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कानून सजग नागरिकों के प्रति उत्तदाई होता है

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कानून सजग नागरिकों के प्रति उत्तदाई होता है

यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि भारत में हिन्दुओं को पता ही नहीं है कि उनके ऊपर कौन-कौन से कानून लागू हैं एवं उनके संवैधानिक अधिकार क्या-क्या हैं। जब नियमों और अधिकारों का ज्ञान ही नहीं होगा तो होने वाले अन्यायों के विरुद्ध आवाज कैसे उठाऐंगे। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि अपने अपने अधिकारों को जानें और अपने प्रति हो रहे भेदभावों एवं अन्यायों को समाप्त करने की कानूनी प्रक्रिया क्या है, उसे समझें।

उदाहरण के लिए –

  1. गौहत्या पर निषेध, हिन्दुओं का एक संवैधानिक अधिकार है। अनुच्छेद 48 द्वारा गौहत्या को निषेध करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार को प्रदान की गई है, इस कानून को अखिल भारतीय स्तर पर भी लागू किया जा सकता है। 
  2. अनुच्छेद 28 द्वारा सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में हिन्दू धर्म की शिक्षा देना निषेध है। यह एक अन्यायपूर्ण प्रावधान है, क्योंकि अनुच्छेद 30 द्वारा शेष सभी धर्मों को अपने धर्म की शिक्षा देने का अधिकार प्राप्त है।
  3. यदि कोई हिन्दू धर्म पर अपमानजनक एवं अभद्र टिप्पणी करता है, तो उसके विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता(IPC) की धारा 295A के तहत, धार्मिक भावनाऐं आहत करने के अपराध में रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है। सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों पर भी कार्रवाई संभव है।

शांत बैठकर अन्यायों को सहते रहना और यह आशा करना कि सब ठीक हो जाएगा, यह ग़लत सोच है। अपने अधिकारों से किसी प्रकार का समझौता करना बहुत बड़ी मूर्खता है। किसी को न्याय तब ही मिलेगा जब वह न्याय की मांग करेगा। यह आशा करना कि ईश्वर सब ठीक कर देंगे या कोई नेता या सामान्य व्यक्ति हमारे लिए आकर सब कुछ ठीक कर देगा, बड़ी भूल है। बिना मांग किए न्याय नहीं मिलेगा और यह हमें स्वयं करना है।

हर बात के लिए कोर्ट पर निर्भर रहना ही पर्याप्त नहीं है, यह भी आवश्यक है कि लोगों में भेदभावों और अन्यायों के विरुद्ध लड़ने की जनभावना जागृत हो। अधिक संख्या में अपील करने से पुलिस प्रशासन पर दबाव पड़ता है और वे जल्दी सुनते हैं, इससे यह उम्मीद बढ़ती है कि हिन्दुओं की आवाज कहीं खो नहीं जाएगी।

हिन्दू समाज में लोगों को भूल जाने की बड़ी गंदी आदत है। कोई बड़ी घटना होती है, सब सोशल मीडिया पर अपना अपना गुस्सा दिखाते हैं। कोई सरकार को गालियां देता कोई किसी और को, और कोई ज्ञान की बातें करता है। लेकिन थोड़े ही दिनों में सब भूल जाते हैं। “समस्या यहाँ है”। लोगों को कोई घटना इतने अन्दर तक नहीं कछोटती कि वे स्वयं कुछ करें और समाधान खोजें। एक ओर तो लोग मुसीबत के समय सरकार को कोसते हैं दूसरी ओर उसी से उम्मीद लगा कर बैठते हैं।

कई समस्याऐं ऐसी हैं जिनकी मांग व्यापक स्तर पर जबतक नहीं उठेगी, तब तक कोई ध्यान नहीं देगा। अन्य संप्रदायों के साथ होने वाली असामान्य घटनाऐं तो न्यूज़ में हैडलाइन बनती हैं किन्तु हिन्दुओं के मामले में ऐसा नहीं होता है। यह एक वैचारिक युद्ध है जहां हमें स्वयं ही अपना पक्ष रखना है। 

उदाहरण के लिए –

  1. मंदिरों की आय पर राज्य सरकारों द्वारा टैक्स लगता है। मंदिर के ट्रस्ट में सरकार द्वारा नियुक्त आदमी बैठता है और आर्थिक निर्णय वही लेता है। जबकि अन्य धर्मों के स्थलों पर ना ही सरकारी नियंत्रण है और ना ही उनपर टैक्स लगता है। मंदिरों की आय का बहुत बड़ा हिस्सा सरकार अपने मतलब से खर्च करती है, वह पैसा मन्दिर से संबंधित कार्यों पर खर्च नहीं होता है।
  2. ईसाई मिशनरी भारत भर में समाज सेवा के नाम पर लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। वे मुफ्त शिक्षा, चिकित्सा, आर्थिक सहायता आदि के मायाजाल में फँसाकर लोगों की दयनीय दशा का लाभ लेकर उनका धर्म परिवर्तन करते हैं। 
  3. मुस्लिमों के लिए सरकार की ओर से हज सब्सिडी दी जाती है किन्तु हिन्दुओं के लिए कोई ऐसी योजना नहीं है, जैसे कि चारधाम यात्रा के लिए कोई योजना, नहीं है।

एक ओर तो मंदिर सरकारी गिरफ्त में हैं और दूसरी ओर ईसाई मिशनरी धर्म परिवर्तन कराके समाज में फूट डालने के कार्य कर रहे हैं। उनका दावा होता है कि दलितों और पिछड़ों को बेहतर जीवन देने के लिए उन्हें ईसाई बनाया का रहा है किन्तु इस दावे में बहुत ही कम सच्चाई है।

यदि मंदिर स्वतंत्र होंगे तो उनकी आय का प्रयोग अस्पतालों, विद्यालयों की स्थापना में, और प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता देने में किया जा सकेगा, जिससे कि धर्म परिवर्तन द्वारा भारतीय संस्कृति के नाश को रोका जा सकेगा।

मंदिरों को स्वतंत्र कराना, गौहत्या पर रोक लगवाना, विद्यालयों में हिन्दू धर्म की शिक्षा को आरंभ कराना, सरकारी योजनाओं में हिन्दुओं के प्रति भेदभाव को समाप्त कराना, अभद्र टिप्पणियों की रिपोर्ट करना इत्यादि अनेकों समस्याएं विद्यमान हैं। इन समस्यायों से छुटकारा पाने लिए यह बहुत आवश्यक है कि हिन्दुओं को इनकी समाप्ति के उपाय एवं उनकी कानूनी प्रक्रिया का ज्ञान हो।

यह हिन्दू समाज के साझा प्रयासों से ही संभव है।

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