Saturday, September 24, 2022
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दीपावली पर प्रदूषण रोकने का पाखंड

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Pooja Kushwah
Pooja Kushwahhttps://muckrack.com/poojakushwah
Digital Journalist/ Social Activist/ News Media

देश में एक नेरैटिव बना दिया गया है और बडे जोर शोर से प्रसार प्रचार किया जाता रहा है कि दीपावाली के अवसर पर पटाखों और आतिशबाजी के प्रयोग से प्रदूषण फैलता है, जिसके कारण हर साल दीपावली से पहले प्रतिबंध लगाने की होड मच जाती हैं। देश के सर्वोच्च न्यायलय ने यह आदेश दिया है कि केवल ‘ग्रीन क्रैकर्स’ का ही उत्पादन और बिक्री होनी चाहिए, वही दूसरी और देश की राजधानी दिल्ली के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अगली एक जनवरी तक पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया हैं।

प्रदूषण को रोकने के लिए जो भी आवश्यक कदम हो वो उठाने चाहिए उसके लिए किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए और ना ही ऐसे कदम से कोई आपत्ति दर्ज करायेगा, मगर प्रश्न ये उठता है कि कोई मोटा व्यक्ति जिसके मन में दुबला पतला होने का विचार आता है क्या से संभव है कि वो सालभर में एक दिन का उपवास करेगा तो उसका शरीर दुबला पतला हो जायेगा या उसको अपने शरीर को दुबला पतला करने के लिए अपने खाने- पीने पर नियंत्रण करके कुछ समय शाररिक व्यायाम में भी व्यतित करना पडेगा? हमें समझना होगा कि किसी भी समस्या का दूरगामी और स्थायी समाधान खोजना है तो हमें उस पर हरसंभव तरीके से निरंतर प्रहार करते रहना होगा।

दुनिया के अधिकतर देशों मे अंग्रेजी कलैंडर के नववर्ष के आगमन में जमकर आतिशबाजी होती है, स्वतंत्रता दिवस और अन्य महत्वपूर्ण पर्वों पर आतिशबाजी की जाती है और बडे पैमाने पर पटाखें छोडे जाते हैं। अमेरिका अपने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लगभग सौ करोड डॉलर आतिशबाजी पर खर्च करता है जिसमें बारह करोड किलोग्राम आतिशबाजी जलाई जाती है तथा डिज्नी मनोरंजन स्थलों पर हर साल लगभग पांच करोड डॉलर की आतिशबाजी जलाई जाती है अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि अधिकांश पश्चिमी देशों में महत्वपूर्ण पर्व और हर्ष के अवसर पर दिल खोलकर आतिशबाजी होती है,साथ ही वहॉं की सरकार और आम नागरिक पूरे साल पर्यावरण का भरपूर ख्याल रखते है।वहॉं की सडके साफ होती है, नदियों का पानी स्वच्छ और निर्मल बहता है, वो कचरा कहीं पर भी नहीं फेकते हैं।

इसके विपरीत अपने देश में देख लीजिए। हिंदू धर्म में आस्था का प्रतीक मानी जाने वाली और सबसे पवित्र नदी गंगा का अस्तित्व खतरें मे हैं।हर प्रकार की फैक्ट्ररियों की लगभग तीन सौ करोड लीटर गंदगी प्रतिदिन  गंगा में आकर गिरती हैं।जिसके परिणाम स्वरूप गंगा का पानी अशुद्ध होता जा रहा है।सरकार ‘गंगा एक्शन प्लान’ बनाकर नदी को गंदगी से बचाने का प्रयास कर रही हैं,अभी तक उस स्तर पर परिणाम धरातल पर दिखाई नहीं दे रहे हैं।

वर्तमान में हर पढे लिखे भारतीय के पास स्मार्टफोन है लगभग सभी भारतीयों के फोन में वाट्सएप अवश्य मिल जायेगा।सरकारी आंकडो की बात करे तो वर्तमान में भारत में लगभग 53 करोड लोग वाट्सएप इस्तेमाल कर रहे हैं।एक छोटा सा मैसेज लगभग चार ग्राम का कार्बन फुटप्रिंट निकालता है अगर आप उस संदेश के साथ कोई फाईल या फोटो विडियों भेजते है तो आंकडे बढकर पचास ग्राम कार्बन का हो जाता है।हम भारतीय लगभग चार सौ करोड संदेश प्रतिदिन भेज रहे हैं।इनका कार्बन फुटप्रिंट लगभग दस करोड किलोग्राम होगा।एक कार 5.2किलो मीटर चलने पर करीब एक किलोग्राम कार्बन छोडती है जो वायुमंडल में प्रवेश करता है,औसतन एक भारतीय अपना गाडी सालभर मे  बारह हजार किलो मीटर चलाता होगा,हम व्हाट्सएप से भेजे गए संदेशों से हर साल इतना कार्बन छोडते है जितना चालीस हजार गाडियों के चलने से होगा।एक केवल व्हाट्सएप का उदाहरण है इसमे फेसबुक,टेलेग्राम,ट्विटर,इंस्टाग्राम से भेजे संदेशो को भी जोड दे तो स्थिति भयावह हो जायेगी।

वर्तमान समय में बहुत से स्कूल और कॉलेज पूरी तरह से वातानुकुलित है।इन स्कूलों के पढे बच्चों के लिए गांवो मे कार्य करना असंभव हो जायेगा, वो गावों मे कार्य नहीं कर पायेगे ,घर से बाहर निकलते ही उनको सर्दी और गर्मी सताने लगेगी।इस स्कूल और कॉलिजों से कितना प्रदूषण फैल रहा है ये किसी ने हिसाब नहीं मांगा हैं.

एयर कंडिशनर धडाधड घरों और दफ्तरों में दिन रात चलते है,इसका पर्यावरण पर क्या असर होगा किसी ने सोचा हैं? किसान खुलेआम पराली जलाते है।उससे पर्यावरण बुरी तरह प्रदूषित होता है।

जहां पर्यावरण के प्राण हरे जा रहे है वहां कोई आवाज उठाने के लिए तैयार नहीं है परंतु  ये लोग दीपावली पर पटाखों और आतिशबाजी छोडने के खिलाफ मुहिम चलाकर सोचते है कि हमने पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा दी।दीपावली पर पटाखों और आतिशबाजी पर प्रतिबंध के विरोध में कुछ लोग कहते है कि हमारी धार्मिक भावनाओं को आघात करने का षढयंत्र है इस विषय में इतना ही कह सकते है कि पर्यावरण को बचाने के लिए हमें जीवन में संतुलन लाना होगा,जहां असली आघात हो रहा है वहां पर प्रहार करने की आवश्यकता है।जहां तक पटाखे छोडने की बात है हमारे जीवन में खुशियों के बहुत कम मौके है और ऐसे अवसर जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर से सीधा जुडे हुए है,उन पर प्रहार करने का क्या औचित्य है? ऐसे लोग जो एक दिन के लिए पर्यावरणविद बनने का प्रयास करते उनकों सोचने की आवश्यकता है। लेख- पूजा कुशवाह

(सभी विचार लेखक के व्यक्तिगत है)

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