Tuesday, April 7, 2020
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राजनीति और निर्लज्जता के साहचर्य का सामाजिक विमर्श

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Utkarsh Awasthi
लेखक स्टटिस्टिक्स में परास्नातक एवं पॉपुलेशन स्टडीज में जे.आर.एफ. हैं। राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म, समाज , अध्यात्म एवं साहित्य के अध्येता हैं।

“सारे नियम कानून बस आम लोगों के लिए हैं। नेता, मंत्री, अफसर सब मौज में ही रहते हैं। उनके लिए कोई नियम नहीं होते।”

ये एक सामान्य वाक्य है जो गाहे बगाहे सुनने को मिल ही जाता है। आम तौर नेताओं को गरियाने के साथ विशेष तौर पर स्वयं को दुनिया का सबसे नैतिक इंसान घोषित करने के लिए ये वाक्य एक यह परोक्ष हथियार भी है।

मन्नू भण्डारी का उपन्यास है- ‘महभोज’; उसमें वो लिखती हैं की राजनीति में रहकर नेताओं की खाल गेंडे जैसी हो जाती है। अब प्रश्न उठता है कि ऐसा होता क्यों है?

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नेता लोकतंत्र मे सर्वाधिक नजरों में रहने वाला व्यक्ति होता है। जितनी आलोचना का सामना एक नेता को करना पड़ता है शायद ही किसी और को करना पड़ता हो। फिल्मी सितारों और क्रिकेट खिलाड़ियों के समर्थक अधिकतर आजीवन समर्थक बने रहते हैं। नेताओं को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं होता है। उनके समर्थक विभिन्न कारणों पर निर्भर करते हैं जैसे पार्टी, विचारधारा, जाति, मज़हब,क्षेत्र, ‘अपना फायदा’ इत्यादि। बेहतर कैंडीडेट मिलने पर समर्थक पाला बदलने मे क्षण भर का भी विलंब नहीं करते।

पुनः नेता का एक कठिन काम निर्णय लेना होता है। वैसे टी.एस.ईलियट ने कह ही रखा है कि मनुष्य निर्णय लेने के शापित है, परंतु जब आप का निर्णय बड़े समूह पर प्रभाव डालता है तब सबको प्रसन्न रखना और भी कठिन हो जाता है। किस स्थान पर नई यूनिवर्सिटी खोली जाए, MSP कितना रखा जाए, आरक्षण पर राय क्या रखी जाए जैसे मुद्दे तो बड़ी खाई पैदा करते है। इनमें एक पक्ष बनाम दूसरे पक्ष की बात आ ही जाती है। तो यहाँ पर कितना भी समन्वय बैठाने की कोशिश कर लें विरोध के स्वर आने ही आने हैं।

वैसे ही हाई रिस्क निर्णय का भी हाल है। नोटबन्दी या एयरस्ट्राइक जैसे नए विषय हो या बांग्लादेश के निर्माण व श्रीलंका में शांति के लिए सेना भेजना या फिर नई आर्थिक नीति बनाना; निर्णय लेने वाले को काफी बाद में पता चलता है की उसके निर्णय का परिणाम क्या होगा। अगर एयर स्ट्राइक में भारतीय विमान मार गिराए जाते तो जो घटना अभी मास्टरस्ट्रोक कही जा रही है वही डिजास्टर कही जाती।   

पर आप निर्णय लेने से भाग नहीं सकते। और उसकी समीक्षा से भी बच नहीं सकते। तो सबसे अच्छा है की अपनी चमड़ी मोटी करके बैठो।   

दूसरा ये एक बड़ा मजेदार मुद्दा है की एक ‘आम-जन’ जब अपने किसी काम के लिए नेता के पास जाता है तो वो अपेक्षा करता है कि नेता सारे नियम-कानून तोड़ कर उसका काम करवा दें भले ही विधिक एवं नैतिक रूप से वो कितना गलत क्यों न हो। हाँ, अपने स्वयं के लिए नेता को सभी कानूनों का पालन करना चाहिए। इसी तरह नेता अगर उनके घर में विवाह समारोह में आ रहा है तो सबसे ज़्यादा गाड़ियों के साथ आए और एक मोटी राशि उपहार में दे जाए। ये प्रश्न गौड़ हो जाता है की उसको उसी दिन 50 जगह पर जाना है एवं सभी की आकांक्षाओं को पूरा करना है। और इन सबकी पूर्ति के लिए उसकी सीमित सैलरी की चिंता किसी को नहीं हो सकती। और इस द्वैत से निकलने की उलझन तो  आपकी है ही नहीं।

राजनीतिक भ्रष्टाचार का उद्भव भी कहीं न कहीं समाज की इन्ही अपेक्षाओं से है।

यही काँटा ‘पोलिटिकल इकॉनमी’ की बहस में भी चुभता है। हमको 300-400 रुपये की बिजली-पानी की सब्सिडी भी चाहिए और एक अच्छे प्लान वाले नेता को इतनी छोटी सी घूस के लिए हरा देते हैं। लेकिन साथ ही हम गालियां ये भी देंगे की स्वास्थ्य, शिक्षा, रक्षा, नवाचार आदि पर सरकार खर्च क्यों नहीं कर रही? हमारी सड़कें चमचमाती हुई क्यों नहीं हैं? लोक व्यवस्था चरमराती हुई क्यों है? पब्लिक टॉयलेट साफ क्यों नहीं है?…. या ऐसा बहुत कुछ।

आपको गन्ने की एमएसपी भर-भर कर चाहिए क्योंकि उस फसल में मेहनत कम है और उसके किसानों में एकजुटता भी ज़्यादा है। अगर सरकार हाथ जोड़ रही है की दाल उगा लो, मक्का की खेती कर लो या तिलहन की पैदावार बढ़ाने की जरूरत है। मजाल है की हमसे भिड़ पाएं नेताजी। क्या करना है हमें; चाहे भूजल स्तर गिर रहा हो या मिट्टी की उर्वरता कम हो रही हो। आयात करना किसका काम है इससे तो हमको मतलब ही नहीं है, और उसके आर्थिक नुकसान के झमेले की बात ही न करो। ज़्यादा बोलोगे तो सड़क जाम होगी और चुनाव में सरकार गई समझो।

अब विकल्प क्या है नेता के पास खाल मोती करने के सिवा? क्योंकि आप गरियाओगे उसको ये उसे पता है।

नेताओं का तो व्यक्तिगत जीवन भी नहीं होता। आप का फोन नंबर, बैंक डीटेल, शैक्षिक योग्यता, संपत्ति की जानकारी, परिवार की सूचना या अन्य जानकारी कोई सार्वजनिक कर दे तो आप संभवतः पुलिस के पास पहुँच जाएंगे। नेताओं की ये सारी सूचना तो नामांकन पत्र मे ही लिखी होती हैं जो सार्वजनिक हो जाता है। इतना ही नहीं नेताओ की नितांत व्यक्तिगत जीवन में भी लोगों को संतों सी शुचिता चाहिए; दिग्विजय सिंह ने इस उम्र मे शादी क्यों की? किसी से उस नेता का अफेयर कैसे चल रहा है? प्रधानमंत्री अच्छे कपड़े क्यों पहनता है? उस नेता ने इतना बड़ा घर क्यों बनवाया? बेटे को अमरीका क्यों भेजा? बेटी की शादी दूसरी जाति में क्यों की? अरे भाई, रिश्ता करना हो तब तो देखो ये सब। वरना चाहो तो नीति निर्माण, कर्मठता, समस्या निदान, वैचारिक समर्पण आदि पर परख लो उन लोगों को। बात इतनी ही नहीं है, क्रिकेटर्स और फिल्मी सितारों की गालियों पर ताली पीटने वालों को नेता ऐसा सुशील चाहिए की ऊंची आवाज़ में कभी बात भी न करता हो। लगातार दो वाक्य सही न बोल पाने वाले न्यूज एंकर भी दिन में 12 घंटे बोलने वाले नेता की मुह से निकले एक गलत शब्द का मूल्यांकन ऐसे करेंगे जैसे कालिदास और प्रेमचंद जैसी प्रांजल भाषा उनके कार्यालय के चपरासी भी बोलते हों। 

एक बड़ा पक्ष ये है की नेता समाज के प्रतिनिधि के रूप में केवल वोटों के पैटर्न को नहीं प्रदर्शित करता वरन लोगों की मानसिकता को भी दिखाता है। समाज का सूक्ष्म प्रतिबिंब नेताओं मे मिल जाएगा आपको। समाज की सारी अच्छाइयाँ, बुराइयाँ, अपेक्षाएँ, दृष्टि, महत्वाकांक्षा आदि सब कुछ नेताओं मे दिख जाता है। 

तो जनता जैसी होगी नेता वैसे ही निकल कर आएंगे। हम ट्रैफिक सिग्नल तोड़ेंगे, दारू पी कर गाड़ी चलाएंगे, टैक्स की चोरी करेंगे, ऑफिस देर से जाने के बहाने खोजेंगे, चंद पैसों के लिए दुकान से बिल नहीं बनवाएंगे….… हमारे भ्रष्टाचार की सीमा ही यही है। अब हम में से ही कोई नेता बनेगा तो उसके भ्रष्टाचार कर सकने की सीमा का विस्तार होगा। तो सामाजिक मनोवृत्ति और अपनी शक्ति के अनुपात मे वो वैसा ही भ्रष्टाचार भी करेगा।

हाँ, कई नेता नहीं भटकते हैं। वो नैतिक मार्ग पर ही चलते हैं। क्योंकि ऐसे व्यक्ति समाज में भी होते हैं और ऐसे राजनेता भी समाज में नैतिक लोगों के अनुपात में होंगे।

भारत जैसे देश में तो अपेक्षा का बोझ नेताओं पर इतना है की वो चाहें भी तो वो पूरी तरह से ये बोझ नहीं उठा सकते। और फिर कई की सोच हो जाती है कि जब हर तरह से गाली खानी ही है तो क्यों न जीवन आसान करने के कुछ साधन जुगाड़ लें। समर्थकों या जाति वालों का भला कर दें कि वो साथ देते रहें।

वास्तविकता ये है कि 130 करोड़ का देश कुछ हजार नेताओं से नहीं चलता बल्कि पूरी जनसंख्या की अभिवृत्ति से चलता है। हम जितना कम दोषारोपण करेंगे, जितना अधिक अपने कर्तव्यों पर ध्यान देंगे, छोटे व्यक्तिगत हितों पर बड़े सामाजिक हितों को तरजीह देंगे उतना ही हम शासन व्यवस्था में बैठे लोगों पर दबाव बना पाएंगे की वो भी लाइन पर रहें। और तब ‘कायदे मे रहोगे तो फायदे में रहोगे’ का मैसेज बिना कहे ही ऊपर तक पहुँच जाएगा।

और ये सब नहीं समझ आ रहा तो किसी के नेता बनने पर कोई प्रतिबंध तो है नहीं। आप ‘होलिअर दैन दाउ’ हैं तो उतर पड़िये मैदान में और सब कुछ छोड़कर जनसेवा में लगिये; चुनाव मे भागीदारी कर के दिखा दीजिए और सिखा दीजिए इन सबको की असली नेता कैसा होता है।

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