राष्ट्रीय प्रतीक और हम

संविधान द्वारा हमें यह निर्देशित हैं कि हमें अपने राष्ट्रीय प्रतीकों जैसे राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गीत तथा राष्ट्र-गान का उचित सम्मान करना चाहिए। सम्मान प्रदर्शित करने हेतु कुछ नियम भी दिए गये हैं।

हाल ही में यह चलन चल पड़ा हैं कि तथाकथित लिबरल इसे उचित सम्मान देने के बजाय इसका अपमान करने में लगे रहते हैं। उनका मक़सद कोई विरोध-प्रदर्शन करना नहीं होता बल्कि उनकी इस हरक़त पर आने वाले उग्र प्रत्युत्तर को इस्तेमाल कर अपना प्रोपेगेंडा ठेलना भर होता हैं। इस तरह के तमाम उदाहरण देश में देखने को मिले हैं।

सुप्रीम कोर्ट के द्वारा सिनेमाघरों में राष्ट्रगान को अनिवार्य करने के बाद भी ऐसी घटनायें आये दिन सुर्खियों में बनी रहती हैं।

इस विषय पर राष्ट्रवादी गुटों द्वारा खूब हो-हल्ला और लिबरल गुटों द्वारा विधवा-विलाप प्रतिदिन किया जाता रहा हैं। देश का तथाकथित लिबरल गुट जो कि अपने मानसिक दिवालियापन से जूझ रहा हैं और अपने विचारों को लेकर इतना कट्टरपंथी हो चला हैं कि उनसे इस मामले पर समझदारी दिखाने की अपेक्षा करना व्यर्थ हैं।

रही बात अति-राष्ट्रवादी गुट की तो उन्हें खुद अभी राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर बहुत अधिक ज्ञान अर्जित करने की आवश्यकता हैं। हाल ही में 15 अगस्त को अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा पर तिरंगे के अपमान का आरोप लगा, जबकि वो एक दुपट्टा था नाकि झंडा। ये घटना पूर्व में प्रधानमंत्री मोदी और मशहूर शेफ़ विकास खन्ना भी झेल चुके हैं। मुझे भय हैं कि कल को यह गुट कांग्रेस के झंडे को राष्ट्रीय ध्वज समझकर ना अपना ले।

15 अगस्त को तेलंगाना में एक स्कूल के प्रधानाचार्य को जूते पहनकर तिरंगा फ़हराने पर भीड़ द्वारा उनकी पिटाई की गई जबकि उसी दिन देश के प्रधान सेवक ने भी ध्वजारोहण के समय जूते पहने हुए थे।

हम लोग दरअसल भूल गए हैं कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है इसी कारण संविधान की प्रस्तावना ‘हम भारत के लोग’– इस वाक्य से प्रारम्भ होती है।

संविधान की प्रस्तावना:

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा

उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए

दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा

इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

राष्ट्रीय प्रतीक यानि राष्ट्र के प्रतीक और राष्ट्र बनता हैं इसके समस्त नागरिकों से, इसलिए सभी प्रतीक अंततः देश की जनता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। तो जो लोग इसका अपमान करते हैं वो दरअसल खुद का, खुद के परिवार, समाज का ही अपमान करते हैं; और ऐसे लोगों की पिटाई करने वाले भी कानून की बलि चढ़ाकर अंततः राष्ट्र का ही अपमान करते हैं।

इस विषय का दूसरा पहलू यह भी हैं कि हमारे देश में राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर बने कानून जटिल हैं। हमारा देश जहाँ लोग यातायात नियमों तक को धता बताते हैं, उनसे इन जटिल कानूनों की अक्षरशः पालन की अपेक्षा करना मूर्खतापूर्ण हैं और वो भी तब जब लोगों को इसका ज्ञान भी नहीं हैं। कानून की जटिलता होने की वजह से कई बार गैर-इरादतन भी इन नियमों का उल्लंघन हो जाता है।

सरकार को चाहिए कि नियमों को थोड़ा उदार बनाया जाए जिससे लोगों के बीच राष्ट्रीय प्रतीकों को और अधिक प्रेरणादायी बनाया जा सके। उदार नियमों का पालन करना सरल होगा, उल्लंघन की घटनाएं कम होंगी तथा अदालतों पर कुछ व्यर्थ मुकदमों का भार भी कम होगा।

राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर लोगों में सम्मान का भाव होना चाहिये ना कि डर का। राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान सहज आचरण में आना अनिवार्य हैं, नहीं तो ये ‘वन्दे मातरम्’ के स्थान पर ‘वन डे मातरम्’ बनकर रह जायेंगे।

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