Friday, September 22, 2023
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6 सालों में ही केजरीवाल का राजनीतिक पतन और राष्ट्रीय राजनीति का अंत

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भारत आंदोलनों का देश रहा है और भारत की बागडोर हमेशा से ही आंदोलनों से निकले लोग ही करते आए हैं। पिछले 72 सालों में हमने देखा है कि कैसे विभिन्न आंदोलनों ने देश को कई अच्छे नेता दिये। भारत के स्वतंत्रता संग्राम से निकले भारत के राष्ट्रपिता गांधी हों या फिर नेहरू और सरदार पटेल हों। आपातकाल और इंदिरा गांधी के विरोध में हुई जेपी आंदोलन से निकले लालू- नीतीश या मुलायम और चरण सिंह-चंद्रशेखर हों। हिन्दी विरोध और द्रविड़ आंदोलन से निकले पेरियार, करूणानीधि- अन्नादुरई हों। राम मंदिर आंदोलन से राष्ट्रीय नेता की छवि पाने वाले अटल-आडवानी की जोड़ी हो या फिर 2011 के लोकपाल आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल-किरण बेदी या कुमार विश्वास हों। हर आंदोलन ने देश को कोई ना कोई नेता अवश्य दिया है जिसने आगे चलकर देश की बागडोर किसी ना किसी स्तर पर अवश्य संभाली है। हाँ, इन आंदोलनो से निकले नेता कितने सफल हुए यह अलग बहस का विषय है। लेकिन आज बात दिल्ली की तीसरी बार कमान संभाल रहे और आम आदमी पार्टी सुप्रीमों अरविंद केजरीवाल की।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 07 जून को एक तुगलकी फैसला लिया और आदेश दिया कि दिल्ली सरकार के मातहत अस्पतालों में सिर्फ दिल्ली वालों का ही इलाज होगा। इन अस्पतालों में इलाज करवाने के लिए आने वाले मरीजों को दिल्ली के निवासी होने का प्रमाण देना होगा। हालांकि, दिल्ली के राज्यपाल अनिल बैजल ने अपने शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस फैसले को पलट दिया है और अस्पतालों को आदेश दिया है कि किसी को भी इलाज से मना ना किया जाए। इस घटना कि चौतरफा आलोचना हुई लेकिन केजरीवाल सरकार को इससे फर्क नहीं पड़ेगा। केजरीवाल सरकार के इस अमानवीय और खतरनाक राजनीतिक फैसले ने कइयों को चौंकाया। विशेषज्ञ अपने-अपने तरीके से इस फैसले को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार दिल्ली में करीब 38% इंटर स्टेट माइग्रेंट पॉपुलेशन रहती है। इनमे ज्यादार बिहार और यूपी की जनता रहती है। ये लोग या तो स्थाई तौर पर दिल्ली में बस गए हैं या फिर रोजगार के सिलसिले में दिल्ली में रह रहे हैं और इनका परिवार अब भी इनके मूल राज्य में ही है। इनके अलावा दिल्ली में वो लोग सबसे ज्यादा आते हैं जिन्हें अपना या फिर अपने किसी रिश्तेदारों का इलाज करवाना होता है। यह बात हमेशा से स्पष्ट है कि बिहार में इलाज की सुविधा बहुत जर्जर है, इसलिए लाखों लोग हर हफ्ते दिल्ली आते हैं।

इस बात पर बहस हो सकती है और इसमे सच्चाई भी है कि दिल्ली की आप सरकार का स्वास्थय और शिक्षा पर जोड़ रहा है और इसी के इर्द गिर्द केजरीवाल की चुनावी राजनीति घूमती रही है। लेकिन कोरोना महामारी ने दिल्ली के अस्पतालों की बुनियादी हालत की कलई खोल दी है। लोग सवाल पूछने लगे हैं। लोगों को अस्पताल में बेड नहीं मिल रहा है, टेस्टिंग की संख्या कम कर दी गई है। हार्ट एटैक से मरने वालों की मौत को कोरोना से मौत में नहीं गिना जाएगा। बेड की कम संख्या या अन्य कोई और वजह हो सकती है केजरीवाल सरकार के गैर दिल्ली वासियों के दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में इलाज से रोकने को लेकर, लेकिन इसकी कई वजुहात और भी हैं और जिसे समझना अतिआवश्यक है।

मालूम हो कि केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव से पहले कहा था कि बिहार- यूपी के लोग 500 रूपए में आते हैं और इलाज करवा कर चले जाते है। यह कोई नई बात नहीं है.

जो लोग केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर नजर रखते आए हैं वह जानते हैं कि 2011 से ही केजरीवाल की महत्वाकाक्षां देशव्यापी नेता बनने की रही है। 2014 और 2015 में लागातार दो चुनाव भारी बहुमत से जीतने के बाद केजरीवाल की महत्वाकाक्षां को पड़ लगा। देश भर में मिल रहे सकारात्मक संकेतों और रैली मे जुट रही भीड़ ने केजरीवाल को इस बात को मानने पर मजबूर किया कि उन्हें देश भर में भी दिल्ली जैसी ही नतीजें मिल सकतीं हैं। केजरीवाल और उनके सलाहकार दावा करने लगे कि वो पंजाब, गोवा, महाराष्ट्र, और मध्य प्रदेश में ना सिर्फ कारामात करेंगे बल्कि सरकार बनाएंगे। 2013 से अब तक आम आदमी पार्टी ने 17 राज्यों में कुल 20 विधानसभा चुनाव लड़ा है। इसमें तीन चुनाव दिल्ली विधानसभा के शामिल हैं। फिलहाल आप पार्टी के दिल्ली में कुल 62, पंजाब में 20 विधायक हैं। लोकसभा में 1 और राज्यसभा में कुल 3 सांसद हैं। देश के ज्यादातर हिस्सों में आम आदमी पार्टी के ज्यादातर सीटों पर जमानत का जब्त होना केजरीवाल के लिए ना सिर्फ झटका था बल्कि उनके देशव्यापी महत्वाकाक्षां के अंत का भी परिचायक था।

साथ ही साथ केजरीवाल द्वारा गैर दिल्लीवासियों को दिल्ली के अस्पतालों में इलाज पर प्रतिबंध लगाना इस बात का भी परिचायक है कि केजरीवाल ने हार मान ली है और अपने देशव्यापी एजेंडे की तिलांजली दे दी है। वरना कोइ भी नेता इस तरह का फैसला करने की हिम्मत नहीं कर सकता है वह भी दिल्ली में। दिल्ली महज एक राज्य या किसी राज्य की राजधानी नहीं बल्कि देश की धड़कन और राष्ट्रीय राजधानी है। हर नेता इस बात को जानता है कि देश की नजर दिल्ली की तरफ रहती है। आज दिल्ली में दिल्ली के मूल निवासी को ढ़ूंढ़ना ना सिर्फ मुश्किल है बल्कि अव्यवहारिक है। भारत के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए लोगों को सरकार ने बसाया, फिर 84 के दंगो मे प्रभावित लोगों को बसाया, अवैध कोलोनियों में रह रहे लोगों को दिल्ली में कानूनी रूप से बसाया गया और दिल्ली में आज पूरे देश के लोग बहुतायात में रहते हैं। अतः दिल्ली में दिल्ली बनाम अन्य करना ना सिर्फ कठिन है बल्कि राजनीतिक आत्महत्या है वह भी किसी ऐसे पार्टी के लिए जो देशव्यापी महत्वाकांक्षा रखती हो। मसलन बीजेपी या कांग्रेस यह गलती जिंदगी में नहीं करेगी। इन दोनों पार्टियों को इस तरह के फैसलों का बुरा अंजाम देश के अन्य राज्यों में भुगतना पड़ेगा।

तो क्या यह माना जाए कि केजरीवाल ने राष्ट्रीय राजनीति का ख्वाब छोड़ दिया है? तो इसका जवाब हां है! केजरीवाल ने समय-समय पर ऐसे एकतरफे फैसले लिए जिससे ना सिर्फ आम आदमी पार्टी के मौकुफ़ को नुकसान हुआ बल्कि केजरीवाल के साथ जुड़े लाखों समर्पित कार्यकर्ताओं को भी धक्का लगा और ये लोग धीरे- धीरे खुद को केजरीवाल से दूर रखने लगे।

मसलन, केजरीवाल, जन लोकपाल आंदोलन से निकले हैं। उन्होंने अन्ना हजारे, किरण बेदी, और समाज के विभिन्न क्षेत्रों के जाने माने लोगों के चेहरों को ना सिर्फ इस्तेमाल किया बल्कि इनके कई मुद्दे जैसे लोकपाल, भ्रष्टाचार, सत्ता परिवर्तन और अन्य जन सरोकारी मुद्दे को भी हाईजैक कर लिया। अन्ना हजारे के मना करने के बावजूद केजरीवाल ना सिर्फ चुनावी राजनीति में उतरे बल्कि चुनाव में जीत के बाद के बाद उन्होंने जो पहला फैसला किया था वह था कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार बनाना। मालूम हो कि केजरीवाल की जन लोकपाल आंदोलन के वक्त से ही सारी राजनीति कांग्रेस के खिलाफ रही थी। इससे लोगों पता लग गया कि केजरीवाल नेता बनने आए हैं समाजसेवी नहीं। दूसरी बात जो उन्होंने कि वह कि जिन लोगों ने भी केजरीवाल का साथ दिया था और आम आदमी पार्टी को बनाने में कंधे से कंधे मिलाकर काम किया था उन सबको एक- एक कर पार्टी से निकाल दिया। ये लोग आप पार्टी की बुनियाद थे। योगेंन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, मयंक गांधी, प्रो. आनंद कुमार, आशीष खेतान, अजीत झा और वे सभी लोग एक- एक पार्टी से निकाल दिये गये या फिर उनहें अप्रासंगिक बना दिया गया। 2018 में जब राज्यसभा चुनाव की बात आई तो केजरीवाल ने संजय सिंह के अलावा दो गुप्ता बंधु करोड़पतियों को राज्यसभा भेजा। एक बच्चे के लिए भी यह समझना मुश्किल नहीं था कि इसके बदले किस तरह की डील हुई होगी। इसका परिणाम यह हुआ कि पत्रकार से नेता बने आशुतोष की राज्यसभा जाने की उम्मीद धुमिल हुई और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। एक बार फिर इससे केजरीवाल के मंसूबों और चतुर चाल का आभाष दुनिया को हुआ।

केजरीवाल को जिस-जिस राज्य में लोकल पार्टी नेतृत्व से विरोध के स्वर सुनाई दिए उसे उन्होंने फौरन भंग कर दिया। मसलन, 2018-19 तक दिल्ली और पंजाब के बाद आप पार्टी की महाराष्ट्र इकाई सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली इकाई थी। लेकिन उसे उन्होनें सिर्फ इस लिए भंग कर दिया क्योंकि मयंक गांधी ने केजरीवाल द्वारा योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, अजीत झा एवं अन्य को निकालने को लेकर उन्हें ना सिर्फ एक्सपोज किया था बल्कि उनके दोहरे चरित्र को भी उजागर कर दिया था।

केजरीवाल की राजनीति की बुनियाद और शुरूआत ही हुई बगैर सबूत के बड़े- बड़े नेताओं के खिलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर वोट बटोरने से। इससे उन्हें चुनावों में फायदा भी हुआ लेकिन दुःख की बात यह रही कि वो आजतक कुछ भी साबित नहीं कर पाए। केजरीवाल ने जिस- जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए उन सबसे एक-एक कर माफ़ी मांगी। इससे केजरीवाल के ईमानदार छवि को ना सिर्फ बट्टा लगा बल्कि प्रदेश ईकाईयों, समर्थकों में घोर निराशा के भाव उभर कर सामने आया। केजरीवाल ने सबसे माफी मांगकर ना सिर्फ अपने सबसे बड़े अस्त्र को ही नष्ट कर दिया बल्कि विरोधियों को यह कहने का मौका दे दिया कि केजरीवाल की तो फितरत है लोगों पर अरोप लगाना और भाग खड़ा होना।

बिक्रमजीत सिंह मजीठिया, अरूण जेटली, नीतिन गडकरी, और शीला दीक्षित जैसे हर बड़े नेता के खिलाफ केजरीवाल ने जो कागज लहराते हुए गंभीर आरोप लगाए थे बाद में खुद को मानहानि केस से बचाने के लिए लिखित में माफी मांगी।

केजरीवाल के पिछले कुछ सालों की राजनीति और फैसलों को देखें तो स्पष्ट होता है कि केजरीवाल ने खुद को दिल्ली तक सीमित रखने का फैसला कर लिया है। वरना केजरीवाल की शख्सियत रही है आरोप- प्रत्यारोप, मोदी विरोध, और फ्री आधारित राजनीति।

देखें तो केजरीवाल ने मोदी पर सीधे आरोप लगाना बंद कर दिया है और अभद्र भाषा का प्रयोग बंद कर दिया है। केजरीवाल ने मानहानि के डर से किसी पर आरोप लगाना भी बंद कर दिया है। धरना प्रदर्शन करना कम कर दिया है। पार्टी में अपने विरोधियों को खत्म कर दिया है। पैसे वालों, दागदार छवि वाले नेता और दूसरी पार्टी से आए नेताओं को टिकट देना शुरू कर दिया है। यह सब यही बताता है कि केजरीवाल भी आम नेता की तरह थे और उन्हें कभी भी सुचिता और सरोकार से कोई लेना देना नहीं था। मतलब, केजरीवाल ने येन केन प्रकारेण सत्ता में रहने का गुर सीख लिया है।

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