Wednesday, March 3, 2021
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अशोक: महानता के कथानक को एक गंभीर स्क्रूटनी की आवश्यकता है

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Suraj Bohare
History and culture enthusiast. Nomad/ realist/ Candid/ a little bit of trio. And above all. जब जैसा, तब तैसा

कम से कम यह तो स्वीकार करना ही होगा कि अशोक की महानता के साक्ष्य बहुत कमजोर है और ज्यादा से ज्यादा यह कह  सकते हैं कि वह गंभीर संदेह के दायरे में है।”

भारतीय इतिहास के भूमिका वाले पन्नो पर आमतौर पर अशोक ‘महान’ या अकब र’महान’ या फिर नेहरू ‘चाचा’ जैसे चुनिंदा ‘हैंडपिक्ङ’ भारतीयों को एक ऐसी जगह स्थापित कर दिया गया है कि फिर पूरा इतिहास ही इन ‘महान’ लोगो के चारो ओर घूमता नजर आता है, जैसे राजनीतिक सत्ता स्वाभाविक रूप से पाटिलीपुत्र या दिल्ली जैसे देश के भीतरी हिस्सो मे केंद्रित रही हो, और शेष भारत महज प्रान्त बनकर रह गया हो।

इन महान नेतृत्वकर्ताओ की तारीफ़ में पढ़े गये कसीदों पर प्रश्न-चिन्ह लगाना सर्वदा अकादमिक-पाप की दृष्टि से देखा जाता रहा हैं। हमारा ‘पूर्वपक्ष’, ‘इतिहास की तोपों’ से वैधानिक मान्यता प्राप्ति का प्रयोजन भर नही है।

महानता की चादर काफी दागदार है

भारतीय इतिहास के “सिक्स ग्लोरियस एपोच” में सावरकर ने सबसे पहले ‘महान’ अशोक के कथानक को तथ्यों की स्क्रूटनी पर कसने की कोशिश की थी। संजीव सान्याल जैसे अन्य लोगों ने भी यह तर्क दिया है कि “भारतीय सेकुलर स्टेट ने अशोक को केंद्र में रखकर एक झूठी कथा का निर्माण किया, जो किसी उचित जांच पर खरी नहीं उतरती।”

कोइनार्ड एलस्ट कहते हैं कि “जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में बौद्ध धर्म को भारत के अनौपचारिक स्टेट रिलेशन के तौर पर प्रोत्साहन मिला। बौद्ध सम्राट अशोक के सिंह-स्तंभ को राज्य का प्रतीक बनाया गया और 24 तीलियों वाले धर्म चक्र को राष्ट्रीय ध्वज में स्थान दिया गया।”

यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि नेहरूवादी गणराज्य खुद को एक आदर्शवादी ‘अशोकअन एंपोरियम’ के रूप में प्रदर्षित करने के लिए प्रयासरत दिखाई देता था।

आजादी के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि ख्यातिनाम इतिहासकारों को ‘महान’ अशोक का कथानक गढ़ने के लिए और ज्यादा बढ़ावा दिया गया ताकि जवाहरलाल नेहरु के समाजवादी प्रोजेक्ट के लिए भारतीय इतिहास में एक  व्युत्पत्ति प्रदान की जा सके और इसके लिए असुविधाजनक हिस्सो को दबा दिया गया। एक बात तो स्वीकार करनी पड़ेगी कि वर्तमान समय की समस्याओं के समाधान की खातिर अतीत की तरफ झांकने वाले भारतीयों पर इसका जादुई असर हुआ।

सजा देने का हम भारतीयों का स्वदेशी तरीका है, भुला देना। 

हमारी स्कूली शिक्षा में अशोक को ‘महान’ घोषित किया गया है। जहां उसे भारत के दो सबसे महान सम्राटों में अकबर के साथ  चित्रित किया जाना, इसी परियोजना का हिस्सा है

लेकिन ये सब इस तथ्य के खिलाफ जाता है कि भारतीय परंपरा में नहीं, बल्कि उन देशो में लिखे गए प्रसंसात्मक बौद्ध ग्रंथों में उसे महान राजा के तौर पर याद किया गया है जिन्होंने उनके शासन का अनुभव नहीं किया था। वास्तव में इस शासक को उसके ‘महान कर्मों’के साथ भुला दिया गया था। जब तक  कि दो  शताब्दियों पहले जेम्स प्रिंसेप जैसे ओपनिवेशिक  प्राच्यविदों ने उसकी ‘पुनर्खोज’ की घोषणा नहीं की।

रोमिला थापर भी “अशोक और मौर्यो के पतन” में लिखती हैं कि “भारतीय धर्मनिरपेक्ष स्रोतों में अशोक काफी हद तक राजवंशी सूचियों में एक नाम बना रहा, बाद की शताब्दियों में उन अस्पष्ट अभिलेखों की लिपि के रूप में जिसमें उसे उनके संपादकों ने उकेरा था। तथ्य यह है कि एक सम्राट के रूप में अशोक के कामो को भारतीय इतिहास से विस्मृत कर दिया गया और सोचा नही जा सकता था”।

ऐसा क्यों हुआ? हमारे पूर्वजों ने इस कथित महान सम्राट को क्यों भुला दिया? यहाँ इसके ही कुछ कारणों की जानने की कोशिश की गई है। मैं स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि अशोक का ये पक्ष बिल्कुल ही अप्रकाशित है बल्कि तथ्य यह है कि मुख्यधारा के लेखनों में उनकी पूर्वनिर्धारित गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए इन तथ्यों को हमेशा से दबाया जाता रहा है।

  ‘चंड-अशोक’ का खिताब और महानता का उद्दघाटन

लगभग सारे विवरण इस बात पर सहमत हैं कि अशोक का प्रारंभिक शासनकाल हिंसक और अलोकप्रिय था, उसे ‘चंड अशोक’ कहा जाता था। मगर मुख्यधारा की किताबो में दी जाने वाली कहानी के मुताबिक कुछ साल बाद अशोक ने कलिंग पर हमला किया और मौतों और तबाही से व्याकुल होकर उसने बौद्ध धर्म अपना लिया और शांतिप्रिय बन गया।  

अशोक का 13वां शिलालेख कलिंग युद्ध का वर्णन करता है। जबकि किसी भी बौद्ध ग्रंथ में इस युद्ध की चर्चा नहीं की गई है।

262 ईसा पूर्व में अशोक ने कलिंग पर हमला किया था जबकि लघु शिलालेखों से हमें पता है कि अशोक लगभग 2 साल पहले ही बौद्ध धर्म अपना चुका था। कोई भी बौद्ध ग्रंथ उसके धर्म परिवर्तन को युद्ध से नहीं जोड़ता और चार्ल्स ऐलन जैसे अशोक के प्रशंसक भी सहमत हैं कि उसने कलिंग युद्ध से पहले धर्म परिवर्तन कर लिया था। इसके अलावा धर्म परिवर्तन करने से एक दशक पहले से उसके बौद्धों के साथ संबंध प्रतीत होते हैं। यह साक्ष्य साबित करता है कि उसका बौद्ध धर्म अपनाना उत्तराधिकार की राजनीति ज्यादा रही होगी, युद्ध की त्रासदी से उपजा पश्चाताप कम।

शायद मौर्य वैदिक दरबार के रीति-रिवाजों का पालन करते थे (निश्चित ही उनके कई उच्चाधिकारी ब्राह्मण थे) लेकिन निजी जिंदगी में उनके असंकीर्ण धार्मिक जुड़ाव थे। प्रतीत होता है वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त वृद्धावस्था में जैनियों के संपर्क में था, जबकि उसका पुत्र बिंदुसार आजीवक नाम के एक नास्तिक संप्रदाय का पक्षधर था। भारतीय धर्मों के परिवार में यह कोई असामान्य प्रबंध नहीं है। आज भी यह शानदार  खुली  नीति कायम है और भारतीय धर्मों के अनुयायी एक-दूसरे के पूजा स्थलों पर प्रार्थना करने में कोई दोष नहीं मानते हैं।

तो यह हो सकता है कि जब अशोक ने सिंहासन पर कब्जा किया तो परिवार के उन लोगों ने उसका विरोध किया हो जिनके जैनों और आजीवकों से संबंध थे। उसने समर्थन पाने के लिए उनके विरोधी बौद्धों से संपर्क करके इसका जवाब दिया हो सकता है।

उसके धर्म परिवर्तन की पटकथा में कलिंग पर उसके आक्रमण का विशेष स्थान है। मुख्यधारा का मानना है कि कलिंग स्वतंत्र राज्य था जिस पर अशोक ने हमला किया था लेकिन यह मानने के कुछ कारण मौजूद है कि कलिंग या तो विद्रोही प्रांत था या ऐसा अधीनस्थ जिस पर अब विश्वास नहीं किया जा सकता था।

हम जानते हैं कि मौर्यों का पूर्ववर्ती नंद वंश पहले ही कलिंग को जीत चुका था और इसलिए यह संभव है कि जब चंद्रगुप्त ने साम्राज्य की बागडोर संभाली तो यह मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बन गया। जो भी हो, यह अजीब लगता है कि मौर्यो के समान बड़े और विस्तारवादी साम्राज्य ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र और उसके मुख्य बंदरगाह ताम्रलिप्त के इतने करीब मौजूद एक स्वतंत्र राज्य को बर्दाश्त किया होगा। दूसरे शब्दों में, बिंदुसार के अधीन कलिंग पूरी तरह से स्वतंत्र राज्य नहीं रहा होगा -वह याँतो एक प्रांत रहा होगा या नजदीकी अधीनस्थ। स्पष्ट रूप से अशोक के शासन के शुरू के सालों में कोई बदलाव जरूर आया होगा और मेरा अनुमान है कि इसने या तो उत्तराधिकार की लड़ाई में अशोक के शत्रुओं का साथ दिया होगा या इस सारी गड़बड़ी में खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया होगा।

अशोक का क्रोध जगाने की असली वजह कुछ भी रही हो मगर 262 ईसा पूर्व  में एक विशाल मौर्य सेना ने कलिंग पर हमला किया। अशोक के अपने अभिलेख बताते हैं कि युद्ध में एक लाख लोग मारे गए थे और उससे भी बड़ी तादाद में लोग जख्मो औऱ भूख से मरे थे। इसके अलावा डेढ़ लाख लोगों को बंदी बनाया गया था।

आधिकारिक कहानी के मुताबिक अपनी ही निर्ममता को देखकर अशोक सहम गया और  बौद्ध व शांतिप्रिय बन गया। मगर जैसा कि हमने देखा है, उस समय तक वह धर्म का पालन करने वाला बौद्ध हो चुका था, और उसके प्रारंभिक शासन से हमें जितना पता है, वह ऐसा इंसान तो कतई नहीं था जो खून देखकर इतनी आसानी से विचलित हो जाता। उसके पश्चाताप का खास सुबूत उसके अपने अभिलेखों में मिलता है। मगर यह बहुत ही जिज्ञासा भरा है क्योंकि हम इस “पश्चाताप” का जिक्र केवल उड़ीसा से दूर स्थित स्थानों पर मिले अभिलेखों में ही पाते हैं (जैसे उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान के शाहबाजगढ़ी में)। ओडिशा में मिले किसी भी अभिलेख में पश्चाताप नहीं झलकता; धौली में अशोक के अभिलेख पहाड़ी की तली में एक चट्टान पर खुदे हुए हैं। उन्हें पढ़ने वाले किसी भी व्यक्ति का इस ओर ध्यान जरूर जाएगा कि ये पश्चाताप के किसी संकेत तक का भी जिक्र नही करते । ये खामोशी चुभती है। 

अगर अशोक को वाकई पश्चाताप हुआ था, तो वह यकीनन उन लोगों से माफी मांगने की जहमत उठाता जिनके साथ उसने गलत किया था। यह तो दूर, उसने बंदियों को आजाद करने तक की पेशकश नहीं की, बाद में इन कैदियों ने अपने आपको खेतिहर-दासों के रूप में पाया। तथाकथित रूप से पश्चाताप भरे अभिलेखों तक में वन्य जनजातियों समेत दूसरे समूहों के खिलाफ हिंसा की स्पष्ट धमकी है। जिनमें स्पष्ट रूप से ‘उन्हें दंड देने की शक्ति के बारे में बताया जाता है जो प्रायश्चित करने के बावजूद देवनामप्रिय के पास है, जिससे वे अपने अपराधों पर शर्मिंदा हो और मारे ना जाएं।’ यह तो बिल्कुल भी शांतिप्रियता नहीं है। 

काफी रोचक है कि बौद्ध साहित्य में अशोक को एक क्रूर व्यक्ति के रूप में तभी तक दर्शाया गया है जब तक कि उसने बौद्ध धर्म को स्वीकार नहीं कर लिया और बौद्ध धर्म में धर्मांतरण की घटना लगभग ‘आकस्मिक’ परिस्थितियों में हुई ऐसा भी बतलाया जाता है। इतिहास की ‘रेखीय प्रकृति’ में विश्वास इसकी वजह हो सकता है, लेकिन हम जानते है कि इतिहास सीधी रेखाओं पर नही चलता। समान परिस्थितियां यां सिद्धांत भी भिन्न परिणाम पैदा करती है।

अशोकावदान की एक कथा में ये वर्णित है कि अशोक अपनी कुरूपता के कारण अपने पिता बिंदुसार का प्रिय नहीं था। अशोक ने बिंदुसार द्वारा चयनित उत्तराधिकारी, सुसीम को अपदस्थ कर (उसने ऐसा यूनानी सेनिको की मदद से किया था) शासन की बागडोर संभाली थी। वास्तविक उत्तराधिकारी को जलते कोयले की खाई में डलवा दिया। सत्ता में आने के बाद उसने मंत्रियों की विश्वसनीयता की परीक्षा ली। उनमें से 500 का उसने स्वंम सिर कलम किया, जो उसकी अपेक्षा पर खरे नहीं उतर सके।

अशोक ने अपने परिवार के सभी पुरुष प्रतिद्वंदियों को मरवा दिया था। बौद्ध ग्रंथ बताते है कि उसने अपने सगे भाई तिस्सा को छोड़कर बांकी सभी निन्यानबे भाइयों को भरवा दिया था। इस हद्द-दर्जे की क्रुरता के वाले ग्रहयुद्ध के बाद 270 ईसा पूर्व, में आखिरकार वह राजा बना था।

एक बार राजप्रसाद के अन्तःपुर की किसी स्त्री के व्यवहार से अशोक ने स्वयं को अपमानित महसूस किया, उसने बदले में वहां की सभी स्त्रियों को जिंदा जलवा दिया। यातनाएं उसे अभिभूत करती थी। उसने एक नर्क का भी निर्माण करवा रखा था। यह एक प्रकार का एक ‘यातना कक्ष’ था जिसके दृश्यों से वह आनंदित होता था। वहां दुर्भाग्यशाली कैदियों को प्रताड़ना दी जाती थी। 

जुआन-जांग जो 7वीं सदी में भारत आया था, उसने अपने यात्रा वृत्तांत में अशोक के इस यातना-स्थल की चर्चा की है।

अशोकावदान ही एक दूसरी जगह बताती है कि कथित रूप से शांतिप्रिय होने के कई साल बाद भी सम्राट द्वारा नरसंहार के अनेक कृत्य किए गए थे जो  विशेष तौर पर जैन और आजीवन सम्प्रदाय के खिलाफ थे। सभी उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह मुख्यधारा के हिंदुओं के साथ टकराव से बचा था और ब्राम्हणों के प्रति सम्मानपूर्ण था। अशोकावदान याद करता है कि किस तरह एक बार बंगाल में अशोक ने अठारह हजार आजीवकों को एक साथ मौत के घाट उतरवा दिया था। अगर यह सच है, तो भारतीय इतिहास में बड़े पैमाने पर हुई धार्मिक हत्याओ का यह पहला ज्ञात उदाहरण है (मगर, अफसोस कि आखिरी नही)।

 अशोकावदान में वर्णित ये एकमात्र घटना नही है। पाटलीपुत्र के एक जैन श्रद्धालु को एक तस्वीर बनाते हुए पाया गया जिसमें बुद्ध एक जैन तीर्थंकर के आगे नमन कर रहे थे। अशोक ने आदेश दिया कि उसे और उसके परिवार को उसके घर में बंद कर दिया जाए और भवन को जला दिया जाए। फिर उसने आदेश दिया कि जैनो के हर कटे सिर के लिए, वह एक असर्फी देगा। यह संहार तब जाकर रुका जब किसी ने गलती से अशोक के अपने एकमात्र बचे सगे भाई  बौद्ध भिक्षु वीतशोक (इसे तिस्सा भी कहा जाता था) को मार दिया। 

यह कहानी आज के कट्टरपंथियों से डरावने समानांतर की ओर इशारा करती है जो उन कार्टूनिस्टों को मार देते है जिन पर वे अपने धर्म के अपमान  का आरोप लगाते हैं।

धम्म अगर स्वर्ग के लाभ देने वाला था तो प्रशासन, सांसार के लाभ देता!

शोक की निर्ममता के अलावा हमारे पास यह मानने के भी कारण है कि अशोक सफल प्रशासक नहीं था। अशोक ने अपने जीवित रहते ही अपने साम्राज्य को बिखरते हुये देखा। जिसमें चंद्रगुप्त के समय, सेल्युकस से हांसिल किया गया राज्य का उत्तर-पश्चिमी भाग भी था। 232 ईसा पूर्व, में ही जब अशोक की मृत्यु को कुछ ही समय बीता था, सातवाहनों ने दक्षिण भारत के ज्यादातर हिस्सो पर कब्जा कर लिया और कलिंग भी अलग हो गया।

जरा सी सावधानी के साथ विश्लेषन करने पर यह  समझा जा सकता है कि अशोक की महानता संदिग्ध है। वह एक क्रूर, अलोकप्रिय और राज्य हड़पने वाला नजर आता है जिसने अपने पिता और दादा के बनाए एक विशाल और सुव्यवस्थित साम्राज्य को तोड़ने का काम किया। कम से कम यह तो स्वीकार करना ही होगा कि अशोक की महानता के साक्ष्य बहुत कमजोर है और ज्यादा से ज्यादा यह कह सकते हैं कि वह गंभीर संदेह के दायरे में है।

अशोक का अध्ययन इस मायने में आज उपयोगी हो गया है कि इससे हम आज के नेताओ की ‘लफ्फाजी’ के ऐतिहासिक उद्गगम का पता लगा सकते है।

लेकिन अशोक के अभिलेखों में उसका जो शानदार चेहरा दिखता है, उसका क्या?

संभव है कि अशोक निर्ममता की अपनी छवि को दूर करने के लिए अपने अभिलेखों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा के साधन की तरह इस्तेमाल कर रहा हो। जैसा कि किसी भी नेता से उम्मीद की जाती हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि उसने अपना व्यवहार बदल लिया था। इसके अलावा उसके अनेक अभिलेख ऐसे स्थानों पर लगे हैं जहां उस काल का औसत नागरिक या अधिकारी उन्हें पढ़ नहीं सकता था। नयनजोत लाहिरी समेत कई इतिहासकारों ने इस पर हैरानी जताई है। क्या यह मुमकिन है कि कुछ अभिलेख असल में उसके समकालीनो के लिए नहीं बल्कि बाद की पीढ़ियों के लिए थे? (संभवतः उसके आधुनिक प्रसंसको के लिये?)

चार्ल्स एलन जैसे पश्चिमी लेखको ने ‘श्वेत व्यक्ति के भार’ वाले अभिमान के साथ लिखा है कि किस तरह भारतीयों ने अशोक जैसे महान राजा के लिए संम्मान न दिखाकर मूर्खता की। करीब से देखने पर प्रतीत होता है कि उन्हें पता था कि वो क्या कर रहे हैं। ज्यादा चिंता की बात यह है कि आधुनिक भारतीयों ने कितनी आसानी से इतने कम साक्ष्यो पर आधारित कथानक को कैसे स्वीकार कर लिया है?

जरूरी नहीं कि सच आपको सूट ही करे

अशोक के समर्थक दावा कर सकते हैं कि ये घटनाएं झूंठी है और बहुत बाद में कट्टरपंथी बौद्ध लेखको ने जोड़ी है। हालांकि यह पूरी तरह संभव है मगर मैं उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि मेरा वैकल्पिक कथानक भी उन्हीं ग्रंथों पर आधारित है जो अशोक की प्रशंसा करते हैं। शायद सारे साक्ष्य पर समान संदेह भाव को समान रुप से लागू करना चाहिए, न कि ग्रंथ के ऐसे कुछ हिस्सों पर जो मुख्यधारा के कथानक को संतुष्ट नही करते।

सस्ते वैचारिक मंतव्य कुछ भी हों पर अकादमिक तथ्य नही होते

ऐसे कथानकों के फलने फूलने की वजहें तो अनेक है लेकिन यहां एक बात स्पष्ट करने की ज्यादा ज़रूरत है। आज के दौर में, गंभीर रिसर्च के लिए पैसे उपलब्ध नहीं हैं। इतिहास विभागों के गिरते स्तर के मद्देनज़र महंगी तथ्यात्मक रिसर्च पर सस्ते वैचारिक लेखों को हमेशा प्राथमिकता मिलेगी। ऐसे माहौल में कहानियां बुनने वाले हमेशा जीतते हैं। इस खेल में धोखा सिर्फ भोली जनता खाती है, जो इन हवाई कथानकों में अपनी पहचान खोजती है। वरना अकादमिक प्रतिष्ठानों और उनके भड़काऊ प्रतिनिधियों के लिए ये एक कमाऊ तरीका है और लक्षित राजनीतिक नेता इसे पसंद करते हैं-  ऐसे किरदारों के सहारे जितना सामुदायिक चिह्नीकरण को बढ़ावा मिलेगा, उन्हें उतने ही अधिक वोट मिलेंगे. यानि ये सबके लिए फायदे वाली स्थिति है सिवाय इतिहास के। मैं आजादी चाहूंगा, इस ‘धोखाधड़ी’  के खिलाफ होने की।।

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