Wednesday, March 11, 2026
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हम राम के भक्त है या बाबर के वारिस?

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Ashish Anand
Ashish Anand
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आधा यूरोप अनेक साल इस्लामी वर्चस्व में रहा। उस समय इस्लामी आक्रान्ताओं ने अनेक चर्च गिराकर वहां मस्जिदें बनाईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन ईसाई यूरोपियन देशों ने ऐसी मस्जिदें ध्वस्त करके वहां फिर से चर्च बनाए। यह अपमान का परिमार्जन था।

1815 में पोलैण्ड रूस ने जीता, जीतने के बाद रूस ने पोलैण्ड की राजधानी वारसा में एक बड़े चौराहे पर एक चर्च का निर्माण किया। प्रथम महायुद्ध की समाप्ति के समय 1918 में पोलैण्ड स्वतंत्र हुआ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पोलैण्ड की सरकार ने रूस निर्मित चर्च गिराया और उसी जगह दूसरे चर्च का निर्माण किया। रूस और पोलैण्ड दोनों ईसाई हैं, तो भी रूसी चर्च क्यों गिराया गया? स्वाभिमानी पोलैण्ड की सरकार का उत्तर था-रूसी चर्च गुलामी का चिह्न था, इसीलिए वह गिराया और अब यह नया चर्च हमारी स्वतंत्रता का प्रतीक है। इसको कहते हैं राष्ट्रीय स्वाभिमान।

हम सब जानते हैं कि 1669 में औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोडा और वहां ज्ञानवापी मस्जिद बनाई। यह समाचार मिलते ही शिवाजी ने औरंगजेब को चेतावनी देने वाला और काशी विश्वनाथ सहित अन्य धर्मस्थान मुक्त करने का संकल्प व्यक्त करने वाला पत्र लिखा था। अपने अन्य सरदार, मंत्रियों के साथ धर्मस्थान मुक्ति की चर्चा छत्रपति शिवाजी करते थे। स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराज ने अनेक मंदिरों का पुनर्निर्माण किया था। वे जब दक्षिण भारत में गए थे तो आज के तमिलनाडु में दो मंदिरों का पुनर्निर्माण किया। कुछ वर्ष पहले दोनों मंदिर गिराकर मुसलमानों ने वहां मस्जिदें बनायी थी। मस्जिदें गिराकर फिर से मंदिर का निर्माण किया गया। सभी मराठा सरदार, पेशवा इस संकल्प पूर्ति के लिए प्रयत्न करते थे। सुप्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग त्र्यम्बकेश्वर, तीर्थ क्षेत्र नासिक स्थित सुंदर नारायण मंदिर, उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर जैसे अनेक मंदिरों का मुगल राज ने विध्वंस किया था। इन मंदिरों का पुनर्निर्माण मराठों ने बाद में किया था।

जब मराठों के विजयी घोड़े उत्तर भारत में दौड़ने लगे तो धर्मस्थान मुक्ति का प्रयत्न प्रारंभ हुआ। सन् 1751 से 1759 में अवध के नवाब को अयोध्या, प्रयाग, काशी की मुक्ति की शर्त लगाकर ही मदद की गयी थी। मराठों का लगातार दबाव रहा था। दुर्भाग्य से पानीपत की सन् 1761 की लड़ाई में हार हुई और काशी, अयोध्या उस समय मुक्त नहीं हो सके।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के चौराहों में, बगीचों में लगी विक्टोरिया रानी और जॉर्ज पांचवें की मूर्तियां हटाई गईं। सड़कों के नाम बदले, दिल्ली का इर्विन अस्पताल जयप्रकाश नारायण अस्पताल बना, मिण्टो ब्रिज को शिवाजी ब्रिज कहने लगे। मुम्बई में विन्सेट रोड डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर रोड हो गया और विक्टोरिया टर्मिनल रेलवे स्टेशन का नाम छत्रपति शिवाजी टर्मिनल हो गया। ये पुराने नाम गुलामी के चिह्न थे इसीलिए हटाए गए।

भगवान श्रीराम भारत की पहचान है, राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं। बाबर विदेशी हमलावर, हमारा शत्रु था। बाबर के संबंध में गुरु नानकदेवजी ने कहा है, बाबर का राज माने पाप की बारात। उस बाबर ने मंदिर तोडा, उस बाबरी ढांचे के लिए चिल्लाना यह अराष्ट्रीयता है। बाबरी ढांचा गुलामी का चिह्न था; राम जन्मभूमि मंदिर यह स्वतंत्रता का चिह्न है। हम राम के भक्त है या बाबर के वारिस यह प्रश्न सबको पूछना चाहिए?

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