Monday, July 15, 2024
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मोदी विरोध का मानसिक पतन

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जिस तरह से बंजारों का दल रोजी रोटी के लिए स्थान परिवर्तन करता रहता है लगभग वही स्थिति अब मोदी विरोधियो की हो गयी है। 101 दिन के विफल शाहीन बाग प्रयोग के बाद यह वैचारिक बंजारे किसान आंदोलन में करतब दिखा रहे है।

यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैँ किसानो का और उनके आंदोलन का पूरा सम्मान करता हूँ। मेरा ऐसा मानना है कि सरकार को जितना कानून बनाने का अधिकार है उतना ही जनता को अपनी असहमति या आपत्ति दर्ज कराने का है। परन्तु मैं किसानो के तौर तरीको से मैं सहमत नहीं हूँ। खास तौर पर हिंसा, धमकी और बात बात पर चुनौती देने वाली बातें गलत है। 26 जनवरी 2021 को दिल्ली की सड़को पर और लाल किले जो हुआ उसका कोई माफ़ी नहीं हो सकती।

खैर अब बंजारों की बात करते हैं। शाहीन बाग़ की विफल टोली का किसान आंदोलन को पूर्ण समर्थन है। ये वो लोग हैं जिन्हे न किसान से मतलब है ना ही मुसलमान से। इन्हे मतलब है हर उस इंसान से जो धारा प्रवाह में मोदी को या मोदी सरकार को कोस सकता है। जो भी मण्डली मोदी विरोध का भजन गाती है ये उसके पास चिपक कर बैठ जाती है। अपनी स्पष्ट प्रगतिशील विचारधारा ना होने के कारण अब यह मण्डली मानसिक पतन और अवसाद की तरफ बढ़ती जा रही है। वैचारिक गरीबी का हाल दिन प्रतिदिन बद से बदतर होता जा रहा है। बेचैनी का भाव हर उस व्यक्ति की तरफ दौड़ लगाने को मजबूर कर देता है जिसमे कोई समर्थन की उम्मीद दिखती है। जब निराशा हाँथ लगती है तब उनके विलाप देखने लायक होता है।

83 साल के अन्ना हज़ारे वो व्यक्ति है जिन्होने अकेले दम पर 2011 में भारत सरकार की जड़े हिला दी थी। अन्ना जी ने किसानो के समर्थन में भूख हड़ताल की घोषणा की थी। घोषणा होते ही मानो जैसे बंजारों को बिन मांगे भगवान मिल गया। उनके बीते दिनों के आंदोलनों की सूची निकाल कर अन्ना को अगला गाँधी तक बता दिया। इस बीच सरकार की तरफ से महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अन्ना से मिले और उन्हें बिल के बारे में विस्तार से बताया। अन्ना ने बिल को समझा और इसे किसान हित का बताते हुए उपवास वापस लेने की घोषणा कर दी।

अब अन्ना बंजारों के निशाने पर हैं। बंजारों के लिए अब अन्ना की ईमानदारी, देशप्रेम, नियत सब कुछ सन्देहास्पद है।

रोबिन रिहाना फेंटी “रीरी” पूर्वी कैरेबियन द्वीप बारबडोस में जन्मी अमरीकी गायिका हैं। अपने क्षेत्र में अत्यंत सफल है। परन्तु अक्सर विवादस्पद भी रहती है। अभी हाल ही 2017 में अबू धाबी के शेख ज़ायेद ग्रैंड मस्जिद में उनके फोटो सेशन के बाद मस्जिद प्रबंधन को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। इस्लामिक आयतो का अपने गानो में गलत इस्तेमाल का आरोप भी उन पर लगता ही रहता है। उन्होंने ने अभी हाल ही में किसानो का समर्थन किया है।

ग्रेटा टिनटिन थनबर्ग एक 18 साल की बच्ची है जो स्वीडन की रहने वाली है। जलवायु प्रवर्तन को ले कर उनका कड़ा विरोध दुनिया ने देखा जब 2019 हुए UN जलवायु शिखर सम्मलेन में उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति को अपना गुस्सा दिखाया। उसके बाद से ग्रेटा को प्रसिद्धि मिली। उसके बाद से वो जलवायु के ऊपर काम कर रही है। उन्होंने भी किसानो का समर्थन किया है। उन्होंने अपने समर्थन में अम्बानी, अडानी, भाजपा, आरएसएस आदि का नाम लिया है। यह संदेहास्पद है। इन नामो का उल्लेख भारत की विपक्षी पार्टिया करती है। किसी विदेशी मूल के व्यक्ति को इतनी स्पष्टता होगी यह यकीन करना मुश्किल है।

तीसरा नाम है मिया खलीफा। ये लेबनिज अमेरिकी पोर्न स्टार है। इनको खेती और किसानो की कितनी जानकारी होगी यह कहना मुश्किल है परन्तु इन्होने भी किसान आंदोलन का समर्थन किया है।

चौथा नाम है गीता गोपीनाथ। गीता केरला मूल की कोलकाता में जन्मी अमेरिकी भारतीय हैं। उनकी शिक्षा विख्यात शिक्षण संस्थानों दिल्ली विश्वविद्यलय, वाशिंगटन विश्वविद्यालय एवं प्रिंसटन विश्वविद्यालय में हुयी है। गीता गोपीनाथ प्रख्यात अर्थशाष्त्री होने के साथ साथ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में उच्च पद पर आसीन हैं। पब्लिक लाइफ और अर्थशास्त्र उनकी विशेषता है। उन्होंने किसान बिल का समर्थन किया है। उनके अनुसार किसान बिल किसानो की आय बढ़ायेगा। उन्होंने बिल को किसान हित में बताया है।

किसान बिल या विरोध को समझने के लिए इन चार नामों में गीता कही बेहतर शिक्षित, तार्किक, व्यवस्थित और सक्षम है। परन्तु बंजारों की पसंद मिया खलीफा, रीरी और ग्रेटा है। कारण स्पष्ट है, पहले तीन नाम बंजारों को समर्थन देने वाले है। अराजकता में तर्क का स्थान नहीं होता। बल्कि तर्क को जान बुझ कर नज़रअंदाज़ किया जाता है। देश की अस्थिर करने के लिए अराजकता का बना रहना जरुरी है।

अब सवाल यह है की ये बंजारे किसके इशारे पर यह सब कर रहे है। मदारी वो लोग हैं जो सात दशकों तक इस देश पर राज करते रहे। जिन्होंने देश को निजी संपत्ति माना। जिन्हे सत्ता से दूर रहना बर्दास्त नहीं हो पा रहा। नरेंद्र दामोदरदास मोदी एक ऐसा नाम है जो न सिर्फ सत्ता पर काबिज है बल्कि मजबूती से प्रधानमंत्री के पद पर बैठा भी है। मोदी की भारतीयों के बीच लोकप्रियता मदारियों और बंजारों को बेचैन करती है। मोदी की तरफ से एकाधिकार को चुनौती ही नहीं मिली है बल्कि आने वाले कई सालो में सत्ता में वापसी के भी कोई आसार नज़र नहीं आ रहे।

सादगी के साथ सार्वजनिक जीवन जीना इन मदारियों की मज़बूरी है। इस लिए शोर मचाने के लिए मदारियों ने अपने जमूरों और बंजारे छोड़ रखे है। मदारी इशारा करता है और ये नाचने लगते है। कोई वैचारिक या तार्किक स्तर अब नहीं रह गया है। अब सिर्फ एक ही तर्क है मोदी विरोध। भले ही उसके लिए देश का ही विरोध क्यों न करना पड़े। यह वैचारिक पतन 26 जनवरी को दिखा। जब अराजक तत्वों ने लाल किले पर धार्मिक झंडा फेहरा दिया तब युवा कांग्रेस के एक अधिकृत ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया की “किसानो ने लाल किला फ़तेह कर लिया”. यह अब और न गिरे बस प्रभु से यही प्रार्थना है।

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