चिदंबरम और रघुराम राजन के काले कारनामे

रघु राम राजन कांग्रेस सरकार के समय रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर रह चुके हैं. 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आयी तो उसने भी राजन को काफी समय तक गवर्नर बनाये रखा. राजन के कारनामे हालांकि ऐसे थे, जिसकी वजह से उन्हें मई 2014 में ही धक्के मारकर आर बी आई से बाहर निकाल देना चाहिए था. राजन अपने काले कारनामों से अनजान नहीं थे इसलिए जैसे ही मोदी सरकार ने उन्हें आर बी आई से बाहर का रास्ता दिखाया, वह तुरंत देश छोड़कर भाग खड़े हुए.

आइए अब समझते हैं उन काले कारनामों के बारे में जिन्हे चिदंबरम और रघु राम राजन ने मिलकर अंजाम दिया था. 16 मई 2014 को लोकसभा चुनावों के नतीजे आ चुके थे और मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल चुका था. उस समय तक देश में कांग्रेस की सरकार थी, चिदंबरम वित्त मंत्री और राजन रिजर्व बैंक के गवर्नर थे. कायदे से 16 मई 2014 के दिन से ही कांग्रेस सरकार को कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं लेना चाहिए था लेकिन ठीक उसी दिन चिदंबरम ने “20:80 गोल्ड स्कीम” का प्रस्ताव रघुराम राजन को भेजा जिस पर राजन ने अपनी सहमति जताई और “20:80 गोल्ड स्कीम” का आर्डर चिदंबरम ने 21 मई को जारी भी कर दिया. यह “20:80 गोल्ड स्कीम” का आर्डर पी एन बी बैंक घोटाले के अपराधी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी को फायदा पहुंचाने के लिए चिदंबरम और राजन की मिलीभगत से उस समय किया गया था, जब कांग्रेस सरकार 2014 के लोकसभा चुनावों में बुरी तरह हारकर सत्ता से बाहर हो चुकी थी.

नीरव मोदी और मेहुल चौकसी ने इसी आर्डर के सहारे 12000 करोड़ के पी एन बी बैंक घोटाले को बखूबी अंजाम दिया और जैसे ही मोदी सरकार ने इसका पर्दाफाश किया,देश छोड़कर भाग खड़े हुए.

रघुराम राजन को कांग्रेस सरकार ने नियुक्त किया था और उनका कार्यकाल 2016 में ख़त्म होना था. मोदी सरकार ने किसी विवाद में पड़ने की वजाये राजन को अपना पूरा कार्यकाल ख़त्म करने दिया लेकिन उस समय भी कांग्रेस यह शोर मचा रही थी क़ि राजन जैसे “काबिल अर्थशास्त्री” को मोदी सरकार एक्सटेंशन क्यों नहीं दे रही है. ज़ाहिर है क़ि राजन जब तक आर बी आई में रहते, कांग्रेस के दुष्कर्मों पर पर्दा डाले रहते लेकिन राजन के जाने के बाद जब 12000 करोड़ के पी एन बी घोटाले के खुलासा हुआ और उसकी जांच की गयी तो यह बात सामने आयी क़ि यह सारा खेल कांग्रेस,चिदंबरम और राजन ने मिलकर उस समय खेला था जब उन्हें कोई बड़ा नीतिगत फैसला लेने का अधिकार ही नहीं था. 21 मई 2014 को चिदंबरम ने यह आदेश पास करके राजन को भेज दिया था और 23 मई 2014 को मोदी सरकार ने कार्यभार संभाल लिया था. अगर यह आदेश राजन की सहमति से नहीं हुआ था या उन्हें लगता था क़ि यह गलत हुआ है तो उन्हें नयी सरकार के वित्त मंत्री से अपनी आपत्ति दर्ज़ करानी चाहिए थी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और जब उनकी, चिदंबरम और कांग्रेस सरकार की काली करतूतों के खुलासा मोदी सरकार के सामने हुआ तब तक राजन देश छोड़ चुके थे, चिदंबरम अन्य मामलों में “जेल” से बचने के लिए “बेल” पर “बेल” लिए जा रहे थे और कांग्रेस के युवराज किसी तरह यह साबित करने में लगे हुए थे क़ि इस घोटाले के लिए और नीरव मोदी और मेहुल चौकसी को देश से भगाने के लिए भी मोदी सरकार ही जिम्मेदार है.

विदेश में रहते हुए राजन मोदी सरकार के हर अच्छे काम की आलोचना करते रहे चाहे वह नोटबंदी हो या जी एस टी का ऐतिहसिल फैसला. राजन आलोचना इस लिए कर रहे थे क्योंकि उससे उन्हें दोहरा फायदा हो रहा था. एक तो आलोचना करके वह कांग्रेस को फायदा पहुंचाने का काम कर रहे थे , दूसरा फायदा यह था क़ि जब कभी भी सी बी आई उनके काले कारनामों के लिए उन्हें पकडे तो वह यह कह सकें क़ि क्योंकि मैं मोदी सरकार की नीतियों का आलोचक था, इसलिए मेरे साथ मोदी सरकार यह बदले की कार्यवाही कर रही है. अप्रैल २०१८ में सी बी आई ने राजन के खिलाफ इस मामले में जांच भी शुरू कर दी और उस जांच के पूरा होने पर राजन क्या अपने मालिक चिदंबरम की तरह जेल पहुंचेंगे या फिर कोई और नयी चाल चलकर जेल जाने से बच पायेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा.

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