Home Hindi दलित तो बस बहाना है, 2019 का चुनाव निशाना है

दलित तो बस बहाना है, 2019 का चुनाव निशाना है

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दलित तो बस बहाना है, 2019 का चुनाव निशाना है

2 अप्रैल 2018 का दिन भारतीय राजनीति के लिए काला दिन था। राजनीति का स्तर लगातार नीचे गिर रहा है। वोट पाने के लिए ये लोग देश की अखण्डता को भी तोड़ने से पीछे नहीं हट रहे।

सबसे पहले मैं आपको बताता हूं कि मामला क्या है। सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने फैसला दिया कि SC/ST एक्ट की कुछ धाराओं का कुछ लोग अपने सवार्थ हेतु गलत प्रयोग करते है। कुछ लोग अपनी दुश्मनी निकलने के लिए इन धाराओं में विरोधियों पर केस करते है ताकि सामने वाले को बेल न मिले।

सुप्रीम कोर्ट को क्यूं ऐक्ट में बदलाव की बात कहनी पड़ी थी

यकीनन सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला कुछ सोच समझ कर ही लिया होगा। इस के कुछ गलत उपयोग के उद्धरण उसके सामने आए होंगे। लेकिन इस फैसले से सियासी रोटिया सेकने के लिए इस पूरे मामले को अलग तरह से आम लोगों के बीच प्रस्तुत किया गया। अब आते है इस लेख के सिरलेख की तरफ। क़ि क्यों इस मामले में राजनीती की बदबू आ रही है।

असल में हाशिए पर पहुँच चुकी सियासी पार्टियाँ इस मामले में अपनी राजनीति चमकाने में लगी है। सबसे पहले इस मामले का आरक्षण से कुछ लेना देना नहीं था। लेकिन सोशल मीडिया पर इसे ऐसे प्रस्तुत किया गया कि इस से आपके आरक्षण को खत्म किया जा रहा है। और ये काम मोदी सरकार कर रही है, यद्द्पि यह फैसला कोर्ट के द्वारा आया था। सरकार इस मामले में पार्टी नहीं थी। और आरक्षण खत्म होने के डर की वजह से लोग हिंसक हो गए।

लोकतांत्रिक देश में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव और राजस्थान, मध्यप्रदेश विधान सभा चुनाव में दलित और पिछड़ी जातियों के वोट बटोरने के लिए इसे सियासी रंग दिया गया। इसकी एक तस्वीर तब देखने को मिली जब एक लड़के की तस्वीर सोशल मीडिया पर पहुंची पहले यह लड़का राजपूत बनकर दंगा भड़काने की कोशिश कर रहा था, फिर उसी लड़के ने भगवा कपड़ा बदल कर नीला कपड़ा पहन कर दलित टोली में जाकर वहां लोगों को भड़काने लगा।

देश में हर जगह आज यह हाल है। मोदी खुद में इतना बड़ा भय बन चूका है कि उसे हराने और सत्ता से दूर रखने के लिए यह लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गए हैं। मैं यहाँ किसी का पक्ष नहीं ले रहा लेकिन सच यही है। कर्नाटक में लिंग्यात को हिन्दू धर्म से अलग करना, उसके बाद में क्या नतीजे निकालेंगे इसकी किसी को चिंता नहीं है। कांग्रेस बस वहां इस बार का चुनाव जीतना चाहती है। अगली बार किसी और जाति को निशाना बना लेंगे।

आज यही फिर से दलित समाज को सामने रख कर वोट पाने के लिए हो रहा है। इस से चाहे दूसरी जातियों और दलित समाज के रिश्ते और खराब हो जाए। दरअसल बहुगिन्ती समाज और जनरल कास्ट के लोगों को लगता है क़ि आरक्षण से उनके हित्तों को नुकसान पहुँच रहा है। असल में आरक्षण को संविधान में सिर्फ दस साल के लिए अस्थायी तौर पर शामिल किया गया था। लेकिन बाद में वोट की राजनीति से प्रेरित होकर उस समय की कांग्रेस सरकार ने इसे खत्म ही नहीं किया।

यह एक अलग डिबेट का मुद्दा है कि आरक्षण से देश को फायदा पहुंचा है या नुकसान। लेकिन आज का मुद्दा ये है कि कौन यह आग भड़का रहा है। तो इसका सरल सा उत्तर है जिसको इसका सबसे अधिक फायदा पहुंचेगा। और इसका फायदा विपक्ष को होगा। ये कोई राकेट साइंस नहीं है।

पूरा विपक्ष इस मामले को वोट में कैश करने की कोशिश में है। इस मामले में जवाबदेही सरकार की भी बनती है। उसे मालूम था कि यह मामला कितना संवेदनशील है, और उसे मालूम होना चाहिए था कि विपक्ष इस मामले को उठा सकता है। लेकिन फिर भी उसने बीस मार्च को फैसला आने के बाद दो अप्रैल तक आग को भड़कने दिया और जब फैसला आया तो दबाव में आके रिव्यु पेटिशन दायर की।

यकीनन आप विपक्ष से इस मामले में यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो अपनी राजनीति को भूल कर देश के बारे में सोचेंगे, भारत देश में तो बिलकुल भी नहीं, तो इसका क्या हल है?

सबसे पहले वोटर को समझदारी से काम लेना होगा। अपनी जाति से ऊपर उठ कर देश के बारे में सोचना होगा। यह देश सबका है।अगर हम इस देश की प्रॉपर्टी को नुक्सान पहुंचा रहे है।तो यह देश की प्रॉपर्टी भी हमारी है हमारे टैक्स के पैसे से ही यह सब कुछ बना है। सब लोगों को थोड़ी समझदारी से काम लेना होगा ताकि वो किसी की राजनीति का मोहरा न बने।

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