आलोक वर्मा: सीबीआई निदेशक

आलोक वर्मा अपने कैरियर में अवश्य एक निष्कलङ्क अधिकारी रहे होंगे। यह तो एक सर्वमान्य तथ्य है कि सन्दिग्ध सत्यनिष्ठा वाला व्यक्ति सीबीआई का निदेशक बन ही नहीं सकता। तो सीबीआई के निदेशक बनने तक आलोक वर्मा एक सत्यनिष्ठ अधिकारी थे। फिर दो सालों में ऐसा क्या हो गया जिसके कारण उनको अत्यन्त अपमानजनक परिस्थितियों में सीबीआई से हटना पड़ा? क्या सीबीआई में जाने के बाद वह अचानक बेईमान हो गये?

यही बात राकेश अस्थाना के लिए भी सही है। आलोक वर्मा जहाँ अपना सेवाकाल लगभग पूर्ण करने के बाद एक उच्चाधिकारप्राप्त समिति द्वारा चयनित होने के बाद सीबीआई में गये, वहाँ राकेश अस्थाना भी गुजरात काडर में उत्कृष्ट सेवाएं देने के बाद एक अन्य समिति द्वारा सीबीआई में सेवा के लिए चयनित किये गये। यद्यपि राकेश अस्थाना को सीबीआई में सेवा के लिए उपयुक्त बताने वाली समिति में मुख्य न्यायाधीश और नेता-प्रतिपक्ष जैसी हस्तियाँ सम्मिलित नहीं थीं, पर उत्कृष्ट सेवा और दोषमुक्त चरित्रपंजिका वहाँ भी चयन की आवश्यक शर्त थी।

तो दो साल पहले तक आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना दोनों ही कर्तव्यनिष्ठ और असंग्दिध सत्यनिष्ठा वाले अधिकारी थे, फिर अचानक क्या हुआ कि दोनों की सत्यनिष्ठा संदिग्ध हो गयी और आलोक वर्मा को तो अपमानित होकर सीबीआई से हटना पड़ा?

इस मामले में सबसे सेकुलर थ्योरी तो यह है कि राकेश अस्थाना गुजरात काडर से आने के कारण मोदी के आदमी थे (और हैं), और मोदी उन्हें सीबीआई का प्रमुख बनाना चाहते थे। इसके लिए दिसम्बर २०१६ में जब अनिल सिन्हा सीबीआई के निदेशक थे, उनके पदमुक्त होने से मात्र दो दिन पहले सीबीआई में तत्कालीन विशेष प्रमुख रूपक कुमार दत्त, जो निदेशक-पद के स्वाभाविक दावेदार थे, का गृह मन्त्रालय में तबादला कर दिया गया, और अनिल सिन्हा के सेवा-निवृत्त होने के बाद राकेश अस्थाना जो उस समय संयुक्त निदेशक के पद पर थे, को अस्थायी तौर पर सीबीआई का प्रमुख बना दिया गया।

राकेश अस्थाना उस समय सीबीआई-प्रमुख होने की पात्रता नहीं रखते थे, और बाद में जब निदेशक के चयन हेतु चयन समिति जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा नेता-प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश सदस्य होते हैं, की बैठकें हुईं, तो उम्मीदवारों में राकेश अस्थाना का दूर-दूर तक कहीं नाम नहीं था। जिन नामों पर विचार किया गया, उसमें एक नाम आलोक वर्मा का भी था, जो उस समय दिल्ली के पुलिस-प्रमुख थे। समिति ने तीन नामों पर विचार किया। प्रधानमन्त्री जिसको पसन्द कर रहे थे, खड़गे जी उसके विरुद्ध थे, और खड़गे जी की पसन्द प्रधानमन्त्री को नापसन्द थी; ऐसे में मुख्य न्यायाधीश महोदय ने बीच का रास्ता सुझाया, और आलोक वर्मा जी के नाम पर दोनों नेताओं से सहमत होने का आग्रह किया। प्रधानमंत्री ने मजबूरी में हामी भर दी। इसके बाद खड़गे जी ने विपक्षी दल से होने के कारण औपचारिकताओं का पालन करते हुए अपना विरोध दर्ज किया, पर मुख्य न्यायाधीश के समझाने से मान गये, और इस प्रकार आलोक वर्मा सीबीआई के निदेशक बन गये।

यह बात राकेश अस्थाना को पसंद नहीं आयी। उन्हें प्रमुख पद की आदत पड़ गयी थी, और किसी और के अपने सिर पर बैठ जाने से उनकी स्वतंत्रता में विघ्न पड़ गया। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि सीबीआई का सरकार से सम्पर्क का एकमात्र सूत्र निदेशक ही होता है, और सरकार अपने सभी नीति-निर्देश निदेशक के माध्यम से ही सम्प्रेषित करती है। निदेशक के अस्थायी पद पर रहते हुए राकेश अस्थाना सरकार द्वारा बुलायी गयी बैठकों में सम्मिलित होते थे, और नये निदेशक के आ जाने के बाद बिना उनकी सहमति के राकेश अस्थाना को इन बैठकों में जाने का कोई अधिकार नहीं था, और सरकार को भी निदेशक महोदय की अनुपस्थिति में भी सीधे राकेश अस्थाना को बैठकों में आमंत्रित करना नहीं चाहिए था, पर ऐसा होता रहा, और आलोक वर्मा को लगा कि उन्हें सरकार के निर्देश राकेश अस्थाना के माध्यम से मिल रहे हैं। अब यह पता नहीं है कि इस बात को लेकर उन्होंने सरकार से कोई औपचारिक विरोध दर्ज कराया या नहीं, पर राकेश अस्थाना उन्हें अपने सबसे बड़े शत्रु लगने लगे; उन्होंने राकेश अस्थाना को अपनी औकात बताने का फ़ैसला कर लिया।

आलोक वर्मा ने राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ कुछ शिकायतें दर्ज करायीं, और उनकी जाँचें शुरू करा दीं। इस बीच राकेश अस्थाना के विशेष निदेशक पद पर पदोन्नति का मामला आया। सामान्यतया ऐसे किसी पद पर प्रोन्नति के लिए सीवीसी की सहमति आवश्यक होती है, और सीवीसी किसी ऐसे व्यक्ति की प्रोन्नति पर सहमति नहीं देता जिसके ख़िलाफ़ कोई जाँच चल रही हो, पर राकेश अस्थाना की प्रोन्नति पर सीवीसी सहमति दे दी, और आलोक वर्मा की आपत्ति के बाद भी राकेश अस्थाना विशेष निदेशक बन गये। इस पर प्रशांत भूषण, जो चाहते हैं कि सरकार उनसे पूछे बिना कोई निर्णय न ले, सुप्रीम कोर्ट गये, पर अदालत ने उनकी आपत्तियों का कोई संज्ञान नहीं लिया, और राकेश अस्थाना की प्रोन्नति को वैध ठहराया। अब आलोक वर्मा का अस्थाना पर क्रोध सभी सीमाओं के पार निकल गया, और विवेक ने उनका साथ छोड़ दिया; उन्होंने अस्थाना के ख़िलाफ़ एफ़आइआर दर्ज करा दी। इस बीच अस्थाना ने अपने बचाव में आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ शिकायत करना शुरू किया, और सीवीसी और काबीना-सचिव ने न्याय की गुहार लगायी। दोनों अफ़सर अब सीधे-सीधे श्रीलाल शुक्ल जी की शब्दावलि में कुकुरहाँव पर उतर आये थे। सीबीआई के कपड़े सरेआम फींचे जा रहे थे।

वर्माजी का कार्यकाल १ फ़रवरी २०१९ को समाप्त होने वाला था, और सरकार शायद यह सोच रही थी कि वर्माजी सीबीआई और सरकार दोनों की छवियों को अधिक नुक्सान पहुँचाये बिना रिटायर हो जाएंगे, और उसके बाद मामला अपने आप ठण्डा पड़ जाएगा, पर वर्माजी आर-पार की लड़ाई के मूड में आ चुके थे। उनकी एफ़आईआर में उल्लिखित नामों में एक नाम रॉ के अधिकारी सामन्त गोयल का भी था जो राकेश अस्थाना के बैच के आईपीएस अधिकारी हैं, यद्यपि उनके ऊपर कोई आरोप नहीं लगाया गया। इस प्रकार जब उनके और अस्थाना के झगड़े की आँच सीवीसी के साथ रॉ तक भी पहुँच गयी, और सामन्त गोयल ने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की माँग की, तब शायद प्रधानमंत्री को लगा कि बात सीधी प्रधानमंत्री-कार्यालय, और उसके बाद सीधे उन तक पहुँचने वाली है, और उन्हें झगड़े में हस्तक्षेप करना ही पड़ा।

पहले तो वर्माजी को प्रधानमंत्री-कार्यालय में तलब किया गया और उन्हें छुट्टी पर जाने को कहा गया, पर जब अगले चौबीस घण्टों में वर्माजी ने ऐसा नहीं किया, तब रातों-रात सीवीसी से संस्तुति लेकर उनके साथ राकेश अस्थाना को भी जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया, और एक अन्य अधिकारी को सीबीआई के अस्थायी निदेशक के तौर पर नियुक्त कर दिया।

सीबीआई-ऐक्ट में सीबीआई-निदेशक को एक विशेष सुरक्षा-कवच प्राप्त है जिसके कारण सरकार बिना उस समिति के अनुमोदन के, जो निदेशक की नियुक्ति करती है, उसे अपना कार्यकाल पूर्ण होने स्थानांतरित नहीं कर सकती। इसी ऐक्ट का आश्रय लेते हुए वर्माजी ने सरकार के आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

अब अगर निदेशक का यह सुरक्षा-कवच अन्तिम और अभेद्य रहा होता, तो अदालत ने पहले ही दिन सरकार को यह निर्देश दे दिया होता कि वह पहले वर्मा की बहाली करे, और बाकी बातें इसके बाद ही होंगी, पर अदालत ने उन पर लगे आरोपों और उनकी जाँच को महत्त्व दिया। न्यायमूर्ति पटनायक की देख-रेख में सीवीसी को एक सप्ताह में जाँच पूरी करने का आदेश हुआ। अन्त में अदालत ने निदेशक के सुरक्षा-कवच को मान्यता देते हुए उनको बहाल करने के आदेश दिये, पर साथ ही एक सप्ताह के अंदर सरकार को निदेशक की चयन-समिति की सलाह से उनके भविष्य पर निर्णय करने को भी कहा।

इसका अर्थ तो यही निकलता है कि न्यायमूर्ति पटनायक की रिपोर्ट में भी आलोक वर्मा की सत्यनिष्ठा पर संदेह तो व्यक्त किये ही गये थे जिनका निराकरण वर्मा को अपनी समस्त शक्तियों के साथ सीबीआई में दुबारा स्थापित करने से पहले न्यायालय ने आवश्यक समझा। चयन-समिति ने भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन करते हुए दो दिनों में ही यह तय किया कि आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ प्रथमदृष्टया जाँच करने लायक आरोप बनते हैं, और तदनुसार उनके स्थानान्तरण की संस्तुति की-शायद इसलिए कि सीबीआई-ऐक्ट में निदेशक के तबादले की ही बात लिखी है, उसे हटाने की नहीं, और आलोक वर्मा सीबीआई से विदा हो गये।

यह सब तो हुआ, पर मूल प्रश्न कि आलोक वर्मा ने ऐसा क्या किया कि उनको इस तरह से जाना पड़ा, अभी भी अनुत्तरित है। यह तो सोचा नहीं जा सकता कि उन्होंने दो-तीन करोड़ की रिश्वत ली होगी: एक तो घूसखोर आदमी इतनी हिम्मत नहीं रखता कि सीधे सरकार से भिड़ जाय, और दूसरे तीन करोड़ की धनराशि इतनी कम है कि सीबीआई के निदेशक का ईमान उसके लिए डोल जायेगा-यह मुश्किल लगता है। इसी तर्क से अस्थाना के ख़िलाफ़ भी इतनी ही रिश्वत लेने का आरोप भी खारिज हो जाता है। वर्माजी की ईमानदारी संदेह से परे है; ज्यादा से ज्यादा उन पर अव्यावहारिक होने का आरोप लगाया जा सकता है। ईमानदार लोग अधिकांशतः अव्यावहारिक हो ही जाते हैं, जैसे अपने ईमानदार-सम्राट केजरीवाल जी। यह तो हो सकता है कि वैचारिक दृष्टि से वह वर्तमान सरकार के विरुद्ध और विपक्षी दलों के निकट हों।

यह भी हो सकता है कि उनके क्रिया-कलाप सरकारी निर्देशों के विपरीत रहे हों, और ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि वह निर्देश उन्हें उन्हें अपने अधीनस्थ अस्थाना के माध्यम से मिले हों। यह बिलकुल सम्भव है कि आलोक वर्मा ने कुछ मामलों में सरकार के निर्देशों की अवहेलना करते हुए उनमें ढील दी हो-जैसे चिदम्बरम के मामले में। यह सब उनके अव्यावहारिक होने की ओर ही संकेत करते हैं, उन्हें भ्रष्ट होने की ओर नहीं। उन्हें एक ऐसा अधीनस्थ मिला जो प्रधानमंत्री से निकटता के कारण उनसे अधिक शक्तिशाली था, ऐसी स्थिति से कैसे निपटा जाय- यह उन्हें नहीं आता था। उन्होंने युद्धनीति के गुरु सुन जू की शिक्षाओं के विपरीत आचरण करते हुए एक व्यक्ति को बर्बाद करने के लिए धंधे में भावना का मिश्रण किया- वह राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ क्रोध में अंधे होकर व्यावहारिकता और विवेक खो बैठे, और इसीलिए प्रताड़ित हुए।

सरकार पहले तो उनसे यह उम्मीद करते हुए कि वह सीबीआई की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए ही आचरण करेंगे, चुप बैठी रही, पर जब पानी सिर से ऊपर बहने लगा, तो सरकार ने उन्हें चेतावनी दी, पर वर्माजी ने संकेतों को न ग्रहण करते हुए अपना अभियान जारी रखा। यहाँ तक कि जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके नीतिगत फैसले न करने की शर्त पर उन्हें बहाल करके सरकार को एक सप्ताह के अन्दर उनके भविष्य का निर्णय करने के लिए आदेशित किया, तब भी वह अपनी पुरानी चाल ही चलते रहे, और सरकार के पास इसके सिवा कोई चारा ही न छोड़ा कि वह उन्हें पद से हटा दे।

और राकेश अस्थाना? क्या वह निर्दोष हैं? अगर वह प्रधानमंत्री के विश्वस्त हैं, तो इसमें उनका क्या दोष है? पर प्रधानमंत्री के विश्वस्त होने मात्र से ही वह सीबीआई-प्रमुख थोड़े ही हो गये! प्रमुख न होते हुए भी प्रमुख की तरह आचरण करने का उनका दुराग्रह ही उनके पतन का कारण बना। वह भी इस विधा से अनभिज्ञ थे कि प्रधानमंत्री और सीबीआई-निदेशक दोनों को कैसे प्रसन्न रखा जाय, और इस कारण उनके विवेक ने भी उनका साथ छोड़ दिया, और वह भी दोनों ओर से मारे गये।

अब क्या होगा? कुछ नहीं। आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ आरोप कभी प्रमाणित नहीं होंगे, पर अब वह सीबीआई के निदेशक तो दुबारा बनने से रहे। उनके पास कांग्रेस की सदस्यता लेकर मोदी के ख़िलाफ़ पूर्णकालिक राजनीति करने से लेकर अपनी आत्मकथा लिखकर जनता को सच्चाई बताने तक के विकल्प हैं; आशा करनी चाहिए कि अब वह व्यावहारिकता का ध्यान रखेंगे। अस्थाना के खिलाफ़ जाँच चलती रहेगी। वह अगर जाँच से बेदाग़ निकल भी जायँ, तो अब सीबीआई के निदेशक तो वह बनने से रहे जिसके लिए उन्होंने इतना प्रपंच रचा। अपनी आत्मकथा में वह भी शायद मोदी को अपने सीबीआई-निदेशक न बन पाने के लिए दोषी ठहराएं, पर गहराई से आत्मनिरीक्षण करने पर वह अपनी दुर्गति के लिए स्वयं को ही जिम्मेदार पाएंगे।

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