Tuesday, October 4, 2022
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“अवमानना (Contempt), न्यायालय की अवमानना व सर्वोच्च न्यायालय”

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

दोस्तो जैसा कि आप इस तथ्य से अवगत हैं कि 27 जून 2020 को श्री प्रशांत भूषण ने अपने ट्विटर अकाउंट से एक ट्वीट सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ और 28 जून 2020 को दूसरा ट्वीट मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबड़े के खिलाफ किया था!

श्री प्रशांत भूषण की ओर से किए गए दो अलग-अलग ट्वीट पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ अवमानना (Contempt) की कार्रवाई शुरू की थी और 22 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रशांत भूषण को इस मामले में नोटिस जारी किया गया था!

विदित हो कि 28 जून को चीफ जस्टिस एस ए बोबड़े की एक तस्वीर सामने आई थी. इसमें वो महंगी बाइक पर बैठे नज़र आ रहे थे, इस तस्वीर पर श्री प्रशांत भूषण ने टिप्पणी की थी कि CJI ने सुप्रीम कोर्ट को आम लोगों के लिए बंद कर दिया है और खुद बीजेपी लीडर की 50 लाख रुपये की बाइक चला रहे हैं! उन्होंने अपने दूसरे ट्वीट में पिछले 4 चीफ जस्टिस पर लोकतंत्र को बरबाद करने में किरदार निभाने का आरोप लगाया था!

चलिये इस वाद में क्या निर्णय हुआ इस पर अतं में चर्चा करेंगे पहले ये जानने का प्रयास करते हैं कि “अवमानना (Contempt) का क्या अर्थ होता है व “न्यायालय की अवमानना” का अपराध क्या होता है और सर्वोच्च न्यायालय किन प्रावधानों के तहत अपराधी को दण्डित कर सकता है!

अवमानना (Contempt)का अर्थ:- वह बात या कार्य जिससे किसी का मान या प्रतिष्ठा कम हो या कोई ऐसा काम या बात करने की क्रिया जिससे किसी का मान या प्रतिष्ठा घटे, अवमानना कहलाता है!

दूसरे शब्दो में कहे तो अवमानना से अभिप्राय “बात न मानने की क्रिया या जानबूझकर आदेश का उल्लंघन या अपमान या तिरस्कार से!
West’s Encyclopaedia of American Law”. The Free Dictionary.com. के अनुसार “An act of deliberate disobedience or disregard for the laws, regulations, or decorum of a public authority, such as a court or legislative body.”

Individuals may be cited for contempt when they disobey an order, fail to comply with a request, tamper with documents, withhold evidence, interrupt proceedings through their actions or words, or otherwise defy a public authority or hold it up to ridicule and disrespect.

न्यायालय की अवमानना :-
Contempt of court is behavior that opposes or defies the authority, justice, and dignity of the court.

न्यायालय अवमान अधिनियम 1971 की
धारा 2 (क) के अनुसार “न्यायालय अवमान” से सिविल अवमान अथवा आपराधिक अवमान अभिप्रेत है अर्थात अवमान (Contempt) दो प्रकार के होते हैं 1- Civil(दीवानी) व आपराधिक( Criminal)!

धारा 2(ख) के अनुसार “सिविल अवमान” से किसी न्यायालय के किसी निणर्य, डिक्री, निर्देश, आदेश, रिट या अन्य आदेशिका की जानबूझकर अवज्ञा करना अथवा न्यायालय से किए गए किसी वचनबन्ध को जानबूझकर भंग करना, अभिप्रेत है;

धारा 2(ग) के अनुसार “आपरािधक अवमान” से किसी भी ऐसी बात का (चाह बोले गए या लिखे गए शब्दों के द्वारा या संकेतों के द्वारा या
दृश्य रूपणो द्वारा या अन्यथा) प्रकाशन अथवा किसी भी अन्य ऐसे कार्य का करना अभिप्रेत है
:-(i) जो किसी न्यायालय को कलंकित करता है या जिसकी प्रवृति उसे कलंकित करने की हैं अथवा जो उसके प्राधिकार को अवनत करता ह या जिसकी प्रवृति उसे अवनत करने की है; अथवा

(ii) जो किसी न्यायिक कायर्वाही के सम्यक् अनुक्रम पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, या उसमें हस्तक्षेप करता है या जिसकी प्रवृति उसमें हस्तक्षेप करने की है; अथवा

(iii) जो न्याय प्रशासन में किसी अन्य रीति से हस्तक्षेप करता है या जिसकी प्रवृति उसमें हस्तक्षेप करने की है अथवा जो उसमें बाधा डालता है या जिसकी प्रवृति उसमें बाधा डालने की है

धारा 2(घ) के अनुसार “उच्च न्यायालय” से किसी राज्य अथवा संघ राज्यक्षेत्र के लिए उच्च न्यायालय अभिप्रेत है और किसी संघ राज्यक्षेत्र में न्यायिक आयुक्त का न्यायालय इसके अन्तर्गत है।

नूराली बाबूल थानेवाला विरूद्ध के एम एम शेट्टी AIR 1990 S.C. 464:-सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा यह निर्धारित किया गया कि “Breach of an undertaking given to a Court by a person in civil proceedings, on the faith of which the Court sanctions a course of action is misconduct and amounting to contempt of court.

अमर बहादूरसिंह विरूद्ध पी. डी. वासनिक व अन्य 1994 Cri.L.J 1359 =1994(2) Bom CR 464 (Bom) it is held that “Where action of contemnor is wilful, deliberate and in clear disregard of Court’s order, it amounts to civil contempt”.

धारा 12 (1) से 12(5) तो दण्ड का प्रावधान किया गया है और धारा 12(1) निर्धारित करती है “इस अिधिनयम या किसी अन्य विधि में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबिन्धत है उसके सिवाय “न्यायालय अवमान सादा कारावास से, जिसकी अविध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमार्ने से, जो दो
हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकेगा :

परन्तु न्यायालय को समाधानप्रद रूप से माफी मांगे जाने पर अभियुक्त को उन्मोचित किया जा सकेगा या अधिनिर्णित दण्ड
का पिरहार किया जा सकेगा।

अत: न्यायालय की अवमानना का अभिप्राय एक प्रकार से “न्यायालय का अपमान करने का अपराध होता है”!

सि.पी. सिंह विरूद्ध राजस्थान 1993 Cr. L. J. 125, में स्पष्ट किया गया कि “ दण्डित करने की शक्ति का उपयोग न्यायालय के अधिकारी के विरूद्ध उन मामलो मे किया जाना चाहिये जिसमे जानबूझकर (deliberately) न्यायालय के आदेश का उल्लंघन किया गया है या जानबूझकर किसी निर्देश का पालन नहीं किया गया है!

सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार:-

संविधान का अनुच्छेद 129 सर्वोच्च न्यायालय को स्वंय की अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति देता है। इसके अनुसार उच्चतम न्यायालय अभिलेख का न्यायालय (कोर्ट ऑफ़ रिकॉर्ड) होगा, और इसलिए ऐसा न्यायालय होने के नाते इसमें कोर्ट ऑफ़ रिकॉर्ड की सभी शक्तियाँ निहित होंगी, जिसमें स्वयं के अवमान के लिए दंडित करने की शक्ति भी शामिल होगी।

अनुच्छेद 142 (2) अवमानना के आरोप में किसी भी व्यक्ति की जांच एवं उसे दंडित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को सक्षम बनाता है। यह प्रदान करता है कि उच्चतम न्यायालय, किसी भी व्यक्ति को स्वयं की अवमानना के लिए दंडित और उस अवमान के लिए अन्वेषण (काँच छाँट विच्छेदन ) तो कर सकता है, लेकिन उच्चतम न्यायालय की यह शक्ति, संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के प्रावधानों के अधीन होगी।

अनुच्छेद 215 सभी उच्च न्यायालयों को स्वंय की अवमानना के लिए दंडित करने में सक्षम बनाता है।

दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ और सीके दफ्तरी बनाम ओपी गुप्त जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय यह कह चुकी है कि संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 के तहत मिले उसके अधिकारों में न तो संसद और न ही विधानसभाएं कटौती कर सकती हैं।

न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971को वर्ष 2006 में धारा 13 के तहत ‘सत्य की रक्षा’ को शामिल करने के लिए संशोधित किया गया था।

इस संशोधन के अंतर्गत दो बिंदु जोड़े गए और कहा गया कि अवमानना के मामले में मुजरिम की सच्चाई और नियत को भी ध्यान में रखा जाए।
संशोधन के अनुसार

A)Notwithstanding anything contained in any law for the time being in force (a) no court shall impose a sentence under this Act (Contempt of Court, Act, 1971) for a contempt of court unless it is satisfied that the contempt is of such nature that it substantially interferes, or tends substantially to interfere with due course of justice; and

B) the court may permit, in any proceeding for contempt of court, justification by truth as a valid defence if it is satisfied that it is in public interest and the request for invoking the said defence is bonafide.”

In Shanti Parva Chapter 109 S. 9,4 and 5 of Mahabharat it is said that “To tell the truth is righteous. There is nothing higher than truth. But where falsehood prevails as truth, truth should not be said there. There, again where truth passes for falsehood, even falsehood should be said.”

सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश व केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (कैट) के अध्यक्ष श्री प्रमोद कोहली के अनुसार
“सुप्रीम कोर्ट के फैसले पूरे देश पर लागू होते हैं और सभी अदालतें और कार्यपालिका उन फैसलों को मानने के लिए बाध्य हैं। अवमानना का कानून अगर न हो तो कोई भी सुप्रीम कोर्ट या दूसरी अदालतों के फैसले नहीं मानेगा।”

दिनांक 30.05.2019 को दिये गये एक विस्तृत फैसले में, माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने टी. सुधाकर प्रसाद बनाम आंध्र प्रदेश सरकार वाद में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले [2001 (1) एससीसी 516] तथा इस विषय पर अन्य निर्णयों का संदर्भ दिया और यह माना कि “सिर्फ न्यायाधिकरण के पास इस अवमानना ​​मामले को सुनने और तय करने का अधिकार क्षेत्र है।”

सुखदेव सिंह बनाम ऑनरेबल सी. जे. एस. तेजा सिंह एवं अन्य AIR 1954 SCR 454 के मामले में यह साफ़ किया गया था कि “संविधान के अनुच्छेद 129 से यह पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट के पास कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड की सभी शक्तियां हैं, जिसमें खुद की अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति भी शामिल है। वहीँ, अनुच्छेद 142 (2) एक कदम आगे बढ़कर उच्चतम न्यायालय को किसी भी अवमानना की जांच (Investigation) करने में सक्षम बनाता है।”

उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 1954 में तय किये गए इस मामले से इन दोनों अनुच्छेदों 129 व 142(2) के बीच की दुविधा को दूर करने मे सहायता मिलती है!

यह तथ्य अपने आप में पूर्णरूपेण तार्किक साबित होती है कि “उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं की अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति, एक संवैधानिक शक्ति है, और इस तरह की शक्ति को एक विधायी अधिनियम द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है और ना ही ईस शक्ति को सीमित किया जा सकता है।

सुओ मोटो कंटेम्प्ट पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 2 ऑफ 2019 RE. विजय कुर्ले एवं अन्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह साफ़ तौर पर देखा है कि – उच्चतम न्यायालय की स्वयं की अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति, संसद द्वारा बनाये गए 1971 के अधिनियम के प्रावधानों के अधीन नहीं है।

विदित हो कि मार्च 2019 में वकील मैथ्यूज नेदुम्परा को अवमानना का दोषी ठहराने के आदेश पर जस्टिस आर. एफ. नरीमन और जस्टिस विनीत सरन के खिलाफ ‘घिनौने और निंदनीय ‘आरोपों के लिए27 अप्रैल 2020 को न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने विजय कुरले (राज्य अध्यक्ष, महाराष्ट्र और गोवा, इंडियन बार एसोसिएशन), राशिद खान पठान (राष्ट्रीय सचिव, मानवाधिकार सुरक्षा परिषद) और नीलेश ओझा (राष्ट्रीय अध्यक्ष, इंडियन बार एसोसिएशन) को अवमानना का दोषी ठहराया।

प्रवीन सी शाह विरूद्ध के. ए. मोहम्मद व अन्य (2001)8 SCC 650. में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि “Purging oneself of contempt can be only by regretting or apologising in the case of a completed action of Criminal Contempt. if it is a case of civil contempt, by subsequent compliance with the orders or directions the contempt can be purged of. There is no procedural provision in law to get purged of contempt by an order of an appropriate court.”

बार काउंसिल आफ ईण्डिया विरूद्ध केरला उच्च न्यायलय (2004) 6 SCC 311, the ratio in Pravin C. Shah (supra) was affirmed by this Court. It was held that the Court has the power to punish under Article 129 of the Constitution of India and can punish advocate.

SUO MOTU CONTEMPT PETITION (CRL.) NO.1 OF 2020 अवमानना मामले (Prashant Bhushan Contempt Case) में न्यायमूर्ति श्री अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति श्री बीआर गवई और न्यायमूर्ति श्री कृष्ण मुरारी की पीठ ने प्रशांत भूषण को सजा सुनाते हुए एक रुपये का जुर्माना लगाया!

फैसले के अनुसार प्रशांत भूषण को 15 सितंबर तक जुर्माना नहीं दिए जाने की स्थिति में 3 महीने की जेल हो सकती है! इसके साथ-साथ उन्हें तीन साल के लिए वकालत से भी निलंबित किया जा सकता है! प्रशांत भूषण ने 1 रूपया जमा करा दिया!

अदालत ने 14 अगस्त को सजा सूनाते हुये सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि प्रशांत भूषण ने पूरे सर्वोच्च न्यायालय के कार्यप्रणाली पर आक्रमण किया है और अगर इस तरह के आक्रमण को सख्त तरीके से नहीं लिया जाता है तो इससे राष्ट्र की प्रतिष्ठा और ख्याति प्रभावित होगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि लोगों का न्यायपालिका के प्रति भरोसा और न्याय प्राप्त करने की क्षमता ही न्यायपालिका की बुनियाद है। न्यायपालिका की बुनियाद को प्रभावित करने की कोशिश की जाएगी तो इससे लोगों का न्यायपालिका के प्रति अनास्था पैदा होगा।

प्रशांत भूषण ने न सिर्फ झूठे आरोप लगाए बल्कि न्याय प्रशासन के वैभव पर अवांछनीय आक्रमण किया। इस तरह का अटैक न्यायपालिका के प्रति आम लोगों के बीच अनादार का भाव पैदा करता है और इस हरकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में प्रशांत भूषण के उस दलील को खारिज कर दिया था कि उन्होंने लोकहित में स्वस्थ्य आलोचना की थी।

निष्कर्ष:-
उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि न्यायालय का अपमान करके व्यक्ति केवल न्यायालय या न्यायधिश की गरिमा व गौरव को ही नुकसान नहीं पहुँचाता अपितु वह जनता के हृदय मे न्यायिक प्रणाली व प्रक्रिया के विरूद्ध अविश्वास का वातावरण तैयार करता है जो जनता के न्यायपालिका पर किये जाने वाले भरोसे को छति पहुँचाता है! न्यायालय की अवमानना आम जनता के न्यायिक प्रक्रिया पर किये जाने वाले भरोसे का अपमान है और एक जघन्य अपराध है!” Contempt of court is an offence which constitutes, Scandalising Court or Judge, undermining people’s confidence in administration of justice and bringing or tending to bring the Court into disrepute or disrespect.”

इसलिए, अदालत के लिए केवल एक आवश्यकता यह है कि उसके द्वारा ऐसी प्रक्रिया का पालन किया जाए, जो न्यायसंगत है, न्यायपूर्ण है और न्यायालय द्वारा तय किए गए नियमों और उस पर व्यक्त किये गये जनता के भरोसे के अनुसार है।

नागेंद्र प्रताप सिंह (अधिवक्ता)
[email protected]
9172054828

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