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रेप और अश्लील वीडियो

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रेप और अश्लील वीडियो

पता नहीं आखिर कब तक हम अखबारों के पन्नों पर दरिंदगीं की दास्ता पढ़ते रहेंगें। दिल्ली की 13 वर्षीय लड़की के साथ हुयी हैवानीयत ने निर्भया रेप केस की याद को ताजा करने के साथ उसके आरोपियों को सजा मिलने में हुआ विलंब और निर्भया के माता पिता के संघर्ष को भी रेखांकित किया हैं। जब देश के कोने- कोने से व्यापक आवाज़ उठने के बावजूद हमारी न्यायिक व्यवस्था को सजा देने में 8 वर्ष का वक्त लग गया तो इस घटना के बारे में क्या बोला जा सकता हैं।

किसी के मर्जी के खिलाफ उससे जबर्दस्ती शारीरिक संबंध बनाना ही रेप या बलात्कार कहलाता है। लेकिन क्या ये सच में ऐसा गुनाह है जिसे रोक पाना नामुमकिन हैं? तभी तो जैसे -जैसे देश आगे बढ़ रहा है वैसे -वैसे महिलाओं के साथ शोषण और उन पर अत्याचार के खबरें भी बढ़ रहीं हैं। ज्यादातर मामलों में पाया गया हैं की बलात्कारी का अपने उपर नियंत्रण खो जाता हैं जिससे उसे आभास ही नहीं होता है कि वो क्या करने जा रहा हैं। लेकिन ऐसा क्यों होता हैं? दरअसल इनमें से ज्यादा लोगों को अशलील चीज़ें देखने की आदत ही नहीं बल्कि लत भी होती हैं। कुछ महीनें पहले हैदराबाद की महिला पशु डॉक्टर के साथ हुयी दरिंदगीं के आरोपियों के मोबाइल फ़ोन से भी इसकी पुष्टि होती हैं जिसमें अश्लील वीडियो का भरमार मिला था। चिंतनिय बात ये हैं की सरकार इस बात से अवगत हैं की बलात्कार के कारणों में ये भी एक प्रमुख कारण हैं परंतु कहने को तो ये सब इंटरनेट पर प्रतिबंधित है पर इस तक पहुँच इतनी आसान की एक बच्चा भी इसके दुष्प्रभाव से अछुता नहीं रह सकता, इसे किसी भी सोशल मीडिया साइट से प्राप्त किया जा सकता हैं। बॉलीवुड का भी इसमे कम रोल नहीं हैं, फ़िल्मों में लड़कियों को माल, पटाका, फुलझड़ी जैसे नाम से संबोधित करने का चलन यहाँ काफी पुराना हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि दरिन्दों के दिमाग में ये बात डालने कि महिलाएँ मात्र उपभोग की वस्तु हैं,बॉलीवुड की भुमिका भरपूर हैं।

बलात्कार जैसे हैवनीयत कृत्य को रोकने के लियें जरुर हैं हमारी शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक ग्रन्थों को अनिवार्य विषय बनाना। लेकिन दुर्भाग्यवश आज मॉरल वेल्यू की किताब ने रामायाण, गीता की जगह ले ली हैं। हालात ऐसे हैं कि यदि कोई गलती से भी ये कह दे कि स्कूली पाठ्यक्रम में इन ग्रन्थों को शामिल किया जाए तो चारों ओर से सब राजनीति चमकाने में लग जायेंगे लेकिन इससे वो दूसरों का ही नहीं बल्कि अपना की बुरा कर रहें है क्योंकि बलात्कार की शिकार हुयी मासूम में कभी उनके प्रिय का भी नाम आ सकता हैं। ऐसे में सरकार के लीए बस ये प्रयाप्त नहीं हैं कि वो कठोर कानून बना कर अपने दायित्वों की पूर्ति कर लें, जरुर है कि वो लोगों के मानसिकता में परिवर्तन लाने के लिए कदम उठाये।

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