छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी की जीत के कुछ प्रमुख कारण

रायपुर. छत्तीसगढ़ में मिली करारी हार ने भाजपा को सोचने पर मज़बूर कर दिया है, क्योंकि आला नेताओं को यदि हार का अंदेशा रहा भी होगा तो कम से कम ऐसी हार तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोची होगी। भाजपा के लिए यह आंकड़ें चौंकाने वाले हैं, वहीँ इस जीत ने कांग्रेस पार्टी में नयी जान फूँक दी है। पंद्रह साल तक लगातार मुख्यमंत्री की कमान संभालने वाले रमन सिंह ने इस हार की नैतिक जिम्मेदारी ले ली है।

कांग्रेस पार्टी की इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही चुनावी समीक्षकों ने पता लगाना भी शुरू कर दिया है कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि जिस राज्य की पूरी राजनीति रमन सिंह और ‘धान’ के इर्द-गिर्द घूमती हो, वहाँ भाजपा, जनता के नब्ज को क्यों नहीं पहचान पाई।

हालाँकि इस प्रश्न का उत्तर बड़ा ही सरल है, और भाजपा का हर नेता इसका उत्तर जानता भी है, लेकिन इसे विडंबना ही कह लीजिए कि वो सीधे-सीधे कह भी नहीं सकते कि हम इस वजह से हार गए। जनता की सूझबूझ पर शक करना या उन पर सीधे आरोप लगा देना, नेताओं का काम नहीं है।

आइए उन कारणों पर चर्चा करते हैं जिसने कांग्रेस पार्टी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है-

  1. एंटी-इनकंबेंसी: कई विशेषज्ञ यह दावा कर रहे हैं कि राज्य में एंटी-इनकंबेंसी, रमन सिंह की हार का प्रमुख कारण है, जबकि यह सच नहीं है। हाँ, इनकंबेंसी जरूर थी लेकिन वैसी नहीं कि कांग्रेस पार्टी को टक्कर ही ना दे सके। बहुत से पाठक यह तर्क दे सकते हैं कि 10% वोट शेयर कम हो गया और आप कहते हैं कि एंटी-इनकंबेंसी नहीं थी! तो आपका कहना भी सही है, लेकिन जब हम कांग्रेस की जीत के दूसरे पहलुओं पर नज़र डालेंगे तो पता चल जाएगा कि यह 10% अधिक वोट शेयर आया कहाँ से!
  2. कर्जमाफी-बोनस-बिजली बिल आधा-धान के समर्थन मूल्य में वृद्धि: कांग्रेस पार्टी की जीत में सबसे बड़ा कारण कर्जमाफी का वादा रहा है। चूँकि कृषि प्रधान राज्य होने के नाते किसानों ने इस घोषणा को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस पार्टी ने दो साल कापिछले बोनस भी देने का वादा किया है। धान का समर्थन मूल्य 2500 रुपये करने का वादा  किया गया है जो आज लगभग 2000 रुपये के आसपास है। बेरोजगार युवाओं को मासिक भत्ता देने के वादे ने युवा मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया है। घर का बिजली बिल आधा कर देने के वादे ने  इन घोषणाओं पर चांदी की लेप चढ़ा दी है। हालाँकि, इस पर अलग से बहस हो सकती है कि 85 हज़ार करोड़ रुपये की GSDP वाला राज्य इतना बड़ा बोझ कैसे सहन कर पाएगा? पैसा कहाँ से आएगा? फिर अधोसंरचना विकास का क्या होगा, जिसकी राज्य को सख्त जरूरत है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढने का बोझ जनता ने अपने सर नहीं लिया बल्कि लोक-लुभावन वादों की परिछाया में ही अपना वोट कांग्रेस पार्टी को देने का मन बना लिया। अब आपको पता चल गया होगा कि वो 10% वोट शेयर आया कहाँ से! जनता के मन में रमन सिंह को हटाने का भाव कम और धान का समर्थन मूल्य और बोनस बढ़ने का उत्साह अधिक था।
  3. वोटिंग से चार-पाँच दिन पहले जब अखबारों में कांग्रेस पार्टी का यह घोषणा पत्र छपा तो उसी वक़्त पासा पलट गया, दूसरी ओर भाजपा के पास इसका कोई तोड़ नहीं था। यही वजह है कि ज्यादातर एक्सपर्ट्स और एग्जिट पोल, इस हार का पूर्वानुमान नहीं लगा पाए। हालाँकि, जो लोग यहाँ के मतदाता हैं और माहौल को पढ़ने की थोड़ी बहुत भी समझ रखते हैं उनके लिए यह परिणाम जरा भी आश्चर्यजनक नहीं हैं।
  4. आउट-सोर्सिंग-जोगी फैक्टर: प्रदेश की राजनीति में आउट-सोर्सिंग या अस्थायी नौकरियाँ एक बड़ा मुद्दा है। इसने भी भाजपा को चोट पहुँचाई है। इस हार का एक कारण संविदा शिक्षकों की माँग पूरी ना कर पाना, वेतन विसंगतियों को लेकर सरकारी कर्मचारियों का सरकार के साथ लगातार संघर्ष भी रहा है। जोगी फैक्टर ने भी भाजपा को नुकसान पहुँचाया है।
  5. जाति कार्ड: इस बार के चुनाव में ‘बोनस’ ने जातिवाद को पीछे धकेल दिया। हालाँकि पार्टियों ने टिकट वितरण के समय इसका विशेष ध्यान रखा था, लेकिन मतदाताओं के लिए यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। मतदाताओं का एक ही लक्ष्य था- ‘कांग्रेस को जीताना है!’ समर्थन मूल्य और ‘बोनस’ पर ही चर्चा ज्यादा होती थी, जाति पर बहस करने का लोगों को समय ही नहीं मिला। हालाँकि, इस तर्क को भी पाठक यह कहकर खारिज कर सकते हैं कि देश का ऐसा कौन सा चुनाव है जिसे मैडम ‘जाति’ ने प्रभावित नहीं किया हो? लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। अगर ‘साहू’ बहुल इलाके में किसी ‘कुर्मी’ को टिकट दे दिया जाता तो भी उस प्रत्याशी को कोई ख़ास दिक्कत नहीं होती।

यह चुनाव भाजपा को एक कड़वा सच सिखाकर जाएगी कि मतदाताओं की अपेक्षाएँ अब बदल चुकी हैं, या फिर ये हमेशा से ऐसी ही थीं। आवास योजना, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, गैस सिलेंडर या आयुष्मान भारत, सब ‘बुलेट नंबर-2’ की आंधी में उड गए। नक्सलवाद तो जैसे यहाँ है ही नहीं! अतः ‘बुलेट नंबर-2’ ही इन चुनावों का सार है, बाकि सब ‘accessories’ हैं।

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