकारात्मकता में एक असाधारण अस्पष्टता प्रकट होती है, जो आपने आप में पत्रकारिता के लिए एक सोचनीय विषय है। मैंने पत्रकारिता ज़्यादा नहीं पढ़ी है, पर इतना समझता हूँ की एक पत्रकार आम इंसान और न्याय व्यवस्था के बीच एक अहम कड़ी होता है, उसका उद्देश्य न्यायोचित होता है। गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महान पत्रकार को अगर आप अपना गुरु मानते हैं तो उनके चरित्र और कर्मों को भी अपने व्यवहार में लाईये। हमारा देश एक और अरविन्द केजरीवाल जैसे व्यक्तिव के लिए तैयार नहीं है। थोड़ा हमें और थोड़ा अपने आपको भटकने से रोकें, ये देश आपका भी उतना ही है, जितना मेरा या किसी और का…. याद रहे, सच की धार बहूत पैनी होती है, झूठ का आवरण उसे लम्बे समय तक नहीं ढक सकता, क्योंकि अँधेरे स्क्रीन के सामने बैठे लोग अँधेरे में नहीं बैठे हैं….

अब आप सोना चाहते हैं तो सो जाइए, पर देश अभी जाग चुका है। जय हिन्द!!!!

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