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2019 का युद्ध

2019 का युद्ध

भारत की जनता युद्ध चाहती है, मैं भी चाहता हूँ और सरकार भी चाहती है। लेकिन क्या 2019 का युद्ध सिर्फ मैदान में लड़ा जाएगा? गोले, बारूद, असलहों से? या मिसाइल से, परमाणु बमों से, ड्रोन से। युद्ध किस स्तर पर होगा ये निर्णय सरकार कर सकती है। निश्चित तौर पर अगर सरकारी मशीनरी ईमानदार है तो वो भी पुलवामा का बदला लेने की सोच रहे होगी। क्या इस हमले का जवाब भी सर्जिकल स्ट्राइक है! या उससे कहीं आगे, सीमा पर या पाक अधिकृत कश्मीर में सेना द्वारा विशेष ऑपरेशन या अभियान चला कर आतंकवादियों को खत्म करने प्रयास किया जाएगा।

मुझे लगता है ये सारे तरीके पुराने हैं, आजमाये हुए है और नतीजा आज आपके सामने है। मसला बातचीत से हल नहीं हो सकता ये पहले से ही सिद्ध है। तो क्या सरकार पाकिस्तान को किसी और रूप से क्षति पँहुचा सकती है! ये मुद्दा विचारणीय है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान की जनता क्या चाहती है ? उधर पाक सरकार सफाई दे रही है कि पाकिस्तान ऐसा क्यों करेगा। आइये देखते हैं।

अभी-अभी पाकिस्तान में सत्ता पलट हुआ है। नई सरकार आई है, नया भरोसा है, नया जोश है। लेकिन पाकिस्तान वही पुराना पाकिस्तान है। पाकिस्तान में अशिक्षा है, गरीबी है, हद से ज्यादा भ्रष्टाचार है। बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। और इन सबके लिए पाकिस्तान के खजाने में पैसा भी नहीं है। सीधे-सीधे कहें तो पाकिस्तान आज एक दिवालिया मुल्क है।

पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान अमेरिका के बेलआउट पैकेज पर पलता आया था और यही कारण था कि पाकिस्तान की सरकार, वहाँ का केंद्रीय बैंक, पाकिस्तान के लिए विकास के रास्ते नहीं तलाश सके। पाकिस्तान का केंद्रीय बैंक वहाँ के बैंकों को दिशानिर्देश जारी नहीं कर सकी। वहाँ की जनता ने बिना नियंत्रण के विदेशों से कैपिटल एकाउंट ट्रांसेक्शन किये। और अंत में पाकिस्तान एक्सपोज़ हो गया।

कई बार हम पाकिस्तान के लोगों को, वहाँ की सरकार को मानसिक रूप से दिवालिया मानते रहते हैं पर सच्चाई यह है कि वो आर्थिक रूप से दिवालियापन के शिकार है। मुल्क के लिए नीति निर्धारण का रास्ता बंद हो चुका है। पाकिस्तान पर वर्तमान में इतना ज्यादा कर्ज़ है कि उसके ब्याज और इंस्टॉलमेंट के लिए भी वो नए कर्ज़ पर निर्भर है। वह बार-बार आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) के पास जा कर बेलआउट पैकेज की मांग करता है। कुल मिला कर पाकिस्तान वो कर्ज़खोर मुल्क है, जिसकी पूरी आय मुल्क के कर्ज़ों का ब्याज भरने में भी सक्षम नहीं है। पाकिस्तान भारी इकोनॉमिक क्राइसिस से जूझ रहा है।

इस क्राइसिस के वक्त उसके पुराने साथी अमेरिका ने हाथ खींच लिया है। अमेरिका की पाकिस्तान से दूरी का मुख्य कारण भारतीय विदेश नीति की सफलता और दक्षिणी एशिया में भारत के एक कद्दावर अर्थव्यवस्था में स्थापित होना है। उधर भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी चीन विश्व व्यापार में अपनी धाक जमाने के लिए भारत को कमज़ोर करने का प्रयास करता रहता है और इस क्रम में दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है वाली सिद्धांत से पाकिस्तान का मित्र बना हुआ है।

ये मदद चीन का स्वार्थ है। पाकिस्तान की जमीन पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कर चीन को विदेशी व्यापार को बढ़ाना उसका एक मात्र लक्ष्य है। पाकिस्तान के पास चीन के भीख के अलावा कोई ऑप्शन अवेलेबल नहीं। साथ ही पाकिस्तान की करेंसी भी एक डिरेग्युलेटेड एवं कमज़ोर करेंसी है, जिसका विश्व मानचित्र में कोई स्थान नहीं है। कुल मिला कर आतंकवाद पाकिस्तान और पाकिस्तानी सरकार की मजबूरी बन चुका है। पाकिस्तान की अवाम इसी दहशतगर्दी की शर्त पर रोटी खा रही है। सरकार के पास सिवाय मानव एवम गदहा के कोई संसाधन शेष नहीं है। इसलिए वे इन दोनों को ही एक्सपोर्ट कर पा रहे हैं। पाकिस्तान में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नाम पर लॉलीपॉप है। एक तर्क यह भी है कि भारत में फैलाया जाने वाला आतंकवाद पाकिस्तान से ज्यादा चीन प्रायोजित है। और पाकिस्तान एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

अब बताइये ऐसे में भारत की सरकार को किस प्रकार का यद्ध शुरू करना चाहिए? निश्चित रूप से पाकिस्तान की आर्थिक हालत को बद से बदतर बनाना ही इक्कीसवीं सदी का युद्ध कहलायेगा। और ये युद्ध शुरू हो चुका है। पाकिस्तान के साथ व्यापार के नियमों को सख्त कर सरकार ने पहले ही अपनी मंशा जाहिर कर दी है। प्रतिदिन पाकिस्तान का एक्सपोर्ट किया जाने वाला माल सीमा से लौट कर वापस जा रहा है, पाकिस्तान प्रतिदिन करोड़ों का नुकसान झेल रहा है। मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन का दर्जा हटा कर व्यापार में पक्षपात का रास्ता सरकार ने पुलवामा के अगले दिन ही खोल लिया है।

वित्त मंत्रालय एवं एफआईयू-इंडिया एफएटीएफ से पाकिस्तान के टेरेरिस्ट फंडिंग में संलिप्तता के आधार पर उसे हाई रिस्क कंट्री घोषित कराने में लगा हुआ है। इसके बाद पाकिस्तान के विदेशी व्यापार पर बड़ा असर पड़ेगा और पाकिस्तान की रही-सही आमदनी भी जाती रहेगी। आशियान देश जिससे पाकिस्तान का अधिकतम व्यापार संबंध है, भारत के दबाव में सीमित व्यापार के लिए मजबूर हो रहे हैं। अफगानिस्तान में भारतीय निवेश एवं आतंकवाद से लड़ने में भारत की मदद की बदौलत पाकिस्तान का निकटतम पड़ोसी उसके खिलाफ खड़ा है। इस समय अमेरिका भारत से नजदीकियों के चलते वर्ल्ड बैंक एवं आईएमएफ़ से भी पाकिस्तान की मदद राशि को कम-से-कम रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

आज भारत सरकार ने पानी के लिए भारतीय नदियों पर आश्रित पाकिस्तान का राह और कठिन कर दिया है। कूटनीतिक रूप से पाकिस्तान को विश्व भर में डिफेम कर हमारे लोग और हमारी सरकार पाकिस्तान की वैश्विक रेटिंग और नीचे ले जा रही हैं। ऐसे में पाकिस्तान के पास चीन ही एक मात्र सहारा है। जो अपने स्वार्थ सिद्धि से ज्यादा मदद पाकिस्तान की कभी नहीं करेगा। धीरे-धीरे पाकिस्तान की जनता संसाधन, खाद्यान्नों की कमी और अधिकतम बेरोज़गारी से तंग आ कर सरकार के विरुद्ध सड़कों पर आ जायेगी। भूख के आगे कोई नहीं दिखता, पाकिस्तान अपने कदम पीछे खिंचेगा और इतना पीछे की फिर उसे अगला कदम पचास साल बाद भी नहीं आ सकेगा।

इधर हमारे हैकर्स भी लगातार पाकिस्तान सरकार की कार्यप्रणाली और सरकारी वेबसाइटों पर हमले कर रहे हैं। यह कदम भी युद्ध का ही एक रूप है। 21वीं सदी में साइबर युद्ध की भी अपनी पहचान है। तो देशवासियों युद्ध आरम्भ हो चुका है। जरूरी नहीं कि ये मिसाइल, तोप, परमाणु बम से ही लड़ा जाए। ये युद्ध का आरंभ है और ये आरम्भ है प्रचण्ड। देखते रहिये आगे होता है क्या।

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