Saturday, April 13, 2024
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मिसेज़ चैटर्जी वर्सेस नॉर्वे – भौगोलिकरण के दौर में बच्चों का पालन

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हाल ही में एक फिल्म चर्चा में आई है मिसेज़ चैटर्जी वर्सेस नॉर्वे (लघु – मिचैवन)। फिल्म का विमोचन भारत के साथ-साथ दुनिया के अनेकानेक देशों में 17 मार्च को किया गया। फिल्म एक सत्य घटना पर आधारित है। यदि मैं अंग्रेजी के शब्द युग्म रील-रियल का सहारा लूं तो कह सकता हूं कि 11 वर्ष पूर्व जब रियल घटनाक्रम नॉर्वे में उत्कर्ष पर था तब मैं बीचों-बीच खड़ा था। मैं मूलतः उत्तर भारत से हूं और डेनमार्क, यूके से लुढ़कता हुआ 2009 अंत तक स्तावंगर नॉर्वे पहुंच चुका था।

2011 में जब उड़ते उड़ते खबर कानों में पड़ी की बारनेवर्न (नॉर्वी भाषा में बाल सुरक्षा विभाग) वाले ‘बंगालियों’ के बच्चे उठा ले गए हैं तो एक वर्षीय पुत्री का पिता होने के नाते मैं ठिठका और मुझे यह समझने की जिज्ञासा हुई कि इस आपदा का स्वरूप क्या है? क्या मैं अपने संकट में फंसे हुए देशवासी दंपती का किसी प्रकार से सहयोग कर सकता हूं? इस समस्या से आज वे जूझ रहे हैं कल को हम भी जूझ सकते हैं। मैंने अनुरूप और सागरिका (जिनकी कहानी का चित्रण किया गया है) को ढूंढ संबंध स्थापित किया और जो थोड़ा बहुत संबल सहयोग मेरे सामर्थ्य में था वह दिया। अप्रैल 2012 में जब बच्चे सुरक्षित भारत पहुंच गए तब संकट टलने की प्रसन्नता मुझे भी थी। सागरिका और अनुरूप की कहानी भारत में भी अन्य घरेलू कहानियों की तरह आगे बढ़ती रही और मेरा सरोकार समाप्त हो चुका था।

मिचैवन पर प्रतिक्रिया करने वालों को तीन वर्गों में  विभाजित किया जा सकता है। पहले वर्ग वाले इस फिल्म को नॉर्वे की एक संस्थागत व्यवस्था पर टिप्पणी न देख कर नॉर्वे और संपूर्ण नॉर्वे की संस्कृति पर आघात के रूप में देख रहे हैं। इसमें वे लोग तो हैं ही जिनके पास नॉर्वे की छवि को संवारने व संभालने का दायित्व है, कुछ वे आप्रवासी लोग भी सम्मिलित हैं जिन्होंने नॉर्वे को अब घर बना लिया है। उन्हें यह विस्वरता रास नहीं आयी। इस दृष्टिकोण का नेतृत्व करते हुए भारत में नॉर्वे के राजदूत मान्यश्री हैंस जेकब फ्रॉयडनलुंड अपने मंतव्य (इंडियन एक्सप्रेस, 18 मार्च 2023) में लिखते हैं कि फिल्म काल्पनिक है, वास्तविकता को नहीं दर्शाती। नॉर्वे की संस्थाएं ऐसी बकलोल नहीं हैं कि वे हाथ से खाना खिलाने पर और बच्चे को साथ सुलाने पर बच्चा उठा लें। यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय में इस मुद्दे से मिलते जुलते 39 केस लंबित हैं, इस बात का उल्लेख उनके लेख में नहीं है।

दूसरा वर्ग उन लोगों का है जो बारनेवर्न के द्वारा उनके बच्चों को दिए गए सुरक्षा कवच से पीड़ित हुए हैं। इस वर्ग वाले कहते हैं कि मिचैवन में जो दिखाया गया है वह वास्तविकता के हूबहु है। और तो और बारनेवर्न इससे भी कहीं अधिक बेढब उपाय बाल सुरक्षा के नाम थोप सकता है। सांख्यिकी के आधार पर कहा जाता है कि इस प्रकार के सुरक्षा कवच के लिए उपयुक्त पाए जाने की संभावना नॉर्वे स्थित आप्रवासी परिवारों के लिए एक औसत परिवार की तुलना में चार गुना अधिक है। परंतु सोशल मीडिया पर इस स्वर को गुंजाने वाले लोगों में अधिकांश आप्रवासी हों ऐसा नहीं है, वहां प्रायः आपको इस पक्ष को रखते हुए मूलतः नॉर्वी पृष्ठभूमि के लोग ही मिलेंगे। मारिउस रेइकेरोस, रूने फारडाल और टॉन्ये ओमडाल अनन्य सक्रिय कार्यकर्ताओं में से कुछ नाम हैं जो इस व्यवस्था को बदलने के लिए कृत संकल्प हैं।

तीसरे वर्ग में हम अन्यों को रख सकते हैं जिसमें सर्वहारा से लेकर विशिष्ट फिल्म आलोचकों तक सब हैं। इनका फिल्म के विषय से सीधा सीधा कोई हित जुड़ा हुआ नहीं है। जनसाधारण फिल्म में रानी मुखर्जी के दमदार अभिनय और कथा के संवेदनशील विषय से अभिभूत है। फिल्म सुखदांत होते हुए भी एक टीस छोड़ कर समाप्त होती है। कुछेक फिल्म आलोचकों का कहना है कि निर्देशक ने अपनी बात को वज़न देने के लिए अतिश्योक्ति, ध्रुवीकरण और षड्यंत्र सिद्धांत जैसे साहित्यिक उपकरणों का उपयोग करने में संयम नहीं रखा। यहां उल्लेखनीय है कि फिल्म मुख्यधारा के आम दर्शक को ध्यान में रख कर बनायी गयी है और इस प्रक्रिया में कुछेक बारीकियों को उजागर करना कठिन सिद्ध हुआ है। 

फिल्म के विषय वस्तु  को आगे बढ़ाते हुए मैं सबसे पहले नार्वी संस्था बारनेवर्न के नाम पर टिप्पणी करना चाहूंगा। मेरे पिताजी कहते थे संज्ञा वहअच्छी है जो संज्ञान करवाने में सफल हो और संज्ञा धारक को जीवन मंत्र भी दे। यह युक्तिपूर्ण है कि नाम से ही हमें लक्ष्य और मूल्यों का बोध हो जाए। मुझे निजी तौर पर बाल-विकास अथवा बाल-कल्याण तो समझ आते हैं परन्तु बाल-सुरक्षा सुनने में अधूरा लगता है। बाल-विकास एक समन्वित प्रक्रिया का बोध करवाता है जिसमें सुरक्षा भी सम्मिलित है। यह कल्पना की जा सकती है कि सर्वांगीण दृष्टि न रख सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने से सुरक्षा देने वाला अति-उत्साह, संकीर्ण दृष्टि और संरक्षण देने का दम्भ दोषों को प्राप्त करे। जाको राखे साइंया, मार सके ना कोय। हमारी सुरक्षा तो भैय्या ऊपर वाला ही करता है।

पहले वर्ग और दुसरे वर्ग के प्रतिनिधि अक्सर सांस्कृतिक भिन्नताओं, बच्चों को दिशा देने के लिए हिंसा का प्रयोग जैसे मुद्दों पर भिड़ते हुए सुनायी देते हैं। इस शोर में यह आधारभूत प्रश्न सुनने में नहीं आता कि जीवन चक्र के मूल में ऐसे कौनसे अनिवार्य गुण हैं जो जीवन को शैशव से वयस्कता तक सर्वांगीण रूप में पहुंचाते हैं? मैं यहाँ प्रस्ताव रखता हूँ कि जिस पालन में निरंतरता, समन्वय-परस्परता और विस्तारण में दोष आएंगे वह पालन बालक के सर्वांगीण विकास का संवर्धन नहीं कर सकता। 

निरंतरता से अभिप्राय है कि हर शिशु सभ्यता और सांस्कृतिक धरोहर के साथ जन्म लेता है और यह धरोहर वह अपने माता पिता से प्राप्त करता है। जब माता पिता किसी कारणवश ऐसा करने में असमर्थ हों तो ये दायित्व उनके पारिवारिक सामजिक वृत्त में उपलब्ध अन्य वयस्कों का है किसी दूरस्थ का नहीं। आम की डाली ने संतरे के पेड़ पर कब फल दिया था? समन्वय-परस्परता का सम्बन्ध माता और पिता की आपसी पूरकता, जो जीवन के प्रारंभिक वर्षों में अनन्य आवश्यक है, से तो है ही इसका सम्बन्ध परिवार के व्यापक परिवार और समाज के साथ सहअस्तित्व से भी है। पारिवारिक कोलाहल समन्वय-परस्परता में बाधक है। विस्तारण का यहाँ अर्थ है कि जुड़े रहते हुए जीव अपने भविष्य  की यात्रा स्वयं तय कर आगे निकले। जब डाल ने फैलना है तो फिर उसे फैलने के लिए स्थान चाहिए।  

मेरी समझ में एक बाल-कल्याण के लिए कृत संकल्प संस्था का काम है कि जिस भी बालक के पालन में इन तीन गुणों में से किसी में भी कमी आ रही है तो वे उस कमी को पूरा करवाने में सहयोग करे। वह संस्था इस कमी को पूरा करवाते हुए ध्यान रखे कि उसका कार्य करुणा, सेवा, अध्यात्म, परोपकार, बहुवाद, उदात्तता, निरंतरता मूल्यों पर आधारित हो और मिशन, चौकसी, कट्टरवाद, निरंकुशता, द्वीपीयता, आरोपण, अवसरवाद उसके कार्यक्रम को भ्रमित न करें। 

रानी मुखर्जी नायिका के किरदार को जीवंत करती हुई फिल्म को माँ की व्याकुलता में लपेट हमें बाँध कर रखती हैं। फिल्म विषय वस्तु को हाशिये से खींच मुख्य धारा में लाने के प्रयोजन में सार्थक है। फिल्म के निर्माताओं ने ऐसे संवेदनशील विषय को पेशेवर फ़िल्मी युक्ति से प्राण दिए है इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।

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