Saturday, November 26, 2022
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रालोद के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती

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Pooja Kushwah
Pooja Kushwahhttps://muckrack.com/poojakushwah
Digital Journalist/ Social Activist/ News Media
(Graphics: RLD Last Election Data)

बीजेपी की लहर में रालोद को दो लोकसभा चुनाव और एक विधानसभा चुनाव में मिली पराजय से जयंत चौधरी के सामने अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाने की बडी चुनौती है। पिछले तीनो चुनावों मे रालोद शून्य पर सिमट गया था।

कहते है युद्ध और राजनीति में सब जायज होता है। इसी सूत्र पर गठबंधन की अदल-बदल के माहिर माने जाने वाले राष्ट्रीय लोकदल पूर्व अध्यक्ष और किसानों के मसीहा कहे जाने वाले स्व॰ चौधरी चरण सिंह के पुत्र स्व॰ चौधरी अजित सिंह की राजनीति इसी धूरी पर घुमती रही। इस साल कोरोना संक्रमण से उनका देहांत हो गया। पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी सियासी विरासत बचाने के लिए सपा-बसपा के साथ गठबंधन का दांव चला था, मगर ये दांव बुरी तरह से फेल साबित हुआ। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय सहारनपुर के देवबंद में आयोजित हुए सपा-बसपा-रालोद की सामुहिक रैली में बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंच पर रालोद नेता अजित सिंह और जयंत चौधरी को जूते उतारकर मंच पर बैठने को विवश कर दिया था, दोनो बाप-बेटा सियासी विरासत बचाने के लिए मन मारकर  मायावती और अखिलेश यादव के साथ मंच पर जूते उतारकर बैठ गए थे। पहली बार अपने पुश्तैनी संसदीय क्षेत्र बागपत को भी छोडना पडा था, जहां अजित सिंह स्वंय मुज्जफरनगर सीट से लडे और अपने पुत्र जयंत चौधरी को मथुरा के बजाए पैतृक सीट बागपत से चुनाव लडाया था, मगर दोनो बाप-बेटा की जोडी चुनाव बुरी तरह से हार गयी थी।

बागपत को स्व॰ चौधरी चरण सिंह की सियासी धरोहर माना जाता है, यहां से ही चौधरी साहब का दबदबा बिहार तक चलता था, क्षेत्र की जनता हर विषम परिस्थिति में चौधरी साहब के साथ चट्टान की तरह खडी दिखती थी। चौधरी की मृत्यू के बाद अजित सिंह उनकी सियासी विरासत सहेज कर न रख सके, वर्ष 1998 व 2014 में उनको पराजय का सामना करना पडा वहीं 2019 में जयंत चौधरी को पराजय का सामना करना पडा।

2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा से हारने से ज्यादा तीसरे स्थान पर लुढक जाना अजित सिंह के लिए कडवा अनुभव रहा, मुसलिम व अन्य पिछडा वर्ग के वोटों के खिसक जाने से 2017 के विधानसभा चुनाव में भी रालोद की बुरी गत हुई, पार्टी ने 277 उम्मीदवार उतारे थे, परंतु छपरौली सीट ही बच सकी।

अजगर और मजगर, दोनों फेल

स्व॰ चौधरी चरण सिंह की उत्तर भारत में राजनीतिक चौधराहट अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत (अजगर) जातियों के गठजोड पर चलती थी। जिसको बाद में अजित सिंह ने मजगर (मुस्लिम, जाट, गुर्जर व राजपूत गठजोड) में बदल कर काम चलाया, परंतु सपा-बसपा की मजबूती ने मुस्लिमों को यादव व दलितों की ओर मोड दिया।

मुज्जफरनगर दंगों ने जाट व मुस्लिम गठजोड की नींव भी हिला दी थी,इसलिए 2019 के लोकसभा चुनाव के समय पहली बार अजित सिंह किसी गठबंधन में मात्र तीन सीटों पर समझौते के लिए तैयार हो गए थे।

वर्ष 1967 में कांग्रेस को तोडकर मुख्यमंत्री बने स्व॰ चौधरी चरण सिंह की सियासी विरासत अब मात्र तीन सीटों बागपत, मुज्जफरनगर और मथुरा में ही सिमट कर रह गयी थी, जो प्रचंड मोदी लहर में ध्वस्त हो गयी है।

यूं घटता गया सियासी रूतबा

वर्ष 1987 में जब चौधरी चरण सिंह की मृत्यू हुई, तब राष्ट्रीय लोकदल के 84 विधायक थे,यह संख्या धीरे-धीरे घटती गयी। वर्ष 1999 की अटल सरकार में मंत्री रहे अजित सिंह के नेतृत्व में 2002 विधानसभा चुनाव में श्रेष्ठ प्रदर्शन रहा, तब भाजपा गठबंधन में 14 सीटें जीती। 2009 में भाजपा से दोबारा गठजोड कर लडे लोकसभा चुनाव में पांच सीटों पर जीत मिली थी, लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनावों के परिणाम बीजेपी के पक्ष में ना रहने पर सत्ता सुख भोगने के आदी रहे अजित सिंह चुनाव लडे और जीते भले ही बीजेपी के साथ गठबंधन करके मगर कुछ समय बाद फिर से गठबंधन तोडकर यूपीए सरकार में शामिल हो गए और मंत्री पद की शपथ ले ली। इसके बाद 2012 में कांग्रेस गठबंधन में विधानसभा चुनाव लडा और 9 सीटों में सिमट गए।

कहा जाता है 2014 लोकसभा चुनाव के समय चौ॰ अजित सिंह बीजेपी के साथ गठबंधन करके चुनाव लडने के इच्छुक थे मगर दो बार गठबंधन धर्म का पालन ना करने और सत्ता सुख के लिए साथ छोडने के पुराने रवैय्ये के कारण भारतीय जनता पार्टी ने किनारा कर लिया था, पिछले तीन चुनावों ने बीजेपी ने राष्ट्रीय लोकदल को जबरदस्त तरीके से पटका है, 2017 के विधानसभा चुनाव में मात्र एक सीट जीतने वाले विधायक ने भी बगावत कर दी थी जिसके बाद रालोद ने पार्टी से निकाल दिया था तथा उस एकलौते विधायक ने बीजेपी की सदस्यता ले ली थी।

रालोद की बागडोर जयंत चौधरी के पास है, पिछले एक साल से चल रहे कथाकथित किसान आंदोलन के सहारे जयंत चौधरी ने अपना राजनीतिक लाभ देखकर पश्चिमी यूपी मे लगातार जनसंपर्क और रैलियां की है।जयंत चौधरी अपने पिता के प्रति सहानुभूति लहर और किसान आंदोलन को हवा देकर बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाकर कुछ सीट जीतने की फिराक में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही तीनो कृषि कानूनों को रद्द करने की घोषणा की उधर जयंत चौधरी ने भी अंदरखाने समाजवादी पार्टी पर सीटों के बंटवारे के लिए दबाब बनाना आरंभ कर दिया था, फिलहाल सपा के साथ गठबंधन में 36 सीटे मिलने का अनुमान बताया जा रहा है।

रालोद के समर्थको का मानना है कि भले ही सपा गठबंधन की सरकार ना बने मगर रालोद कुछ सीटे जीतने में कामयाब हो जाता है तो चौ॰अजित सिंह की सियासी विरासत को संजीवनी मिल जायेगी।

ये देखना दिलचस्प होगा अगर रालोद एक दो सीटे जीत भी जाती है उधर मंहत योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी दोबारा से सरकार बनाती है तो क्या रालोद पांच साल विपक्ष में बैठेगा या पूर्व की भांति गठबंधन धर्म को ताक पर रखकर सत्ता सुख के लिए बाहर से समर्थन देकर मंत्री पद की अभिलाषा रखेगा। लेख -पूजा कुशवाह

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