Home Hindi दुःख हमें भी होता है; लेकिन हम नकली विक्टिम कार्ड नहीं खेलते

दुःख हमें भी होता है; लेकिन हम नकली विक्टिम कार्ड नहीं खेलते

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दुःख हमें भी होता है; लेकिन हम नकली विक्टिम कार्ड नहीं खेलते

पिछले वर्ष के दिसंबर में जैसे ही सरकार ने नए नागरिकता कानून को जनता के सामने लाकर प्रकट किया, वैसे ही मुझे यह आभास होने लगा कुछ लोगों को इससे बहुत मिर्ची लगने वाली है। ये लोग कौन है यह बात शायद मेरे खयाल में आज सभी लोग जिनकी बुद्घि और विवेक उनके साथ हैं, जानते होंगे। ये वही लोग हैं जिनके वोट बैंक की मशीनरी सिर्फ एक मजहब के लोगों को बरगला के चलती है, या शायद ये कहना भी ठीक होगा कि चलती थी। जब ये लोग स्वयं की सरकार बनाने के सपने को पूरा नहीं कर पाए, तो इन्होंने सोचा कि क्यूं ना कुछ मजहब विशेष के लोगों को बरगला के चलती सरकार को गिरा दिया जाए। परन्तु यदि आप कभी इनसे पूछेंगे की इसी नागरिकता कानून की मांग तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह जी ने भी की थी, तो फिर ये उसका जवाब देने से बचने लगेंगे। इन्हें लोगों को एनआरसी के नाम पर डराना है जिसका अभी तक कोई ड्राफ्ट भी सरकार के पास नहीं है। इन्हें मजहब विशेष के लोगों के मन में डिटेंशन सेंटर का डर भी बैठाना है।

परन्तु यदि कोई कहे की डिटेंशन सेंटर तो आपकी सरकार के अन्तर्गत बनाए गए थे, तो भी ये आपको जवाब देने से बचेंगे। ये सरकार को फासीवादी भी बताएंगे। पर यदि आप इनसे पूछे कि 1984 के सिख विरोधी दंगे और इमरजेंसी किसके कार्यकाल में लगी थी, तो भी इनके पास जवाब नहीं होगा। इनके काले कारनामों के बारे में लिखूंगा तो शायद शब्द ही कम पड़ जाएंगे। खैर, जैसे जैसे ये नागरिकता कानून का विरोध का आग पकड़ता गया, वैसे वैसे ही इन मजहब विशेष के लोगों के मन का हिन्दू विरोध भी बाहर आने लगा। फिर वो चाहे ‘काफिरों से आजादी’ का नारा हो या ‘हिंदुत्व की कब्र’ खोदने का या फिर ‘फॅक हिंदुत्व’ का पोस्टर, इन सभी घटनाओं को देखकर मन की शांति भंग हो गई। मै ये नहीं समझ पा रहा था कि एक कानून के विरोध में किसी एक धर्म विशेष को अपशब्द किसलिए कहे जा रहे हैं। कहीं शाहीन बाग़ में छोटी सी बच्चियां मोदी को हिटलर की मौत मारने की बात कर रही हैं। कहीं जामिया के अधेड़ उम्र के विद्यार्थी एक मजहब विशेष के नारे लगाकर किस बात का विरोध जता रहे है, ये बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी।

थोड़ा शोध किया तो पता लगा कि कैसे कभी हमारे भाई बहनों को कश्मीर से रातों रात अपनी जमीन, घर, बार छोड़कर निकलना पड़ा था। फिर ये भी मालूम पड़ा कि कैसे उस रात मजहब विशेष की इमारतों से यही आजादी के नारे निकले और हमारे भाई बहनों को हथियारों की नोक पर पलायन करने पर मजबूर किया और सेंकड़ों को तो मौत के घाट उतार दिया गया। आज भी कभी पंडित टीका लाल टपलू की कहानी याद करता हूं तो शरीर को मानो सांप सूंघ जाता है। यदि उसी संदर्भ में देखा जाए तो ये आजादी का नारा हिन्दुओं पर एक गाली कि भांति प्रतीत होता है। जब भी कभी टीवी पर इन तथाकित प्रदर्शनकारियों को ये नारा लगाते देखता था तो मन की शांति भंग हो जाती थी। लेकिन ये सब यहीं तक सीमित नहीं था। जब कुछ तथाकथित मीडिया वर्ग के लोगों को इन्हीं प्रदर्शनकारी लोगों का बचाव करते देखता था तो मन में दुःख के साथ क्रोध के भी भाव उत्पन्न होते थे।

जो मीडिया वर्ग कभी अपने निष्पक्ष होने की ताल ठोंकते थे, आज वही मीडिया वर्ग इन अराजक तत्वों का बचाव करने मै लगे थे। फिर मैंने थोड़ी जानकारी जुटाने की कोशिश की तो यह ज्ञात हुआ की खुद हो राजा हरिश्चंद्र जैसा सच्चा और ईमानदार बताने वाले ये बड़े बड़े मीडिया हाउस कभी निष्पक्ष थे ही नहीं। गुजरात दंगो का सच जानने का प्रयास किया तो पता चला कि इन्हीं मीडिया वर्गों का हाथ दंगो को और भड़काने में था। और आज का दिन है, कि मानो इनका ये दोगला चेहरा देखने की आदत सी हो गई है। अब तो इनपर क्रोध भी नहीं आता, बल्कि तरस आता है।

इंसान ना जाने कुछ भौतिक सुखों के लिए किस हद तक गिर सकता है। एक समय तो उस मां पर भी क्रोध आ रहा था जिसने अपने बच्चे को उसी शाहीन बाग़ के प्रदर्शन की भेंट चढ़ा दिया। कभी उस बच्चे के बारे में सोचता हूं तो मैं कांप उठता है। साथ ही मन मस्तिष्क से, यह प्रश्न पूछने लगता है कि आखिर कोई मां ऐसा कैसे कर सकती है। हद तो तब हो गई, जब वह मां कहने लगी कि मेरा बच्चा शहीद हो गया। खैर इन प्रदर्शनों के आगे बढ़ते ही इन लोगों की मंशा साफ जाहिर हो गई। असम को काटकर अलग करने कि बात करने वाले भी इन्हीं प्रदर्शनों से निकले थे। जिन्ना वाली आजादी मांगने वाले भी इन्हीं प्रदर्शनों से निकले थे। ऐसी ना जाने कितनी घटनाएं लोगों ने देखी और समझी। कुछ लोग जिनकी आंखे बंद थी, वो खुल गई और जो जानबूझकर आंखें बंद करके बैठे थे उनके बारे में तो क्या ही कह सकते हैं।

धीरे धीरे ये पता चलने लगा कि ये विरोधी भेड़ की खाल में भेड़िए हैं। हो ना हो ये सारा घटना क्रम कुछ पूर्व सरकारों की एक मजहब विशेष के लोगों को खुश करने को गंदी राजनीति के कारण हुआ गई। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि जैसे ही किसी सरकार ने हिन्दुओं के लिए कुछ करने का प्रयास भी किया, इन्हीं मजहब विशेष के कुछ कट्टर पन्थियों के माथे पर बल पड़ने लगे। साथ ही यह पता लगा कि मनुष्य जीवन में शिक्षा का कितना महत्व है। यदि पूर्व सरकारों ने मजहब विशेष के लोगों को खुश करने की बजाए उन्हें शिक्षित करने का प्रयास किया होता, तो आज वो लोग इसी भेड़चाल में ना पड़कर ईमानदारी से अपना जीवनयापन कर रहे होते। दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों का होना अपने आप में दिल को दुखी कर देता है। जब देश के अलग अलग शहरों में पत्थरबाजी और आगजनी की खबरे सुनता हूं तो लगता है मानो देश में और छोटे छोटे कश्मीर बन रहे हो।

हां। दुःख हमे भी होता है, जब बहादुर सिपाहियो को उन्मादी भीड़ द्वारा मार दिया जाता है
दुःख हमे भी होता है, जब हमारे पूज्य प्रतीक चिन्हों का उपहास उड़ाया जाता है
दुःख हमे भी होता है, जब हमारे भाइयों के हाथ पैर काटकर आग में डाल दिया जाता है
दुःख हमे भी होता है, जब हमारी पूज्य गाय का मजाक उड़ाया जाता है
दुःख हमे भी होता है, कैसे हमारे ही कुछ भाइयों को हमारे खिलाफ कर दिया जाता है
हां! दुःख हमे भी होता है, लेकिन हम नकली विक्टिम कार्ड नहीं खेलते।

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