Tuesday, April 16, 2024
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तबलीगी जमात भारतीय संस्कृति के दुश्मन

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कोरोना महामारी देश में फैली जिसके पश्चात देश ने तबलीगी जमात के बारे में जाना कि यह जमात क्या कार्य करती है।

इस लेख में तबलीगी जमात को और गहराई से समझते हैं की यह जमात कब शुरू हुई, और क्यों शुरू हुई। जैसा कि हम जानते हैं की आजादी से पहले भारत के तथाकथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने इस्लामिक आंदोलन (खिलाफत आंदोलन)खड़ा किया। जिसका उद्देश्य इस्लामिक राज्य बनाना था, की ब्रिटिश सरकार से सत्ता लेकर भारतीय मुसलमानों के हाथ में आ जाए। 1924 के आते – आते खिलाफत आंदोलन खत्म हो जाता है। जिसके बाद मेवात में एक संस्था बनाई जाती है वही के मौलाना के द्वारा जिनका नाम मोहम्मद इलियास था। जिसकी मंशा भारतीय समावेशी संस्कृति के विरुद्ध दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ना थी और साथ ही भारत में इस्लाम को पुनः जीवित करना थी वह भी उसके तथाकथित शुद्ध रूप में जिसका अर्थ की भारतीय मुसलमानों को जिहाद की तरफ ले जाना की थी| जिसकी विचारधारा हर तबलीगी के नशों में बसी हुई है।

दो मोर्चे पर जिहाद:

तबलीगी जमात भारतीय मुसलमानों में इस्लामिक सिद्धांत पर सामाजिक और राजनीतिक रूप से अपने एजेंडे को फैलाना चाहती है।

सामाजिक मोर्चे पर समाज में प्रतिक्रियावाद को बढ़ावा देना। जैसा कि हम जानते हैं की इस्लाम भारत की उत्पति नहीं है, यह एक बाहरी धर्म है जो कि भारत की संस्कृति में उथल-पुथल करके आया। मंशा बाबर, खिलजी ऐसे जिहादी राजाओ की भारतीय संस्कृति को तबाह करने की थी परंतु वह नहीं हो पाया। भारत में जबरन धर्म परिवर्तन हुए जिसके बाद लोगों ने इस्लाम धर्म को माना, परंतु स्थानीय संस्कृति धर्म पर हमेशा भारी रही है। तबलीगी जमात का कार्य उसी संस्कृति को खत्म करना है| जैसे कि यह जमात मेवात से शुरू हुई, मेवाती मुसलमानों को इस्लाम बताने के लिए लेकिन आज भी हिंदू संस्कृति के तहत मेवाती मुसलमानों में गोत्र देखकर शादी होती है। उदाहरण के तौर पर देमरोथ, चेरागिलोत की शादी इन्हीं के गोत्र में होती है। आज मेवात में यह परंपरा सुकड़ कर बहुत सीमित स्तर पर रह गई है और इस परंपरा को खत्म होने की स्थिति में लाकर खड़ा करने वाले यही तबलीगी जमात है।

उत्तर भारत में महिलाएं पैरों में बिछिया पहनती हैं जोकि उत्तर भारत की संस्कृति से यह रिचुअल आता है। परंतु मुस्लिम पुरुषों के साथ – साथ अब मुस्लिम महिलाएं भी तबलीगी जमात के धर्म परिवर्तन करने के कार्य में जुड़ चुकी हैं जिससे यह महिलाएं अन्य भारतीय मुस्लिम महिलाओं को यह संस्कृति के पालन करने से मना करती हैं अगर कोई महिला यह संस्कृति को अपनाती है तो उससे गैर इस्लामिक बताकर नकार दिया जाता है।

भारतीय मुस्लिम महिलाएं जिस कदर तबलीगी जमात से जोड़ रहीं है, वह उतना ही कट्टरवाद की तरफ जा रही है जैसे कि तबलीगी जमात में महिलाओं को दुनिया के हर पाप का केंद्र माना जाता है और ऐसी ही शिक्षा तबलीगी अपने साथियों को देते हैं। “फीतना”
मतलब सारे तबाही की जड़ महिलांए होती हैं। इसलिए महिलाओं को काबू में रखना चाहिए कि वह कितना बोले, कितना खाएं, विडंबना यह है मुस्लिम महिलाएं इसे तबलीगी जमात का प्यार समझती हैं। तबलीगी जमात का एजेंडा एकदम पानी की तरह साफ है कि वह हिंदू संस्कृति से भारतीय मुसलमानों को एकदम अलग कर देना चाहते हैं यही मोहम्मद इलियास का इरादा था। आज के समय यह जमात अपने इस अजेंडे को पूरी दुनिया में फैला रही है। धर्म को संस्कृति से आगे रखकर मुसलमानों में धार्मिक चेतना की आग को और तेज करना चाहती है जिसके परिणाम स्वरूप यह दुनिया खुद ही दो हिस्सों में बट जाएगी।

राजनीतिक जिहाद

लोकतंत्र में जिस राजनीतिक पार्टी पर संख्या है, उसकी सरकार होती है। 1924 में जब तबलीगी जमात शुरू हुई उसी वक़्त से राजनीतिक जिहाद शुरू हुआ। जैसे मुस्लिम बस्तियों का लगातार बढ़ना जिसका उद्देश्य यह होता है भारतीय मुसलमानों को इस्लामिक, कट्टरवाद की तरफ ले जाना ताकि कोई बाहरी विचारधारा ना आ सके।

एक घर में आठ-आठ या उससे भी ज्यादा बच्चे होना भी तबलीगी जमात के जिहाद का हिस्सा है। ताकि मुस्लिम आबादी बढ़ सके जिससे भारतीय राजनीति पर शिकंजा कसा जाए, और उसे अपने अनुसार चलाया जा सके।

धर्म परिवर्तन भी तबलीगी जमात के जिहाद का हिस्सा है, पहले यह सिलसिला भारत में शुरू हुआ तबलीगी जमात के हर तबलीगी का काम है, की वह गेर इस्लामिक व्यक्ति को इस्लाम के बारे में बताए जिसे वह “दावत” कहते हैं। यह हर जमाती में भरा जाता है, आज के वक़्त में यही धर्म परिवर्तन पूरी दुनिया में चल रहा है।

जबर बुर्के

तरह – तरह के बुर्के:

बुर्का आज के वक्त एक पिछड़ी सोच का चिन्ह है। परंतु बुर्के का भारतीय संस्कृति से तनिक भी संबंध नहीं है आज भारत में स्थिति इस कगार पर आ खड़ी है शिक्षित या गैर शिक्षित मुस्लिम महिलाएं बुर्के को गले से लगा कर चल रही है।

कभी बुर्के के तौर पर हिजाब पहना जाता है, किसी बुर्के में चेहरा दिखाया जाता है, तो किसी बुर्के में आंखें दिखाई जाती है परंतु तबलीगी जमात की महिलाएं सर से पांव तक ढकी हुई होती हैं आंखों की जगह पर जालीदार कपड़ा लगाया जाता है, हाथों में ग्लब पहने जाते हैं।

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