Monday, December 5, 2022
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मद्रास उच्च न्यायालय: एक ऐजेण्डे के रूप में सामूहिक धर्म परिवर्तन स्वीकार्य नहीं

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

मद्रास उच्च न्यायालय।
एक ऐजेण्डे के रूप में सामूहिक धर्म परिवर्तन स्वीकार्य नहीं।
जी हाँ मित्रों उपर्युक्त कथन कि पृष्ठभूमि कुछ इस प्रकार है:-

मित्रों तमिलनाडु के कन्याकुमारी नामक स्थान से आप सभी परिचित होंगे। यँहा पर क्रीप्टो क्रिश्चियन (अर्थात वो लोग जो धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन गए हैं पर अभी भी अपनी पहचान छुपा कर हिन्दू बने हुए हैं ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ ले सके) समुदाय के लोग बहुसंख्यक अवस्था में पहुंच चुके है। क्रिश्चियन कि संख्या अधिक होने के कारण वंहा पर हिन्दू देवी देवताओं का अपमान चर्च के पादरीयों के द्वारा आम बात है।

ऐसे हि कन्याकुमारी में ही स्थित एक चर्च के पादरी हैं जिनका नाम है Mr. P George Ponnaiah. इस पादरी ने अरुमनाइ नामक स्थान पर एक और क्रिश्चियन स्टेन स्वामी के मौत के अवसर पर ईसाइयो और हिंदुओ कि एक सभा को जुलाई, २०२१ में सम्बोधित करते हुए, भारत माता, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, गृह मंत्री श्री अमित शाह जी और वंहा कि देवी “भू माता” के बारे में अत्यंत अपमानजनक और धार्मिक भावनाओं कप आहत करने वाली बातें कहीं थी और पूरे जोश में कहा था कि हम सबको ईसाई बनाएंगे और कोई भी हिन्दू इसे रोक नहीं पायेगा।

अब इस पादरी Mr. P George Ponnaiah के विरुद्ध एक FIR भारतीय दंड संहिता की धारा १४३, २६९, ५०६(१), १५३अ, २९५अ और ५०५(२) तथा महामारी रोग अधिनियम, १८९७ की धारा ३ के अन्तर्गत पंजीकृत कर लिया गया।

अब अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए ईसाई पादरी Mr. P George Ponnaiah ने मद्रास उच्च न्यायालाय के मदुरई खंडपीठ के समक्ष याचिका प्रेषित कि और प्रार्थना की कि उनके विरुद्ध दर्ज कि गई FIR को रद्द किया जाए।

न्यायमूर्ति जी आर स्वामीनाथन ने मामले कि सुनवाई करते हुए जो अवलोकन प्रस्तुत किया वो पूर्णतया भारतीय समाज को झकझोर कर उठाने या जगाने का एक अमूल्य प्रयास है, न्यायमुर्ति ने मामले पर सुनवाई करते और अपना अवलोकन प्रस्तुत करते हुए कहा कि:-

१:- किसी एक व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले धर्म परिवर्तन का विरोध नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए;

२:- परन्तु एक एजेंडे के रूप पूरे समूह के धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया जा सकता है;

३:- संविधान के संस्थापको ने धर्मनिरपेक्षता को देश के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाया और अपने धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने और प्रचार करने के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति व्यक्तिगत विश्वास के कारण अपना धर्म बदलना चाहता है, तो उसकी पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए, “लेकिन धर्म परिवर्तन एक समूह एजेंडा नहीं हो सकता।” हमारा संविधान मिश्रित संस्कृति की बात करता है। इस चरित्र (स्थानों के धार्मिक जनसांख्यिकीय प्रोफाइल सहित) को बनाए रखा जाना चाहिए।

४:-न्यायाधीश ने क्रिप्टो ईसाइयों (अनुसूचित जाति के हिंदू जो ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए हैं, लेकिन आरक्षण का लाभ उठाने के लिए रिकॉर्ड पर हिंदुओं के रूप में पहचान करते हैं) के अस्तित्व का न्यायिक नोटिस लेते हुए कहा कि यही कारण है कि २०११ की जनगणना के आंकड़ों के बावजूद हिंदुओं को बहुसंख्यक दिखाया गया है। कन्याकुमारी में, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि ईसाई समुदाय ने जिले में 62 प्रतिशत आबादी को पार कर लिया है और जल्द ही 72 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। न्यायाधीश ने आगे कहा कि पादरी ( Mr. P George Ponnaiah) ने खुले तौर पर हिंदुओं को चेतावनी दी थी कि इसे कोई नहीं रोक सकता।

५:-न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने यह समझाने के लिए कई साहित्यिक कार्यों का भी उल्लेख किया कि कैसे ‘भारत माता’ को विभिन्न रूपों में दर्शाया गया है और हिंदुओं द्वारा उनकी पूजा की जाती है। उन्होंने कहा, “जहां एक नागरिक राष्ट्रवादी भारत को एक धर्मनिरपेक्ष अवधारणा के रूप में मानता है, जिसमें संविधान मार्गदर्शक प्रकाश के रूप में है, वहीं एक धार्मिक राष्ट्रवादी के लिए भारत भारत माता है।” इसलिए, ‘भूमा देवी’ और ‘भारत माता’ को संक्रमण और गंदगी के स्रोत के रूप में चित्रित करके, पादरी ( Mr. P George Ponnaiah) ने हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है।

६:- न्यायमूर्ति स्वामीनाथन यह कहते हुए कि पुजारी के शब्द “पर्याप्त रूप से उत्तेजक” और “द्वेष और वर्चस्ववाद के प्रतीक” थे और राज्य ऐसी स्थितियों में मूकदर्शक नहीं हो सकता, न्यायाधीश ने प्राथमिकी में शेष आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया। यह बताते हुए कि यीशु ने लोगों को एक-दूसरे से प्यार करना सिखाया था, न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने आगे कहा, “मुझे यकीन है कि न्याय के दिन, भगवान याचिकाकर्ता को एक गैर-ईसाई कार्य करने के लिए चेतावनी देंगे।”

और उपरोक्त आंखे खोल देने वाला अवलोकन का प्रकटिकरण करते हुए न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने पादरी (Mr. P George Ponnaiah) को कुछ आरोपों से बरी कर दिया; अर्थात् भारतीय दंड संहिता की धारा १४३, २६९ और ५०६ (१) और महामारी रोग अधिनियम, १८९७ की धारा ३, से यह कहते हुए बरी कर दिया कि उक्त बैठक को ‘गैरकानूनी सभा’ ​​नहीं कहा जा सकता है और प्रतिभागियों से किसी मे भी कोविड -१९ का संक्रमण नहीं फैला।

परन्तु,न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने पादरी ( Mr. P George Ponnaiah) को भारतीय दंड संहिता की धारा १५३अ, २९५अ और ५०५(२) के तहत प्रथम दृष्टया आरोपी माना क्योंकि पुजारी के भाषण ने वास्तव में हिंदुओं के एक वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत किया था और धार्मिक समूहों के बीच घृणा, वैमनस्य को बढ़ावा दे सकता था।

तो मित्रों आपने देखा कि पूरे भारतवर्ष में एक ऐजेण्डे कि भांति धर्म परिवर्तन का खेल कितने बड़े पैमाने पर चल रहा है और हम हिन्दू दोहरी मार झेल रहे है, जी हाँ, एक ओर ईसाई मशीनरीया केरल, मणिपुर, नागालैण्ड, त्रिपुरा, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, अरूणांचल प्रदेश इत्यादि राज्यों में बुरी तरह पैर पसार चुकी हैं वही दूसरी ओर इस्लामिक रेडिकल आतंकवाद ने कहर ढाया हुआ है और तो और हमारे देश में बैठे आस्तीन के सांप भी तो हमें हि डसने कि फिराक में घात लगाकर बैठे हैं।

अब सोचना आप को है कि आप अपने धर्म, संस्कृति, भाषा, परम्परा और समुदाय को सुरक्षित रखने के लिए क्या करते हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने हमें ये देश दे दिया पर क्या हम अपनी आने वाली नस्लों को ये दे पाएंगे.. यक्ष प्रश्न।
नागेंद्र प्रताप सिंह (अधिवक्ता)
[email protected]

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