Tuesday, October 19, 2021
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भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता २०१६ (IBC) क्या है?: प्रथम भाग

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An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

मित्रों भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता २०१६ को अंग्रेजों की भाषा में (Insolvency & Bankruptcy Code, २०१६) कहा जाता है। सर्वप्रथम हमारे मस्तिष्क में ये जिज्ञासा उत्पन्न होती है की वर्ष २०१६ में भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता को लागु करने की आवश्यकता क्यों पड़ी, आखिर इसकी आवश्यकता क्या थी? इस लेख के प्रथम भाग में हम संक्षिप्त रूप से इस विषय पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे।

मित्रों जैसा की आपको ये विदित है कि जिस विषय वस्तु (चाहे हो सजीव हो या निर्जीव) का सृजन होता है, उसका एक न एक दिन विनाश अवश्य होता है अर्थात हम इसे दूसरे शब्दों में समझने का प्रयास करें तो हम ये कह सकते हैं कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी अवश्य होगी| हम ये भी जानते हैं की किसी भी विषय वस्तु के निर्माण के पीछे कोई ना कोई कारण अवश्य होता है अर्थात अकारण किसी भी पदार्थ या सरंचना का निर्माण नहीं होता। हम इसी परिधि में भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की आवश्यकता को समझने का प्रयास करेंगे।

वर्ष १९५६ ई. में “कंपनी अधिनियम” को लागू  किया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत दिए प्रावधानों के अनुसार “रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनी” (ROC) के कार्यालय में आवेदन करके और सभी सुसंगत कार्यविधियों को पूर्ण कर कोई भी योग्य व्यक्ति अपने व्यवसाय के प्रकृति के अनुसार  एक कंपनी को जन्म दे सकता था, अतः कंपनी अधिनियम के अनुसार एक कंपनी को जन्म देना आसान था, परन्तु यदि कंपनी अपने व्यवसाय में असफल हो जाती थी और उसकी देयताएं (Liabilities) उसके सम्पत्तियों (Assets) कंही अधिक हो जाती थी तो उस कंपनी का जिन्दा रहना बड़ा मुश्किल होता था। अब जब कंपनी अपनी देनदारियां नहीं चूका पाती थी तो इस परिस्थिति में उसका अस्तित्व में बने रहना बहुत ही मुश्किल होता था अत: वो कंपनी अधिनियम के सुसंगत धाराओं के अंतर्गत न्यायलय में आवेदन देकर  स्वयं को समाप्त करने के लिए प्रार्थना करती थी, परन्तु उसे ये मौत इतनी आसानी से नहीं मिलती थी।

न्यायालय  कंपनी से कहती थी ठीक है तुम मरना चाहते हो तो हम तुम्हे मरने का आदेश देंगे पर उससे पूर्व तनिक ये भी तो बताओ की तुम पर जिन लोगों की देनदारियां बाकि है वो बैंक वाले, फाइनेंसियल इंस्टीटूशन या व्यक्ति विशेष को क्या कहना है तुम्हें मरने का आदेश देने के बारे में और इस प्रकार कम्पनी के समापन (winding up) के लिए सारी  कार्यविधियों को पूर्ण करने में ३ से ४ वर्ष का समय लग जाता था। अतः उपरोक्त तथ्यों का संक्षिप्त प्रकटीकरण ये है की कंपनी को पैदा करना तो आसान था परन्तु कंपनी को मरने (अर्थात उसके समापन) में बड़ी कठिनाई होती थी।

ये दौर कई वर्षों तक चलता रहा परन्तु इससे देनदारों को अपने पैसे को वापस प्राप्त करने में अत्यंत ही कठिनाई का सामना करना पड़ता था जिसको ध्यान में रखते हुए वर्ष १९८५ ई. में तत्कालीन केंद्र सरकार ने “रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष प्रावधान) अधिनियम, १९८५ लागू  किया जिसे अंग्रेजो की भाषा में THE SICK INDUSTRIAL COMPANIES (SPECIAL PROVISIONS) ACT, 1985 (SICA ) कहा जाता था। जैसा की नाम से ही स्पष्ट हो जाता है की िसंके अंतर्गत बीमार और असफल कंपनियों के समापन की विशेष व्यवस्था के लागू किया गया था। इसके अंतर्गत एक बोर्ड (मंडल) का गठन किया गया था जिसे “औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड” (Board for Industrial and Financial Reconstruction) के नाम से जाना जाता था। इस अधिनियम की सबसे विकट समस्या ये थी, की इसमें आवेदन वही कंपनी कर सकती थी, जो बिलकुल मरणासन्न स्थिति में पहुँच चुकी होती थी अर्थात उसके पुनर्निर्माण की सम्भावना ही खत्म हो चुकी होती थी। मित्रों कैंसर यदि प्रथम स्तर पर है तो उसकी चिकित्सा हो सकती है, यदि मान ले की कैंसर अपनी दूसरी या तीसरी अवस्था में आ चूका है तब भी उसकी चिकित्सा की सम्भावना बानी रहती है परन्तु यदि कैंसर अपने चौथे और अंतिम चरण में हो तो फिर आप उसकी चिकत्सा क्या करा पाएंगे।

इसके पश्चात भी कंपनी का समापन और उसके सम्पत्तियों का बटवारा “औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड” (Board for Industrial and Financial Reconstruction) के द्वारा सम्पूर्ण कार्यविधि को पूरा करने के पश्चात, आदेश पारित होने पर ही  कंपनी के देनदारों के मध्य हो सकता था अब ये बोर्ड चाहे एक वर्ष में आदेश दे या फिर कई वर्षों में आदेश दे। यंहा पर बोर्ड के द्वारा पारित किये गए आदेश के विरुद्ध अपील दायर करने का भी प्रावधान था जिसे “औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority for Industrial and Financial Reconstruction)” के नाम से जाना जाता था। इन सब प्रक्रियाओं से गुजरने के पश्चात जब कंपनी के सम्पत्तियों के बटवारे का समय आता था तो सरकार सर्वप्रथम अपनी झोली भर लेती थी और शेष बची राशि  को अन्य देनदारों के मध्य बाँट दिया जाता था। अत: इस अधिनियम से भी किसी भी प्रकार का कोई विशेष लाभ नहीं हो पा रहा था विशेषकर बैंक और अन्य फाइनेंसियल इंस्टीटूशन को क्योंकि उनका Non-Performing-Assets  (NPA) की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोत्तरी देखि जा रही थी और वे उनको वापस ले पाने आशय व् असमर्थ थे।

उपरोक्त समस्याओं को दृष्टिगत करते हुए वर्ष १९९३ में तत्कालीन केंद्र सरकार ने वर्ष १९८१ में दिए गए श्री टी. तिवारी समिति और तत्पश्चात श्री नरसिम्हन समिति के प्रतिवेदन (Report) के आधार पर “बैंकों और वित्तीय संस्थानों के ऋण की वसूली “RECOVERY OF DEBTS DUE TO BANKS AND FINANCIAL INSTITUTION (RDDBFI)” अधिनियम को लागू  किया जिसके अंतर्गत “ऋण वसूली न्यायाधिकरण” अर्थात DEBT RECOVERY TRIBUNAL (DRT) और “ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण” अर्थात DEBT RECOVERY APPELLATE TRIBUNAL (DRAT) ने कार्य करना शुरू किया। इनका मुख्य उद्देश्य था:- (१) दीवानी न्यायालय आदेश प्राप्ति में लगाने वाले लम्बी अवधी  से बैंक और फाइनेंसियल इंस्टीटूशन को राहत प्रदान करना, (२) Non- Performing- Assets (NPA) में हो रही अत्यधिक वृद्धि को रोकना, (३) कंपनी के समापन के कार्य को आसान बनाना और (४) बैंक और अन्य फाइनेंसियल इंस्टीटूशन के नुकसान को कम से कम करना। इस प्रकार उपरोक्त दोनों न्यायधिकरण ने दिनांक २४/०६/१९९३ से अपना कार्य शुरू कर दिया।

चूँकि DRT के लिए १८० दिन की अवधी निर्धारित की गयी जिसके अंतर्गत उसे अपने सामने प्रस्तुत किये गए आवेदन पर निर्णय करना था अतः प्रारम्भ में तो इसके सुपरिणाम भी दिखाई दिए जब DRT और DRAT ने कई मामलो का निपटारा अपेक्षाकृत कम समय करके अत्यधिक राहत पहुंचाई परन्तु धीरे धीरे और जैसे जैसे आवेदनों की संख्या बढ़ी वैसे वैसे DRT और DRAT की क्रियाशीलता में शिथिलता आती गयी और फिर एक समय ऐसा आया की दीवानी न्यायालय (CIVIL COURT) और DRT/ DRAT में कोई अंतर ही नहीं रह गया| अब DRT और DRAT में भी मामले कई कई वर्षों तक विचाराधीन अवस्था में दिखाई देने लगे और Non- Performing- Assets की संख्या भी बढ़ने लगी और सबसे बुरा हाल कर दिया विजय माल्या, मेहुल चौक्सी और नीरव मोदी जैसे भगोड़ो ने  जिन्होंने भ्रष्टाचारी नेताओ की सहायता से बैंकों से हजारो करोड़ रुपये उधार लिए और फिर चुकाए बिना देश छोड़कर भाग खड़े हुए , इससे  पूरी अर्थव्यवस्था लगभग पिछले पायदान पर चलने लगी। बैंक के पास पैसे नहीं थे ताकि वो आसान ब्याज की दर से लोगो को ऋण प्रदान कर सके जिससे “Start Up India” जैसे स्वयं का रोजगार शुरू करने वाली योजनाओ का देश के युवा लाभ उठा सके।

इसके पश्चात “बैंकों और वित्तीय संस्थानों के ऋण की वसूली “RECOVERY OF DEBTS DUE TO BANKS AND FINANCIAL INSTITUTION (RDDBFI)” के कुछ प्रावधानों को उच्च न्यायालय द्वारा असवैंधानिक  घोषित कर दिया गया जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय  ने सुसंगत संसोधन होने के पश्चात संवैधानिक घोषित कर दिया। तो इस प्रकार हम देखते हैं कि DRT और DRAT के कार्य करने के पश्चात भी समयबद्ध होने के पश्चात भी बैंकों और फाइनेंसियल इंस्टीटूशन्स की वित्तीय व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ अपितु वे दिनोंदिन कमजोर होते गए और जिसके कारन हमारे देश की अर्थव्यवस्था ढीली पड़ने लगी, महंगाई और बेरोजगारी एक साथ बढ़ने लगी।

उपरोक्त समस्याओं को ध्यान में रखते हुए वर्ष २००२ में तत्कालीन केंद्र सरकार ने “वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002” अर्थात “THE SECURITISATION AND RECONSTRUCTION OF FINANCIAL ASSETS AND ENFORCEMENT OF SECURITY INTEREST ACT, 2002 (SARFAESI)” लागू किया। दोस्तों जैसा की आपको याद होगा DRT व DRAT के प्राविधानों के अंतर्गत बैंक यदि अपने ऋणों का वसूली करना चाहती है किसी कंपनी या इंडिविजुअल व्यक्ति से तो उसे DRT के आदेश की आवश्यकता लेनी पड़ती थी, परन्तु SARFAESI ACT, २००२ के लागू  होने के पश्चात अब बैंक को किसी उधार लेने वाले व्यक्ति या कंपनी (DEBTOR ) से उसके (सम्पत्तियों) एसेट्स को बेचकर वसूल करने के लिए DRT से आदेश प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बैंक निम्न प्रकार से वसूली कर सकती है:

१) NPA  होने के पश्चात बैंक ६० दिनों की एक विधिक नोटिस देती है सम्बंधित कंपनी या व्यक्ति को और मांग करती है की नोटिस मिलने से ६० दिनों के अंदर उसके पैसों का भुगतान कर दिया जाये;

२) यदि ६० दिनों में भुगतान नहीं होता है तब बैंक  उस कंपनी या व्यक्ति के संपत्ति को जब्त करने की नोटिस उस संपत्ति पर चिपका देती है;

३) उस छेत्र में वितरित होने वाले समाचार पत्रों में इस जब्ती की सुचना प्रकाशित करवा देती है;

४) फिर निर्धारित दिन व समय पर उस संपत्ति की नीलामी की जाती है और  BASE  VALUE  से सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले व्यक्ति को वो संपत्ति बेच दी जाती है| वैसे तो ये सामान्य प्रक्रिया है और इसमें कुछ ६ से १२ महीनों का वक्त लगता है परन्तु यदि Debtor अपने अधिकारों का उपयोग कर लेता है (जैसे वो नोटिस मिलने के ४५ दिनों के अंदर यदि बैंक के जब्ती ( Attachment) नोटिस को DRT में अपील प्रस्तुत कर चुनौती दे दे देता है तब कार्यविधि बढ़ जाती है और उसके साथ अवधी भी। यंहा पर एक और परेशानी ये है की अकाउंट के NPA होने की अवस्था में ही बैंक SARFAESI ACT, २००२ के अंतर्गत कार्यवाही शुरू कर सकती है, उदहारण के लिए यदि वीडियोकॉन ने मई २०२१ में SBI से लिए ऋण की कोई क़िस्त नहीं जमा की तो SBI को ९० दिनों अर्थात अगस्त २०२१ में कार्यवाही शुरू करनी पड़ेगी क्योंकि किसी भी अकाउंट को NPA की श्रेणी में डालने के लिए ३ महीनों तक लगातार डिफ़ॉल्ट करना आवश्यक है अत: ३ महीने तो NPA  होने की प्रतीक्षा में निकल जाते है और फिर ६० दिनों का नोटिस पीरियड इस प्रकार असली कार्यवाही डिफ़ॉल्ट करने की तारीख से ५ महीनो के बाद ही शुरू हो पाती है और इस अवधी में सम्बंधित  कंपनी या व्यक्ति के सम्पतियों का बाजार मूल्य लगातार गिरता रहता है अत: बैंक को  उचित मूल्य के प्राप्ति की संभावना बहुत ही कम रहती है।

SARFAESI ACT, २००२ अधिनियम लागू  तो किया गया और समय समय पर संशोधन भी किये गए पर बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के बिगड़ते हालात पर कोई विशेष असर नहीं पड़ा| NPA  की संख्या में  कोई कमी नहीं आयी।

इसके पश्चात के तथ्यों का सूछ्म विवेचन हम द्रितीय भाग में करेंगे

Nagendra Pratap Singh (Advocate) aryan_innag@yahoo.co.in

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