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भीमा कोरेगांव का प्रपंच

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भीमा कोरेगांव का प्रपंच

1 जनवरी को फिर से भीमा कोरेगांव का जिन्न जागेगा और दुष्ट अंग्रेजों के विजय की बरसी मनाई जाएगी, रवीश अपने फेसबुक पर प्रपंच फैला चुका है एवं अन्य वामी कामी उसके फिराक में हैं।

आज जो लिख रहा हूँ उसे पढने के बाद बहुत लोग आसानी से मुझे अपने द्वारा बांटे गए दो श्रेणी में से एक श्रेणी का घोषित कर देंगे क्योकि मैं अपना पूरा नाम भी पर लिख रखा हूँ।

महाराष्ट्र में हुए हिंसा को दलित हिंसा कह रहे थे कुछ लोग,नहीं साहब ये कोई दलित हिंसा नहीं था ये उस सोंच की हिंसा थी जो अंग्रेजों को अपना उद्धारक मानती है। बताइए आजाद भारत में अंग्रेजों के जीत की बरसी मनाई जाती है, क्या यह गाँधी जी का अपमान नहीं है? अरे आपके इस आंग्ल विजय की बरसी में तो भगवान बिरसा मुंडा जो आदिवासी समाज से आते हैं उनका भी अपमान है जो अंग्रेजों से लड़ते हुए केवल अमर ही नहीं हुए बल्कि आम जनों के, देश भक्तों के भगवान बन गए। मित्रों माफ़ करियेगा गाँधी भी केवल महात्मा से संबोधित होते हैं पर मुझे गर्व है आदिवासी समूह से आने वाले पूज्य क्रन्तिकारी बिरसा मुंडा पर जिन्हें हम आम जन भगवान कह संबोधित करते हैं और कुछ लोग ऐसे क्रांतिकारियों का अपमान कर अंग्रेज विजय का बरसी मना रहे हैं। आप इस बरसी को दलितों से जोड़कर हमारे पूज्य दलित क्रन्तिकारी तिलका मांझी, सिद्धु संथाल, गोची मांझी, चेतराम जाटव, बल्लू मेहतर, वीरांगना झलकारी बाई, मेंकुलाल, नेता जी के साथ के चमार रेजीमेंट जैसे वीरों का अपमान कर रहे हैं जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बड़े वीरता से युद्ध किया मैं लिखकर देता हूँ कि जो स्वयंभू दलित नेता हैं वो इन क्रांतिकारियों का कभी नाम भी नहीं सुने होंगे। अरे आपको दलित उत्सव आदि ही मनाना था तो आप कभी और मना लेते डॉक्टर आंबेडकर की जयंती पर मना लेते, भगवन बिरसा के अवतरण दिवस पर मना लेते पर यह अंग्रेज विजय दिवस पर ही क्यों?

अगर अंग्रेज दलित समर्थक थे तो बताएं कितने दलितों को अंग्रेजों ने अपने शासन के समय उच्च प्रशासनिक पोस्ट को दिया या आप बताएं अंग्रेजों ने दलितों के लिए दलित उत्पीरण कानून क्यों नहीं बना दिया अगर उन्हें दलितों की चिंता थी तो? अंग्रेजों ने बाबा साहब को पढने में मदद क्यों नहीं किया? मित्रों मेरे दलित भाइयों का प्रयोग तब अंग्रेजों ने किया अब मेवणी जैसे लोग कर रहे हैं। आप ही बताएं उस हिंसा के बाद वहां उमर खालिद पहुँच गया यह वही उमर खालिद है जो अफजल की बरसी मनाता है अर्थ साफ है मेरे मित्रों पहले अफज़ल की बरसी फिर अंग्रजों के विजय की बरसी। सच कहूँ तो ये मेरे ये भोले दलित भाई तो बस हथियार हैं। इनका इरादा तो देश को तोडना है बहुत सुनियोजित साजिस है इनकी। हम आम लोगों के अन्दर एक दुसरे की लिए कोई नफरत नहीं है पर देश विरोधी ताकत अभी देश में अस्थिरता लाने के लिए दोनों ही पक्ष के कुछ लोगों को पैसों से खरीद हमारे बीच नफरत बोने का काम कर रहे हैं आप खुद ही देख लीजिये इस हिंसा में किसका फायदा हुआ उसे ही न जिसे कल तक कोई पूछता नहीं था और आज वो हर न्यूज के लाइव डिबेट में आ रहा है और कोई खुद को खुद से एक समुदाय का नेता बताता है तो कोई दुसरे समुदाय का।

अब आपको चुनना है आप अंग्रेज विजय की बरसी मनाएंगे या भगवान बिरसा मुंडा का अवतरण दिवस।

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