Thursday, October 1, 2020
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मसला-ए-कश्मीर

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कश्मीर-समस्या के हल के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि हल तो तब निकलेगा जब समस्या की असली पहचान कर ली जाय। सरकारें अभी तक इस समस्या से निपटने के नाम पर बिना किसी ठोस योजना या उम्मीद के बड़े-बड़े आर्थिक पैकेज देने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकी हैं। इससे भी इस सम्भावना को बल मिलता है कि कहीं हम समस्या को परिभाषित करने में ही तो गलती नहीं कर रहे!

प्रस्तुत लेख कश्मीर-समस्या को समझने का एक प्रयास है। समाधान की चर्चा फिर कभी की जायेगी।

मोटे तौर पर कश्मीर की समस्या यह है कि महाराज हरि सिंह के जम्मू-कश्मीर राज्य के तीन टुकड़े हो चुके हैं: सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला टुकड़ा भारत के पास है जिसमें लगभग 70% जम्मू क्षेत्र, 50% कश्मीर घाटी, और लगभग पूरा लेह-लद्दाख का क्षेत्र शामिल है। उससे छोटा टुकड़ा जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 37% है, पर पाकिस्तान का कब्जा है, और शेष 16% पर चीन का कब्जा है जिसका एक भाग पाकिस्तान ने चीन को भेंट कर दिया है।

महाराज हरि सिंह द्वारा लिखे गये राज्य-हस्तांतरण पत्र के अनुसार भारत पूरे राज्य को अपना अंग मानता है। भारत के दृष्टिकोण से कश्मीर-समस्या तब हल होगी जब पाकिस्तान और चीन के कब्जे वाले क्षेत्रों पर भी भारत का कब्जा हो जाय। इस लक्ष्य की प्राप्ति एक भीषण युद्ध के बिना संभव नहीं है- या फिर भारत अपनी सैन्य-शक्ति इतनी बढ़ा ले कि पाकिस्तान और चीन डर के मारे खुद ही अपने-अपने हिस्से भारत के नाम लिख दें। अतः कश्मीर की वृहत्तर समस्या का केवल सैनिक समाधान ही हो सकता है, कोई अन्य नहीं।

अब इस वृहत्तर समस्या के अंदर भी एक समस्या है जो इतनी जटिल है कि हममें से अधिकांश लोग उसे ही कश्मीर-समस्या मानते हैं। समस्या यह है कि कश्मीर घाटी जो भारतीय जम्मू कश्मीर राज्य के कुल क्षेत्रफल की मात्र 16% है, और जहाँ राज्य की जनसंख्या के लगभग 57% लोग रहते हैं, और जहाँ की आबादी लगभग 97% मुस्लिम है, के लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते। ऐसा तब है जब जम्मू-कश्मीर भारत के समृद्धतम राज्यों में है जहाँ प्रति व्यक्ति केंद्रीय सहायता किसी अन्य राज्य के मुकाबले लगभग दस गुनी है, अतः घाटी के निवासियों की भारत से अलग होने की सदिच्छा को वहाँ की बेरोजगारी और विकास की कमी से जोड़ना केवल और केवल दुराग्रह है। भारत के लिए समस्या यह है कि वह कश्मीरियों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उन्हें अपनी ज़मीन के साथ भारत से अलग नहीं होने दे सकता: कश्मीर को उसे अपने साथ रखना ही होगा चाहे इसका मतलब समूची घाटी को सेना के बूटों तले रौंद डालना ही क्यों न हो, और चाहे इसके खिलाफ़ शेष भारत सहित विश्व के सेकुलर नेता कितना भी शोर मचाते रहें क्योंकि कश्मीर भारत से अलग होने वाला पहला राज्य होगा, आखिरी नहीं। भारत कश्मीर को नहीं छोड़ सकता क्योंकि कश्मीर के अलग होते ही अलग होने वालों की लाइन लग जायेगी।

यह तो समस्या का लक्षण हुआ; अब मूल समस्या पर आते हैं। यह ऊपर कहा जा चुका है कि कश्मीरियों की भारत से अलग होने की सदिच्छा का ठीकरा वहाँ की आर्थिक स्थिति पर नहीं फोड़ा जा सकता। इसके बाद अब एक ही चीज़ बचती है जो कश्मीर को शेष भारत से अलग करती है, वह है-इस्लाम। इस्लाम, जो अरब राष्ट्रवाद के अतिरिक्त अन्य किसी राष्ट्रवाद को मान्यता नहीं देता (कृपया देखें-अनवर शेख कृत इस्लाम: अरब साम्राज्यवाद पृष्ठ 88-89 तथा अली मुहम्मद नक़वी कृत Islam and Nationalism का सातवाँ अध्याय), इस्लाम जो अपने अनुयायियों से यह अपेक्षा करता है कि वह किसी ग़ैर इस्लामी हुक़ूमत में शांति से न रहें-पहले उसे दार उल हरब (युद्ध का क्षेत्र) और उसके बाद उसे दार उल इस्लाम बना देने तक संघर्ष करते रहें- (इसी का नाम जेहाद है) कृपया देखें-जस्टिस मुनीर कमिटी रिपोर्ट के पृष्ठ 221-223), कश्मीरियों को भी भारत से अलग होने की प्रेरणा देता है। निस्संदेह पाकिस्तान का पड़ोस में होना भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, पर वह केवल इस्लाम की शिक्षाओं को घाटी के लोगों तक पहुँचाता है जिसके कारण सीधे-सादे और शांतिपूर्ण जीवन के हिमायती (जो मनुष्य की एक स्वाभाविक वृत्ति है) मुसलमान भी सच्चे मुसलमान बनकर जेहाद में हिस्सा लेने में गौरव का अनुभव करने लगते हैं, पर अलगाववाद की मूल प्रेरक शक्ति तो इस्लाम ही है। इस्लाम के अनुयायियों की जम्मू क्षेत्र में भी आबादी लगभग 33% है, जो अनुकूल वातावरण मिलते ही अपने कश्मीरी सहधर्मियों का साथ देकर जम्मू क्षेत्र को भी अपने साथ ले उड़ने को तैयार हैं, मीरपुर के हत्याकाण्ड में जिसमें पाकिस्तानी सेना के द्वारा एक दिन में लगभग 15000 लोग मार डाले गये थे, में हम ऐसा देख चुके हैं जिसमें स्थानीय मुसलमानों ने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर जमकर बवाल काटा।

जब तक इस्लाम को कश्मीर-समस्या के मूल के रूप में चिह्नित कर विचारधारा के स्तर पर उससे निपटने की नीति नहीं बनायी जाती, लाखों करोड़ के आर्थिक पैकेज बाँटने से कुछ नहीं बदलेगा।

हमने देखा कि कश्मीर की समस्या का प्राथमिक लक्षण यह है कि घाटी ले लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते। इसका मूल कारण इस्लाम को बताया गया। प्रश्न उठता है कि अगर इस्लाम कश्मीरियों के भारत में न रहने की इच्छा के लिए जिम्मेदार है, तो इस्लाम तो भारत के अन्य प्रान्तों में भी है। क्या अन्य प्रान्तों के इस्लाम मतावलम्बी भी भारत के साथ नहीं रहना चाहते? फिर और लोग भी हैं जो भारत के साथ नहीं रहना चाहते। उनकी चर्चा किये बिना कश्मीर-समस्या पर चर्चा अधूरी ही रहेगी।

पहले इस सवाल को लेते हैं: अगर इस्लाम अपने अनुयायियों को गैर-इस्लामी मुल्क में शांति से न रहने की शिक्षा देता है, तो क्या कश्मीर से इतर प्रांतों में रहने वाले इस्लाम मतावलम्बी भी भारत के साथ नहीं रहना चाहते? प्रश्न जटिल है, और इसके कई उत्तर हो सकते हैं। गणित का विद्यार्थी इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हर राज्य के लगभग १०% इस्लाम मतावलम्बियों के रैंडम सैंपल से उनके भारत के साथ रहने की इच्छा/ अनिच्छा पर कुछ प्रश्न करना चाहेगा, और उनके उत्तरों पर लीनियर रिग्रेशन एनालिसिस के बाद ही वह कह सकेगा कि कितने प्रतिशत इस्लाम मतावलम्बी भारत के साथ रहना चाहते हैं, बशर्ते कि सैंपल में शामिल व्यक्तियों ने पूछे गये प्रश्नों के सही उत्तर दिये हों। एक नेता के लिए इस प्रश्न का उत्तर देने में कोई झंझट ही नहीं है: बिना किसी अध्ययन के वह पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता है: भारत के सभी मुसलमान देशभक्त हैं! इस प्रकार के उत्तरों को ‘राजनीतिक सत्य’ (political truth) कहा जाता है, जो इस बात का द्योतक है कि यही कहा जाना चाहिए यद्यपि यह सत्य नहीं है। फिर सत्य क्या है?

अब सत्य का अनुसन्धान नेताओं की तर्ज पर तो हो नहीं सकता। कुछ भी बोल दिया जाय, और उसी को बार-बार दुहरा कर जनता को उसे सत्य मानने पर मजबूर कर देने की बाजीगरी एक या दो चुनावों में विजय दिलाने में तो सहायक हो सकती है, पर एक गंभीर समस्या के स्थायी समाधान के उद्देश्य से समस्या को परिभाषित करने के लिए इस तरकीब का इस्तेमाल किया जाय, तो यह तो धोखाधड़ी ही होगी। सत्य ऐसा हो जो कम से कम सत्य जैसा लगे, और जिसके लिए अगर प्रत्यक्ष नहीं तो अनुमान या आगम प्रमाण तो उपलब्ध हों!

तो सत्य यह है कि इस्लाम की गैर इस्लामी हुक़ूमत में शांति से न रहने की शिक्षा के बावजूद अगर देश के कश्मीर घाटी से इतर भागों में इस्लाम मतावलम्बी गैर इस्लामी धर्मों के अनुयायियों के साथ शान्ति से रहते दीखते हैं, तो केवल इसलिए कि उनके लिए जिहाद की खुलेआम घोषणा कर देने के उस प्रकार के अवसर नहीं हैं, जो कश्मीरियों को पाकिस्तान के पड़ोस में रहने और घाटी से गैर इस्लामी जनसंख्या के लगभग पूर्ण सफाये के कारण उपलब्ध हैं। सही अवसर मिलने पर शेष भारत के इस्लाम मतावलंबी भी जेहाद में भाग लेकर अपने को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे, अकबरुद्दीन ओवैसी और इमरान मसूद जैसे कम से कम हज़ारों की ताली पीटती भीड़ के सामने दिये गये हिंसक बयान, डॉ ज़ाकिर नायक के आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ते हुए दिये गये भड़काऊ बयान, और आज़म ख़ान को सीधे-सीधे भारत माता को डायन बताने वाले बयान इसके आगम प्रमाण हैं, और 1948-49 की भिम्बर और मीरपुर की घटनाएं, 1946-47 की कलकत्ता और नोआखाली की घटनाएं, और उसके भी पहले मोपला की घटनाएं, जिसमें अपने इस्लाम मतावलम्बी पड़ोसियों की योजनाओं से अनभिज्ञ अन्य धर्मावलम्बी गाजर-मूली की तरह काट डाले गये थे, इसके अनुमान प्रमाण हैं, और देश के विभिन्न क्षेत्रों में यदा-कदा दिख जाने वाले पाकिस्तानी झण्डे इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

इस्लाम मतावलम्बियों साथ अन्य वर्ग भी हैं जो इस देश की परम्परागत हिन्दू धर्म को मानने वाली और बहुसंख्या में न होने के बावजूद अभी तक इस देश की नीति-निर्धारक रही आबादी से इतनी तीव्र घृणा रखते हैं जितनी शायद इस्लाम मतावलम्बी भी नहीं करते, और मजबूरी में इस देश में बने हुए हैं। उनकी ओर से अगर देश से अलग होने की आवाज़ें इतनी तीव्रता से सुनायी नहीं देतीं, तो इसका कारण यह है कि वह मूलतः हिंसक नहीं हैं, और कम से कम अभी तलवार के ज़ोर से अलग हो जाने में सक्षम नहीं हैं, पर देश के अगड़ी जाति के हिंदुओं से उनकी घृणा इतनी तीव्र है कि अगर इस युग में भी शाप और आशीर्वाद फलित होते, तो सारे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कब के जल कर भस्मीभूत हो गये होते। घृणा के पोषक इस वर्ग का नाम दलित है। बाबासाहेब अम्बेडकर इनके भगवान हैं जिन्होंने कभी इनके लिए अलग अछूतिस्तान की माँग की थी, और महाप्राण जोगेंद्र नाथ मण्डल और पेरियार इनके पैगम्बर हैं। ज्ञातव्य है कि जोगेंद्र नाथ मण्डल की पाकिस्तान के निर्माण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी, और वह पाकिस्तान की पहली सरकार में कानून-मन्त्री भी बने।

कश्मीर की समस्या अगर भारत में न रहने के इच्छुक लोगों का भारत में एकीकरण है, तो दलित वर्ग के भी एकीकरण के बिना भी इस समस्या का समग्र समाधान नहीं खोजा जा सकता। कश्मीर की समस्या का हल खोजने वालों को इस सवाल का उत्तर खोजना होगा कि आखिर लोग भारत के साथ क्यों नहीं रहना चाहते।

इस सवाल का एक उत्तर तो यह है कि भारतीय राज्य-तन्त्र समस्याओं की सही पहचान करने में ही अनिच्छा का प्रदर्शन करता रहा है, जिसका कारण है राज्य का पर्याप्त शक्तिशाली न होना। पर्याप्त शक्ति के न होने के कारण हमारी सरकारों को यह विश्वास ही नहीं हो पाता कि समस्याओं की वास्तविक पहचान कर लेने के बाद उनसे सीधे टकरा जाने में वह सक्षम भी हैं।
सारांश यह है कि कश्मीर की समस्या के दो आयाम हैं:
1. कश्मीर घाटी के लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते जिसका मूल कारण है-इस्लाम, और
2. भारतीय राज्य का पर्याप्त शक्तिशाली न होना जिसके कारण वह समस्या की सही पहचान करने में भी डरता है।

इति वार्ताः।

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