Thursday, December 3, 2020
Home Hindi चाइना कैसे बना विनिर्माण का केंद्र भाग 2

चाइना कैसे बना विनिर्माण का केंद्र भाग 2

Also Read

वर्ष 2019 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 56.77 अरब डॉलर रहा. यह 2018 में 58.04 अरब डॉलर था.

ऐसा क्यों है की भारत चाइना को को निर्यात कम करता है और आयत ज्यादा, इसका सबसे बड़ा कारण है हम लोगों को गुलामी की ऐसी आदत पड गई है और वामपंथी इतिहासकारों के हमारे दिमाग में ऐसा गलत भावना डाल दिया है की हमको लगता है की दुनिया में सारी अच्छी वस्तु विदेशी ही बनाते हैं। लोगों को लगता है की अगर वे made in UK, made in US, made in China वाले वस्तु खरीदेंगे तभी समाज में उनको उच्च श्रेणी और विकसित समझा जायेगा। जब से लोगों ने गुड़ छोड़ कर विदेशी के देखा देखी चीनी खाना शुरु किया तब से मधुमय की बीमारी ज्यादा होने लगी।

वामपंथी ने ऐसा कुचक्र रचा की भारत में अधिकांश बड़े बड़े फैक्ट्री बंद हो गए, कुटीर उद्योग बंद हो गए  उदहारण के लिए कानपुर जो की पहले “कपड़ा मिल” के लिए विश्व प्रसिद्ध थीं । कानपुर को “ईस्ट का मेंचेस्टर” बोला जाता था। कानपुर की फैक्ट्री के महीन सूती कपड़े प्रेस्टीज सिम्बल होते थे। वहाँ सब कुछ था जो एक औद्योगिक शहर में होना चाहिए। मिल का साइरन बजते ही हजारों मज़दूर साइिकल पर सवार टिफ़िन लेकर फैक्ट्री की ड्रेस में मिल जाते थे। बच्चे स्कूल जाते थे। और इन लाखों मज़दूरों के साथ ही लाखों सैल्स्मैन, मैनेजर, क्लर्क सबकी रोज़ी रोटी चल रही थी। फिर “कम्युनिस्ट” की निगाह कानपुर पर पड़ीं.. तभी से….बेड़ा गक हो गया। “आठ घंटे मेहनत मज़दूर करे और गाड़ी से चले मालिक।” कम्युनिस्टनों ने यह नारा दिया। ढेरों हिंसक घटनाएँ हुईं, मिल मालिक को दौड़ा दौड़ा कर मारा पीटा भी गया। नया नारा दिया गया “काम के घंटे चार करो, बेकारी को दूर करो” अलाली कीसे अच्छी नहीं लगती है. ढेरों मिडिल क्लास भी कम्युनिस्ट समर्थक हो गया। “मज़दूरों को आराम मिलना चाहिए, ये लोग खून चूसते हैं।”

अंततः वह दिन आ ही गया जब कानपुर के मिल मज़दूरों को मेहनत करने से छुट्टी मिल गई। मिलों पर ताला डाल दिया गया। मिल मालिकों को कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा क्यूंकि वे अपना फैक्ट्री दुसरे राज्यों में ले गए लेकिन कानपुर की मिल बंद होकर ज़मीन जंगल हो गए। जो मजदुर 8 घंटे यूनिफार्म में  काम करने जाते थे अब वो 12 घंटे रिक्शा चलाने और दिहाड़ी मजदूरी करने पर विवश हो गए। कम्युनिस्टनों के शासनकाल में बंगाल पूरी तरह बर्बाद हो गया। बंगाल की तमाम कारखानों में यूनियन बाजी कामचोरी स्ट्राइक आम बात हो गई। मिल मलिकों के साथ गाली-गलौज मारपीट आए दिन होने लगे।बंगाल में कम्युनिस्टनों ने नारा दिया गया “दिते होबे, दिते होबे, चोलबे ना, चोलबे ना” नतीजा यह हुआ सभी कम्पनी में ताले लटक गए। अधिकांश कम्पनी अपने व्यवसाय को बंगाल से हटाकर दुसरे राज्यों में ले गए और यहीं के लोग उसी राज्यों में जा के मजदूरी करतें हैं। कंपनी में काम करने वाले मजदूरों के स्कूल जाने वाले बच्चे अब कबाड़ बीनने लगे।

बात चाहे 1962 के भारत और चीन के बीच युद्ध की हो जिसमें वामपंथियों ने चीन का साथ दिया और भारत के साथ गद्दारी की। 1962 में चीन से हुई लड़ाई में तब के वामपंथियों के नेता खुलकर चीन साथ खड़े हो गए थे। उनका कहना था की ये दो देशों का नहीं, बल्कि वामपंथि चीन और पूंजीवादी भारत के बीच ताकत का संघर्ष है। तब के वामपंथी नेता बीटी रणिदवे, पी सुंदरैया, पीसी जोशी, बास बसु और हरिकशन सिंह सुरजीत खुलेआम चीन का समर्थन कर रहे थे। वो कहते थे की चीन की लाल सेना भारत में आकर हम आजाद कराएगी। भारत – चीन युद्ध के समय जब एक तरफ सेना बॉडर पर चीन की सेना से मोर्चा ले रही थी, उसी वक्त देश के अंदर बगावत की पूरी तैयारी कर ली गई थी । यहाँ तक की ये वामपंथी तो भारतीय सेना के लिए जमा किये जाने वाले खून के लिए भी विरोध  कर रहे थे।

आज ये चाइना के टुकड़ों पे पलने वाले वामपंथी की लॉबी इतना घातक हो गया है की कोई भी सरकारी फैक्ट्री  जो विनिर्माण  का कार्य करती है उसमे ये बंदी, हड़ताल करवा के सभी को फैक्ट्री को पंगु कर देते हैं, यही भारत में निजी फैक्ट्री के साथ भी होता है। 

उसके बाद वामपंथियों ने ग़रीब किसानों, आदिवासिओं, दलितों, मजदूरों को पूँजीवाद के नाम पर भड़का कर नक्सली बनाया, आज नक्सलवाद के नाम पर हजारों सैनिकों और आदिवासिओं के ख़ून का जिम्मेदार वामपंथ ही है। इन आदिवासिओं को हथियार दे कर सरकार के खिलाफ और जहाँ विकास कार्य हो रहा हो वहाँ भेज देते हैं ताकि ये गरीब आदिवासी सिर्फ नक्सलवाद में लगे रहे और विकास उन तक न पहुँचके और वे जिंदगी भर वामपंथियों के गुलाम रहे, हाल के ही दिनों में झारख में जहाँ पूर्व भाजपा सरकार में नक्सली के आतंक में कमी आई थी, और विकास कार्य भी हुआ था लेकिन ये वामपंथियों की लॉबी और चर्च ने ऐसा छद्म फैलाया की भाजपा आदिवासिओं के अपना समर्थन खो दिया और अंत में विधानसभा भी हर गया अब कांग्रेस, झामुमो की मिश्रित सरकार ने नक्सलिओं को आज़ादी दे दी है, हाल में ही लोहरदगा जिले पाखर गाँव में  हिंडाल्को कंपनी की बाक्साईट माइंस में भाकपा माओवादी संगठन के नक्सलीओं ने दर्जनभर वाहनों को फूंक डाला। पाखर माइंस में बीकेबी और बालाजी कंपनी के 9 पोकलेन और 4 केशर वाहन को भाकपा माओवादी के हथियार बंद नक्सलीओं द्वारा आग लगा दी गई। इस घटना से कंपनी को लगभग 8 करोड़ रूपये की क्षति का अनुमान लगाया जा रहा है। खूंटी में “पत्थरगडी” का विरोध करने पर आदिवासिओं को मार दिया गया, अब झारखण्ड में पहले की तरह आम है।

ऐसे म कोई भी निजी क्षेत्र के लोग भारत से निकल के बाहर जाना पड़ता है, और ऐसे में चाइना सभी को आकर्षित कर लेता है कुल मिला के ये वामपंथी यहाँ भारत में कोई काम नही होने देते हैं, आपने सुना है कभी की चाइना का कं पनी जो भारत में काम कर रहा है उसमें कभी मजदूरों का हड़ताल हुआ हो या बंदी हुआ हो या नक्सली ने उन्हें  परेशान किया हो, ये चाइना के पाले हुए है तो चाइना के कंपनी के खलाफ कैसे जायेंगे।

भारत म अभी इलेक्ट्रिक मशीनरी, ध्वनि उपकरण, टेलीविजन उपकरण परमाणु रिएक्टर, बॉयलर, मशीनरी और मैकेनिकल उपकरण और पाट्स जैविक रसायन, प्लास्टिक लौह और इस्पात के 100 से अिधक चीनी कंपनी के भारत में कार्यालय/संचालन स्थापित हैं। इनमें Sinosteel, Shougang International, Baoshan Iron & Steel Ltd, Sany Heavy Industry Ltd, Chongqing Lifan Industry Ltd, China Dongfang International, Sino Hydro Corporation, आदि कई चीनी इलेक्ट्रॉनिक, आईटी और हाडवेयर निर्माण कम्पनी भी भारत में अपना परिचालन कर रही है। इसमें हुआवेई टेक्नोलोजी, जेडटीई, टीसीएल, हायर आिद शामिल हैं। बड़ी संख्या में चीनी कम्पनी बिजली क्षेत्र में  ईपीसी परयोजनाओं म शामिल हैं । इनम शंघाई इलेक्ट्रॉनिक , हार्बिन इलेक्ट्रॉनिक, डोंगफैग इलेक्ट्रॉनिक, शेनयांग इलेक्ट्रॉनिक आदि शामिल हैं। हाल के वर्ष में, चीनी मोबाइल कंपनी ने भारत में उल्लेखनीय वृद्धि की  है। Xiaomi, भारत में सबसे बड़ी मोबाइल हैंडसेट बेचने वाली कंपनी बन गई। आज, चीनी मोबाइल हैंडसेट कम्पनी Xiaomi, Vivo और Oppo, Realme भारतीय मोबाइल हैंडसेट बाजार का लगभग 50% हिस्सा है। 

क्या भारत के कंपनी में क्षमता नहीं है? क्षमता तो है लेकिन भारत में अगर कुछ अच्छा  होगा तो तुरंत विरोध करना शुरू हो जाता है अब ये आदत बन गया है बस विरोध करो और फिर चिल्लाओ की भारत की कंपनी में क्षमता है ही नहीं। चाइना में अगर कोई बाहर की कम्पनी निर्यात करना चाहती है तो उसे काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है क्यूंकि चाइना के लोगों के दिमाग में पहले से भरा हुआ होता है की चाइना में जो बन रहा है उसी का उपयोग करना है उन्हें #BYCOTTchina जैसे काम नही करने पड़ते कुछ भी हो बाहरी वस्तु का उपयोग ना के बराबर करतें है और भारत में आज़ादी के पहले से लोगों को समझया जा रहा है की स्वदेशी अपनाओ लेकिन अभी तक समझ में नहीं आया है।    

क्षमता की बात की जाये तो उदहारण के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपने नए अधिकरण किये गए  गए वस्त्रों और परिधानों के निर्माता आलोक इंडस्ट्रीज को एक पीपीई निर्माता  के रुप में परिवर्तित कर दिया है, जिससे चीन से आयात होने वाले एक-तिहाई की लागत पर COVID-19 सुरक्षात्मक गियर का उत्पादन करने म मदद मिली है। कंपनी ने सिलवासा, गुजरात में आलोक इंडस्ट्रीज की विनिर्माण सुविधाओं को विशेष रुप से निजी सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) के लिए सुरक्षित कर दिया है, ताकी COVID-19 महामारी से लड़ने में लगे डॉक्टरों, नर्सों, मेडिकल स्टाफ और अन्य फ्रंटलाइन कर्मचारिओं  की सुरक्षा  हो सके लेकिन ऐसे कार्यों की तारीफ करने के बजाये वामपंथी के कुचक्र में फंस कर इसका विरोध करने लागतें हैं।

 भारत अब प्रतिदिन 4.5 लाख से अधिक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) का उत्पादन कर रहा है और अब देश में 600 से अधिक कंपनियां पीपीई के निर्माण के लिए प्रमाणित हैं। कोरोनावायरस के प्रकोप के दो महीने के भीतर जहाँ भारत PPE चाइना से आयात कर रहा था अब यह विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है  इससे पहले सभी पीपीई किट आयात किए जा रहे थे।

वामपंथी को ये सब पचता नहीं की कैसे भारत की कंपनी चाइना को पीछे छोड़ दे रही है ये तुरंत खड़ा हो जायगे और फेक न्यूज़ और अपने टुकड़े टुकड़े गैंग के साथ हो कर भारत के उद्योगपतिओं के खिलाफ विरोध करने लगगे ताकि भारत के लोगों में  रोजगार की चेतना ना आ सके क्यूंकि अगर ऐसा होगा तो, गरीबों, आदिवासिओं  तक पैसा जाने लगेगा और इनकी जो छद्म  है वो टुट जायेगा। ये गरीब और आदिवासी इनसे सवाल करने लगेंगे इसिलए ये जानबूझ कर ऐसा माहौल बना के रखते हैं  ताकि कोई भी या उद्यम शुरु ना करे, और अगर करे तो चाइना के साथ करे और चाइना ही भारत में करे ये एक प्रयास है ताकि चाइना के वामपंथी सरकार द्वारा भारत को गुलाम बनाया जा सके जैसा प्रयास ये 1962 में कर चुक हैं।

सिर्फ चाइना का विरोध नहीं अपितु ऐसे वामपंथियो का भी विरोध करना पड़ेगा इनके संगठनों, इनसे जुड़े लोगों सभी का विरोध करना जरुरी है नहीं तों ये भारत में ऐसा माहौल बना देंगे की कोई भी उद्यम यहाँ न लगे और लग भी तो सिर्फ  चाइना का ही लगे।

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

Latest News

प्राण व दैहिक स्वतंत्रता अनुच्छेद 21

हमारे सनातन धर्म की मूल भावना "जीयो और जीने दो" तथा "सभी जीवो को अपना जीवन अपनी ईच्छा से जीने का अधिकार है" में निहित है मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने भी अपने संपूर्ण जीवन काल मे प्रत्येक जीव के प्राण व दैहिक स्वतंत्रता को अमुल्य व सर्वोपरि मानकर प्रतिष्ठित किया

2020: An unprecedented, unpredictable, and uncertain year

Who could have imagined that the “unique 2020” would ironically turn into the most "unprecedented, unpredictable, and uncertain 2020" of historic proportions, perhaps not even worth remembering and writing about?

Mr. Ahmad Patel, they missed you!

Through the obituaries and condolences written by MSM journalists, one can easily see as to why these power brokers who used to enjoy the access to power corridors are so unnerved as they miss the absence of jugglers and conjurers in current regime.

गुपकार गैंग द्वारा रोशनी एक्ट की आड़ में किया गया 25000 करोड़ रुपए का घोटाला!

व्यवस्था का लाभ उठाकर 2001 से 2007 के बीच गुपकार गैंग वालों ने मिलकर जम्मू-कश्मीर को जहाँ से मौका मिला वहाँ से लूटा, खसोटा, बेचा व नीलाम किया और बेचारी जनता मायूसी के अंधकार में मूकदर्शक बनी देखती रही।

Death of the farmer vote bank

While in the case of a farmer the reform delivered double benefit but the political class faces double whammy, that of losing its captive vote bank that was dependent on its sops and secondly losing the massive income they earned as middlemen between the farmer and the consumer. Either the farmer is misinformed or wrongly instigated, otherwise it is impossible to conceive that any farmer should be actually unhappy or opposed for being given more choices, as to whom to sell their produce.

Teachers assign essays with a 280 character limit

This a satire news article, which 'reports' that the government has added 280 character essays to the educational curriculum in an attempt to train students to use Twitter in the future. Note: I have chosen an image of a school from your media library and added the twitter logo on top of it.

Recently Popular

गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

एक सफल शासन की नींव समुद्रगप्त ने अपने शासनकाल में ही रख दी थी इसीलिए गुप्त सम्राटों का शासन अत्यधिक सफल रहा। साम्राज्य की दृढ़ता शांति और नागरिकों की उन्नति इसके प्रमाण थे।

सामाजिक भेदभाव: कारण और निवारण

भारत में व्याप्त सामाजिक असामानता केवल एक वर्ग विशेष के साथ जिसे कि दलित कहा जाता है के साथ ही व्यापक रूप से प्रभावी है परंतु आर्थिक असमानता को केवल दलितों में ही व्याप्त नहीं माना जा सकता।

वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के मध्य अंतर और हमारे इतिहास के साथ किया गया खिलवाड़

वास्तव में सनातन में जिस वर्ण व्यवस्था की परिकल्पना की गई उसी वर्ण व्यवस्था को छिन्न भिन्न करके समाज में जाति व्यवस्था को स्थापित कर दिया गया। समस्या यह है कि आज वर्ण और जाति को एक समान माना जाता है जिससे समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।

Pt Deen Dayal Upadhyaya and Integral Humanism

According to Upadhyaya, the primary concern in India must be to develop an indigenous economic model that puts the human being at centre stage.

Daredevil of Indian Army: Para SF Major Mohit Sharma’s who became Iftikaar Bhatt to kill terrorists

Such brave souls of Bharat Mata who knows every minute of their life may become the last minute.