Sunday, August 9, 2020
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आत्मनिर्भर भारत अभियान की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता: पैकेज का तीसरा भाग, कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र का विकास

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Om Dwivedihttp://raagbharat.com
Founder and writer at raagbharat.com Part time poet and photographer.
 

12 मई को जब प्रधानमंत्री ने अपने उद्बोधन में आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प लिया तब लगभग सबको यह अनुमान था कि यह कोई त्वरित निर्णय नहीं है अपितु इसके लिए लगातार काम होते रहे। वित्त मंत्री पिछले तीन दिनों से पूरी जानकारी प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से भारत के सामने रख रहीं हैं।

किन्तु इस पैकेज का जो तीसरा भाग है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस भाग में कृषि और उससे सम्बंधित गतिविधियों के उत्थान के लिए आवश्यक उपायों की चर्चा की गई है। यह निश्चित है कि आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक कि भारत के गाँव और कृषि व्यवस्था सुदृढ़ नहीं होती। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आत्मनिर्भर भारत पैकेज में कृषि एवं सम्बद्ध गतिविधियों के लिए एक बड़ा हिस्सा समर्पित किया गया है। 15 मई को घोषित किये गए कृषि सम्बंधित सुधारों को 11 बिंदुओं में विभाजित किया गया है। इसमें पहले 8 बिंदु कृषिगत अवसंरचना निर्माण से सम्बंधित हैं तथा शेष 3 बिंदु प्रशासनिक एवं नीतिगत सुधारों से सम्बंधित हैं। आगे इन सभी सुधार बिंदुओं पर विस्तृत चर्चा की जा रही है।

  1. फसल कटाई के बाद की व्यवस्थाओं में कमी एक बड़ी समस्या रही है भारतीय कृषि की। कोल्ड स्टोरेज जैसी व्यवस्थाओं की कमी के कारण मूल्य ह्वास होता रहा है। अभी तक भारत में कृषि के क्षेत्र में कृषिगत अवसंरचना के निर्माण में उतने कार्य नहीं हुए जिनकी आवश्यकता थी। इस पैकेज में ऐसी कमियों को दूर करने के लिए एक बड़े फंड की व्यवस्था की गई है। यह फंड एक लाख करोड़ रुपये का होगा जो शीघ्रता से अस्तित्व में लाया जाएगा। इस फंड का उपयोग कृषि प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात अंतिम बिंदु पर अवसंरचना विकास के कार्य किए जाएंगे जिससे फसल की बर्बादी रुक सके और फसल दीर्घकालिक समय तक बाजार के योग्य बनी रह सके। प्राथमिक कृषिगत सहकारी संस्थाएं, कृषक उत्पादक संगठन, कृषि उद्यमी एवं कृषि स्टार्टअप इस अवसंरचना विकास परियोजना के मुख्य स्टेकहोल्डर होंगे।     
  2. प्रधानमंत्री ने वोकल फॉर लोकल का आह्वान किया है जिससे हमारी लोकल इकाईयां ग्लोबल बन सकें। इसको ध्यान में रखते हुए दस हजार करोड़ रुपये की एक परियोजना बनाई जाएगी जो सूक्ष्म खाद्य उद्यमों के लिए सहायक होगी। इस  परियोजना की सहायता से ये उद्यम मार्केटिंग, ब्रांड निर्माण और FSSAI खाद्य स्टैण्डर्ड जैसी सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए तकनीक उत्थान पर कार्य कर सकेंगे। ऐसे लगभग दो लाख सूक्ष्म खाद्य उद्यम हैं जिन्हे इस योजना से लाभ मिलने की सम्भावना है। इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता है, क्लस्टर बेस्ड एप्रोच अर्थात राज्यों को उनकी विशेष खाद्य पहचान के आधार पर फ़ूड प्रोसेसिंग क्लस्टर बनाने की छूट रहेगी। जैसा कि वित्त मंत्री ने बिहार के मखाने और उत्तरप्रदेश के आमों का उदाहरण दिया। 
  3. प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना के माध्यम से सरकार मत्स्य उत्पादन क्षेत्र के लिए बीस हजार करोड़ रुपये का आवंटन करेगी। इस फंड को दो भागों में बांटा गया है। 11000 करोड़ रुपये समुद्री, अंतर्देशीय और कृत्रिम मत्स्य उत्पादन के लिए होंगे। 9000 करोड़ रुपये अवसंरचना विकास को सुनिश्चित करने के लिए होंगे। अवसंरचना विकास में फिशिंग हार्बर, कोल्ड स्टोरेज सुविधा निर्माण तथा मत्स्य बाजार का निर्माण प्रमुख है। इस योजना में मछुआरों के निजी और बोट के बीमा के प्रावधान के साथ प्रतिबन्ध समयावधि (मानसून या तूफान, चक्रवात जैसी परिस्थिति) में सहयोग का भी प्रावधान होगा। इससे अगले 5 वर्षों में 70 लाख टन अधिक मत्स्य उत्पादन का लक्ष्य प्राप्त किया जाएगा। इस योजना से निर्यात दोगुना होकर एक लाख करोड़ रुपये तक होने की संभावना है, साथ ही इससे 55 लाख नए रोजगार भी उत्पन्न होंगे।
  4. राष्ट्रीय पशु रोग निवारण कार्यक्रम के लिए 13343 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत के 53 करोड़ पशुधन का वैक्सीनेशन करना है जिससे भारत के पशुओं को मुँह पका, खुर पका और ब्रूसीलोसिस जैसी बीमारियों से मुक्ति मिल सके। इन बीमारियों के कारण पशुपालन में संलग्न कृषकों को अत्यधिक हानि का सामना करना पड़ता है।
  5. पशुपालन अवसंरचना विकास फंड के माध्यम से डेरी प्रोसेसिंग, मूल्य संवर्धन एवं पशु चारा निर्माण के लिए निजी निवेश को प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसके लिए 15000 करोड़ रुपये का फंड बनाया गया है। अंतिम डेरी उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन निधि की व्यवस्था की जाएगी।
  6. औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए 4000 करोड़ रूपये की धनराशि सुनिश्चित की गई है। इसकी सहायता से अगले दो वर्षों में दस लाख हैक्टेयर भूमि में औषधीय कृषि की जाएगी जिससे लगभग 5000 करोड़ रुपये की आय प्राप्त होगी। इसके अलावा गंगा नदी के दोनों किनारों पर लगभग 800 हैक्टेयर भूमि में चिकित्सकीय पौधों की खेती का एक कॉरिडोर बनाया जाएगा जिसके लिए राष्ट्रीय चिकित्सकीय पादप बोर्ड उत्तरदायी होगा।
  7. मधुमक्खी पालन इनिशिएटिव ग्रामीण भारत में कई कृषकों विशेषकर महिलाओं के लिए लाभदायक हो सकता है। मधुमक्खी पालन से शहद एवं वैक्स का उत्पादन किया जा सकता है। 500 करोड़ की लागत से सरकार अवसंरचना निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें एकीकृत मधुमक्खी पालन केंद्र, संग्रहण, मार्केटिंग एवं स्टोरेज केंद्र, पालन प्रक्रिया की पूर्णता के बाद मूल्य संवर्धन की सुविधाएं सम्मिलित हैं। इस इनिशिएटिव से दो लाख मधुमक्खी पालकों को आय प्राप्त होगी।
  8. ऑपरेशन ग्रीन को टमाटर, प्याज और आलू (TOP) की डिस्ट्रेस बिक्री और विक्रय मूल्य में गिरावट को रोकने के लिए प्रारम्भ किया गया था। इसे बढ़ाकर अब सभी फलों और सब्जियों को कवर किया जाएगा, जिसे TOP To TOTAL नाम दिया गया है। इस योजना के दो महत्वपूर्ण बिंदु हैं। पहला कि सरप्लस वाले बाजार से न्यूनता वाले बाजार तक इन वस्तुओं के आवागमन में 50% सब्सिडी दी जाएगी। दूसरा कि स्टोरेज पर भी 50% की सब्सिडी दी जाएगी।फिलहाल यह 6 महीने के पायलट प्रोजेक्ट पर है लेकिन आगे इसे बढ़ाया जाएगा।

अगले 3 बिंदु वैधानिक सुधारों से सम्बंधित हैं।

  1. आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन किया जाएगा। इसका उद्देश्य होगा कृषि को और भी प्रतिस्पर्धात्मक बनाना एवं निवेश आकर्षित करना। इसके लिए अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू को अविनियमित किया जाएगा। केवल कुछ गंभीर परिस्थितियों में ही स्टॉक लिमिट तय की जाएगी। प्रोसेसिंग और मूल्य संवर्धन में संलग्न इकाईयों पर कोई स्टॉक लिमिट तय नहीं होगी लेकिन यह नियम उनकी क्षमता के अनुसार क्रियात्मक रहेगा।
  2. दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव कृषिगत विपणन से सम्बंधित है। वास्तव में अभी तक औद्योगिक उत्पादों के विपरीत कृषि उत्पादों को लाइसेंस धारक APMCs को ही विक्रय किया जा सकता था जिससे कृषि उत्पादों के मुक्त प्रवाह और सप्लाई चैन पर विपरीत प्रभाव पड़ता था। इस समस्या का समाधान करने के लिए एक केंद्रीय कानून बनाया जाएगा जिसके अंतर्गत कृषकों को अपना उत्पाद इच्छित मूल्यों पर बेचने की स्वतंत्रता होगी। अंतर्राज्यीय व्यापार बाधाओं से मुक्त बनाया जाएगा तथा कृषि उत्पादों के ई-व्यापार के लिए फ्रेमवर्क बनाया जाएगा। 
  3. कृषिगत सुधारों का अंतिम बिंदु कृषकों के जोखिम को कम करने और उनके हितों की रक्षा से सम्बंधित है। एक वैधानिक फ्रेमवर्क बनाया जाएगा जिसकी सहायता से कृषक बिना किसी शोषण की चिंता से प्रोसेसर, थोक व्यापारी, निर्यातक आदि से जुड़ सके। जोखिम शमन, अच्छे आउटपुट की गारंटी और उचित गुणवत्ता इस वैधानिक फ्रेमवर्क के मुख्य भाग होंगे।

भारतीय कृषि के इतिहास में ये उपाय महत्वपूर्ण साबित होंगे। वास्तव में ग्रामीण भारतीय विकास मात्र कृषि आधारित न हो अपितु एक कृषक के सामने अधिक से अधिक विकल्प उपस्थित हों तभी समवेशी तौर पर कृषि एवं सम्बद्ध गतिविधियों के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा। जिस प्रकार कोरोना वायरस के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट आया हुआ है, ऐसी परिस्थिति में ग्रामीण विकास भारतीय अर्थव्यवस्था को एक बड़ा सहारा दे सकता है। हालाँकि अभी और भी घोषणाएं की जानी हैं। 20 लाख करोड़ रुपये के इस पैकेज का पूरा खाका सामने आने के बाद यह पूरी तरह साफ़ हो जाएगा कि वास्तव में आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न किस प्रकार पूरा  सकेगा किन्तु एक बात तो तय है कि अंतिम प्रयास तो हम नागरिकों को ही करना है।    

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