Saturday, December 5, 2020
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Western feminism विष, नारी शक्ति अमृत है

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aryaveer
B.Tech graduate in Electronics & communication engg., Cyber security expert, having interest in Indology and true indian history.

सत्य सनातन वैदिक धर्म में नवरात्र के पावन दिनों में उस परमब्रह्म सर्वशक्तिमान की उपासना उसके नारी रूप अर्थात शक्ति के रूप में होती है। परंतु लगभग हर वर्ष इसी समय कुछ विषैले वामपंथी समूह फेमिनिज्म का सहारा लेकर हिंदू रीति, कर्मकांड और देवी-देवताओं का सुनियोजित तरीके से अपमान करते हैं। इसी दिशा में प्राचीन आर्यवर्त्त में नारी शक्ति के स्थान और महत्व के ज्ञानरूपी अमृत के कुछ छींटे इन अधर्मियों पर डालने का छोटा सा प्रयास किया है।

वर्तमान में भारतीय समाज में विशेषकर युवा वर्ग स्वयं को फेमिनिस्ट कहलवाने मे गर्व की अनुभूति करता है। कारण स्पष्ट है कि उन्हें इस पश्चिमी उत्पाद-फेमिनिज्म का विष कई दशकों से धीरे-धीरे पिलाया जा रहा है, कहीं पर विश्वविद्यालयों में, कहीं सोशल मीडिया पर बॉलीवुड के भांड और वामपंथी विचारको द्वारा। यह तथाकथित फेमिनिस्ट महिलाओं के समान अधिकार और नारी सशक्तिकरण के लिए मुखर रहते हैं जो प्रथम दृष्टया एक अत्यंत आधुनिक और प्रगतिशील विचार प्रतीत होता है। परंतु थोड़ा गहराई में खोजने से इनकी सच्चाई बाहर आ जाती हैं। सीमा पर देश की सुरक्षा में लगी हुई महिला कमांडो या फिर राफेल उड़ाने वाली महिला पायलट इनके लिए नारी सशक्तिकरण का प्रतीक नहीं है। इनके लिए विमेन एंपावरमेंट है-भारत विरोधी नारे लगाना, कश्मीर की आजादी मांगना, कॉलेज कैंपस में धूम्रपान और मदिरापान करना और वामपंथी विचारधारा पर सहयोग न करने पर अपने ही माता पिता को भद्दी भद्दी गालियां बकना।

महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए ये तथाकथित फेमिनिस्ट सबरीमाला मंदिर में तो खूब भाग भाग कर जाती हैं, जबकि तथ्य यह है कि संपूर्ण भारतवर्ष में मात्र 2 या 3 मंदिर ही ऐसे हैं जहां पर देव ब्रह्मचारी के रूप में उपस्थित है और सनातन पद्धति में किसी भी ब्रह्मचारी को स्त्री का दर्शन नहीं करना चाहिए। इसलिए वहाँ एक विशेष आयुवर्ग की स्त्रियों का जाना मना है। वहीं दूसरी और विश्व की अधिकतर मस्जिदो में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, किसी भी मस्ज़िद में उन्हें पुरुषों के साथ मुख्य भाग में नमाज़ नही पढ़ने दिया जाता। क्या उन्हें समान अधिकार नहीं चाहिए? यहां पर समान अधिकारों की बात पर इन फेमिनिस्ट के मुंह में दही जम जाता है।  हर हिंदू त्यौहार पर ये लोग सुनियोजित प्रपंच चलाते हैं। हिंदू कर्मकांड और संस्कारों आदि को कभी महिला विरोधी बताकर, कभी पुरुषवादी और रूढ़िवादी बताकर। वहीं दूसरी ओर इस्लामिक रूढ़िवादिता का दंश झेल रही तीन तलाक, बहुविवाह, निकाह-हलाला, निकाह-मुता, बालिका-खतना आदि कबीलाई प्रथाओं से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के नाम पर इन तथाकथित फेमिनिस्ट को सांप सूंघ जाता है। यही है इनका चुनिंदा वेस्टर्न फैमिनिज़्म। वास्तव में, इन्हें महिलाओं के लिए समान अधिकारों और नारी सशक्तिकरण से कोई लेना देना नहीं है। इनका एकमात्र उद्देश्य है-सत्य सनातन संस्कृति पर प्रहार करना और हिंदू समाज के अंदर अपने ही धर्म और संस्कृति के प्रति घृणा और हीन भावना पैदा करना।

फेमिनिज्म का इतिहास 

फेमिनिज्म  पश्चिम से उधार ली गई एक विचारधारा है । पश्चिम के संपूर्ण इतिहास में महिलाएं केवल घरेलू कार्यों तक ही सीमित थी। मध्यकालीन यूरोप में स्त्रियों को संपत्ति रखने, सामाजिक जीवन में भागीदारी करने और पढ़ने लिखने के कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे। 19वीं सदी के अंत तक महिलाओं को सामाजिक स्थानों पर अपने सर ढकने पढ़ते थे और जर्मनी के कुछ हिस्सों में तो पति को अपनी पत्नी को बेचने तक के अधिकार प्राप्त थे। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप में महिलाएं न तो वोट डाल सकती थी ना ही कोई पद ग्रहण कर सकती थी और अमेरिका के अधिकतर राज्यों में महिलाओं के लिए बिना पुरुष की सहायता के कोई भी व्यापार आदि करना वर्जित था। 1872 ई० मे न्यूयॉर्क में सूजन एंथोनी को केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि चुनाव में उसने वोट डाल दिया था। आश्चर्य की बात यह है कि स्वंय को आधुनिक समाज कहने वाले अमेरिका के मिसिसिपी में 1984 में महिलाओं को वोट डालने का अधिकार मिले हैं। इस असमानता ने पश्चिम की महिलाओं में रोष उत्पन्न कर दिया और उन्होंने अपने अधिकारों के लिए मांग उठानी प्रारंभ कर दी थी। इस प्रकार फेमिनिज्म का जन्म हुआ। लेकिन इस्लाम और क्रिश्चियनिटी के प्रादुर्भाव से कई हजारों वर्ष पूर्व ही एक ऐसी सभ्यता और संस्कृति विद्यमान थी जहां पर कन्याओं के लिए अलग पाठशाला और गुरुकुल हुआ करते थे। शास्त्र, शस्त्र, राजनीति, युद्धकला, शिल्पकला आदि अनेक विद्याओं में स्त्रियां पारंगत होती थी- वह पवित्र भूमि थी आर्यवर्त्त जो आज भारतवर्ष कहलाता है।

आर्यवर्त्त में स्त्री का स्थान

युधिष्ठिर से यक्ष प्रश्न करते है- पृथिवी से भी भारी कौन है? युधिष्ठिर उत्तर देते है- माता, माता पृथ्वी से भी भारी है। इसलिए माता को पृथ्वी भी कहा गया है। जिस प्रकार पृथ्वी सम्पूर्ण प्रकृति को अंकुरित और पालन पोषण करती है, ठीक वैसे ही माता और स्त्री सम्पूर्ण समाज का दायित्व उठाती है। इसी कारण सत्य सनातन वैदिक (हिन्दू) संस्कृति में नारी का स्थान पुरूष के बराबर नही रखा गया, अपितु सदैव पुरुष से ऊँचा रखा गया है। मनु महाराज कहते है-

” यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यंते सर्वास्तत्राफ़ला: क्रिया:।। ” 

अर्थात – जिस स्थान पर नारी की पूजा- आदर सत्कार होता है वहीं देवता भी वास करते है, और जहाँ पर नारी का सम्मान नही होता वहाँ किये गए समस्त शुभ कार्य भी असफल हो जाते है।

विश्व के मुख्य तीन बड़े धर्म इस्लाम, क्रिश्चियनिटी और सत्य सनातन हिंदू धर्म में से हिंदू धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जिसमें परमेश्वर के स्त्री रूप को समान मान्यता दी गई है। भगवान शिव को कई अलग-अलग रूप में पूजा जाता है। जिनमें से एक है उनका अर्द्धनारीश्वर रूप। इस रूप में आधे हिस्से में जो शिव है, वह पुरुष है और आधे हिस्से में जो शक्ति है, वह स्त्री है। शिव का यह अवतार स्त्री और पुरुष की समानता दर्शाता है। भगवान शंकर ने तो सृष्टि के आरंभ में ही नारी शक्ति को समान अधिकार दे दिया था क्योंकि ईश्वर के लिए तो हम सभी उनकी संतान एक समान हैं। इस प्रकार दुर्गा, काली, लक्ष्मी और अन्य बहुत से रूपों में देवताओं के समान देवियों की भी हिंदू धर्म में उपासना होती हैं। जैसे कुबेर धन के देवता हैं,तो लक्ष्मी धन की देवी हैं।

प्राचीन भारत अर्थात आर्यवर्त्त में स्त्रियां अनेक विद्याओं जैसे धनुर्वेद, युद्ध कौशल, शिल्प विद्या, पठन-पाठन आदि में पारंगत हुआ करती थी। अपने युद्ध कौशल से ही माता कैकेयी ने राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी। रानी कर्णावती जिन्हें नाक काटी रानी भी कहा जाता है, उन्होंने अपने युद्ध कौशल से ही इस्लामिक आक्रांता के छक्के छुड़ा दिए थे और बची कुची सेना के नाक काट कर वापस भेजा था। सनातन संस्कृति में ऐसी वीरांगनाओं के असंख्य उदाहरण है जैसे रानी लक्ष्मीबाई रानी दुर्गावती झलकारी बाई रानी चेन्नम्मा आदि।

ज्ञान के क्षेत्र में भी सनातनी नारियां पुरुषों से कभी कम नही रही। द्वैतवाद और अद्वैतवाद को लेकर आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्रा के बीच प्राचीन समय में एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था। शास्त्रार्थ के लिए एक मध्यस्थ व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो हारने और जीतने वाले का निर्धारण करता है। दोनों ही उस समय के प्रकांड विद्वान थे,उन जैसा दूसरा कोई भी नहीं था संपूर्ण भारतवर्ष में। अब यह प्रश्न खड़ा हो गया कि उनके समकक्ष विद्वान कौन हो सकता था? जिसे कम से कम इस विषय पर दोनों के बराबर ज्ञान हो। आश्चर्य की बात यह है कि वह कोई विद्वान नहीं एक विदुषी स्त्री थी, मंडन मिश्रा की धर्मपत्नी – उभया भारती।

जब मंडन मिश्रा शास्त्रार्थ में हार जाते हैं तब शास्त्रों की प्रकांड ज्ञाता उभया भारती मध्यस्था का पद छोड़कर पत्नी धर्म के लिए खड़ी हो जाती हैं और शंकराचार्य से कहती है- ” जैसा कि आप जानते हैं, पवित्र शास्त्रों के अनुसार पत्नी पति की अर्धांगिनी होती है अर्थात पति का आधा शरीर पत्नी होती है इसलिए मेरे पति को हराकर आपने उन पर अभी आधी ही विजय पाई है। आप की विजय तभी पूर्ण होगी जब आप मेरे साथ शास्त्रार्थ करके मुझे भी हरा देंगे”। कितना पांडित्यपूर्ण और तार्किक दृष्टिकोण था यह? क्या यह सब बिना विद्या ग्रहण के सम्भव हो सकता था? गार्गी, मैत्रेयी जैसी अनेको विदुषी स्त्रियां सनातन धर्म मे हुई है।

सनातन में विकृतिकरण 

हम क्या थे? क्या हो गए है अभी? आइये बैठकर विचार करे सभी। अब प्रश्न यह उठता है कि सनातन हिंदू समाज जो कभी स्त्रियों को इतना सम्मान और अधिकार देता था, सदैव पुरुषों से ऊपर रखता था वह आज की स्थिति में कैसे पहुंच गए?  इसका पहला कारण है कुछ सनातनी का अधर्मी हो जान कुछ लोगों ने स्वार्थ वर्ष अपने मन से कपोल कल्पित श्लोक गढ़ लिए जैसे- 

“स्त्रिशूद्रो नाधीयातामिति श्रुते:। – अर्थात स्त्री और शूद्र न पढ़े, यह श्रुति है।” इस तरह के झूठे श्लोकों का प्रचार प्रसार किया गया जबकि यह श्लोक किसी भी प्रामाणिक ग्रन्थ का नही है। इसका परिणाम यह हुआ कि स्त्री शिक्षा में भारी कमी आई। इस विषय पर वेद क्या कहते है- देखिए यजुर्वेद के छब्बीसवे अध्याय का दूसरा मन्त्र-

यथेमां वाचं कल्याणिमावदानि जनेभ्य: – परमेश्वर कहते है कि इस कल्याणकारी चारो वेदों की वाणी का उपदेश सब मनुष्यों के लिए है।” यहाँ ईश्वर ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ,शुद्र, स्त्री में कोई भेद नही किया है। सभी के लिए शिक्षा अनिवार्य है। अथर्ववेद का मंत्र-

ब्रह्माचर्य्येणः कन्या युवानम विन्दते पतिम। – कन्या ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदादि शास्त्रो को पढ़ पूर्ण विद्या और उत्तम शिक्षा प्राप्त करके ही पति को ग्रहण करे।” स्त्री शिक्षा का प्रावधान वेदों के समय से सदैव ही सनातन संस्कृति में रहा है।

दूसरा और मुख्य कारण है- इस्लामिक आक्रमण और राज।  दुर्भाग्य से, 11 वीं शताब्दी से ही भारत वर्ष की इस पवित्र भूमि पर इस्लामिक आक्रांताओ ने विध्वंस करना शुरू कर दिया। यह एक ऐसी कबीलाई विचारधारा को मानने वाले लोग थे जहां पर औरतों को खेती कहा जाता है, इस्लाम से इतर दूसरे धर्मों की स्त्रियों को माल ए गनीमत अर्थात युद्ध में लूटा हुआ माल माना जाता है और दूसरे धर्मों की स्त्रियों, बच्चों आदि को दास की तरह बाजार में बेचना एक पवित्र काम माना जाता है।  इस्लामिक शासन के समय में हिंदू स्त्रियों पर घोर अमानवीय और अकल्पनीय अत्याचार आरंभ हो गए। हिंदू बालिका और स्त्रियों को जबरदस्ती उठाकर, धर्म परिवर्तन, बलात्कार होने लगे। उन्हें दास बनाकर बाजारों में बेचा जाने लगा। इस्लामिक शासक उन्हें अपने हरम में रखने लगे। कुछ कृत्य तो इतने घिनौने थे कि उन्हें लिखते समय लेखनी भी काँप उठे! इन विभत्स अत्याचारों से बचने के लिए और अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए सनातन संस्कृति ने अपने भीतर कुछ विकृतियों को अपना लिया। जिसमें बाल विवाह और पर्दा प्रथा मुख्य है, जबकि इनका उल्लेख सनातन धर्मशास्त्रो में कहीं नही है। इन दोनों रूढ़ीवादी प्रथाओं का मुख्य उद्देश्य हिंदू स्त्रियों को कुछ स्तर तक इन अत्याचारों से बचाना ही था। एक अन्य प्रथा -जौहर का मूल कारण भी इस्लामिक आक्रमण ही है- हिन्दू राजाओं के हारने के बाद होने वाले दानवीय अत्याचारों से अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए उस राज्य की कई कई हज़ार हिन्दू स्त्रियां सामुहिक रूप से अग्नि में कुंड बनाकर कूद जाती थी। क्योंकि इस्लामिक सेना जो राक्षसी अत्याचार उन पर करती उससे उन्होंने अग्नि में जीवित भस्म होना अधिक सुखदायक लगा। आज उन अत्याचारों की कल्पना भी नही की जा सकती। स्वतन्त्रता के सत्तर वर्षो के बाद भी बाल विवाह और पर्दा प्रथा भारत के कुछ क्षेत्रों में आज भी विद्दमान है। जिन्हें अविलम्भ समाप्त करने की आवश्यकता है।

प्राचीन ही आधुनिकतम नवीन है

विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता और संस्कृति होने के नाते हमें किसी से फेमिनिज्म सीखने की आवश्यकता नहीं क्योंकि हम तो आदिकाल से ही शक्ति के उपासक रहे हैं। अब यह निर्णय तो स्त्रियों को ही लेना है कि उनको वेस्टर्न फेमिनिज्म वाला पुरुष के बराबर का अधिकार चाहिए या फिर अपना सनातन का पुरातन ईश्वर प्रदत्त पुरुष से भी ऊंचा स्थान पुनः प्राप्त करे। अब समय है कि भारतीय नारी शिक्षा के क्षेत्र में उभया भारती, गार्गी, मैत्रेयी बने, युद्ध कौशल में रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती बने, समाज से दुष्टों का संहार करने के लिए महिषासुर-मर्दिनी बने और जब उनकी अस्मिता पर कोई राक्षस आक्रमण करे तो वह किरणमयी राठौर बन जाये। वही किरणमयी राठौर जिसने मीना बाजार में अकबर द्वारा बलात्कार का प्रयास करने पर अकबर को जमीन पर पटक कर दे मारा था और उसकी गर्दन को अपनी कटार की धार पर ले लिया था। अंत मे बहुत क्षमा याचना करने पर ही उस दुष्ट को जीवनदान दिया था।  आवश्यकता है,सनातन में नारी की खोई हुई गरिमा को पुनः स्थापित करें, पाताल लोक तक फैली अपनी जड़ों को ढूंढे क्योंकि प्राचीन ही सनातन का आधुनिकतम नवीन है।

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