Sunday, April 21, 2024
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उत्तर प्रदेश में भाजपा की बम्पर जीत के संकेत

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RAJEEV GUPTA
RAJEEV GUPTAhttp://www.carajeevgupta.blogspot.in
Chartered Accountant,Blogger,Writer and Political Analyst. Author of the Book- इस दशक के नेता : नरेंद्र मोदी.

विधान सभा चुनावों से पहले ही यह माना जा रहा था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सेना द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के चलते काले धन और जाली धन पर की गयी अभूतपूर्व सर्जिकल स्ट्राइक इन चुनावों में मुख्य मुद्दा बनेंगे. जिस बात का किसी को भी अंदाजा नहीं था, वह यह थी कि विपक्षी राजनीतिक दल इन दोनों ही ऐतिहासिक और जनहित में लिए गए फैसलों का अपनी पूरी ताकत लगाकर विरोध करेंगे. विपक्षी दलों को इन दोनों ही फैसलों से इतना बड़ा धक्का लगा, मानो वे लोग चुनाव शुरू होने से पहले ही चुनाव हार गए हों. इसकी वजह सिर्फ यह थी कि जनता को यह समझ में आ गया कि जो क्रांतिकारी काम पिछली सरकारें ६७ सालों में नहीं कर सकीं, उन्हें मोदी सरकार ने अपनी मजबूत इच्छा शक्ति के बल पर ढाई साल में ही कर दिखाया है. विपक्षी दल इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि विधान सभा चुनावों को वे पूरी तरह से शुरू होने से पहले ही हार चुके है. सबसे ज्यादा डर उत्तर प्रदेश में सत्ता पर काबिज़ समाजवादी पार्टी को था, लिहाज़ा इस पार्टी  ने सर्जिकल स्ट्राइक के तुरंत बाद से एक लिखी हुईं स्क्रिप्ट पर काम करना शुरू कर दिया, जिसे देखकर जनता और मीडिया दोनों ही पिछले पांच सालों के जंगल राज को भूल जाएँ और यह समझ बैठें कि अखिलेश यादव तो “बहुत ही बढ़िया राजनेता” हैं, उन्हें उनके पिताजी “बढ़िया” बनने से रोक रहे थे.

दिक्कत यह है कि लोग आजकल पढ़े लिखे और समझदार है और सोशल मीडिया ने उन्हें पूरी तरह सजग कर दिया है. लोग समाजवादी पार्टी द्वारा पेश किये गए इस “मुलायम-अखिलेश” ड्रामा के मन्तव्य को तभी समझ गए थे, जब यह शुरू हुआ था. चुनावों की घोषणा होने के बाद समाजवादी पार्टी को यह लगने लगा कि लोग उसके ड्रामे को समझ गए हैं और उसकी लुटिया डूबनी लगभग तय है. अब इस पार्टी ने मजबूरी में अपना आखिरी दांव चल दिया और जिस कांग्रेस पार्टी का यह कल तक विरोध कर रहे थे, उसके साथ गठबंधन कर लिया. कांग्रेस पार्टी के लिए तो यह मौका “डूबते को तिनके का सहारा” की तरह आया और उसने बिना किसी सोच विचार के इस मौके को लपक लिया.

देखा जाए तो कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी तो पहले से ही अपने आप को “हारा हुआ खिलाड़ी” समझ रहे थे, कांग्रेस को लगा क़ि समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने से उसे कुछ खोना नहीं है क्योंकि उसके पास कुछ भी खोने के लिए नहीं है. हाँ , लोग अगर गलती से भी समाजवादी ड्रामे की चाल में फंस गए तो उसे फायदा जरूर हो सकता है.

२०१४ के लोकसभा चुनावों में जीरो पर आउट हुईं बहुजन समाज पार्टी तो पहले से ही हाशिये पर थी. रही सही कसर उस खुलासे ने कर दी जिससे यह सामने आया कि नोटबंदी की अवधि में बैंकों में पुराने नोटों को सबसे अधिक मात्रा में जमा कराने वाली वह इकलौती पार्टी है. बाकी पार्टियों ने भी पुराने नोटों को बैंक में जमा कराया लेकिन जितनी भारी भरकम मात्रा में पुराने नोट बसपा ने जमा कराये, उसे देखकर जनता खुद ही समझ गयी कि आखिर यह विपक्षी दाल नोटबंदी का इतनी तेजी के साथ विरोध क्यों कर रहे थे. इतना तो जनता समझ ही चुकी है कि जो राजनीतिक दल जितनी ताकत लगाकर नोटबंदी का विरोध कर रहा है, वह राजनीतिक दल या नेता उतनी ही बुरी तरह नोटबंदी से प्रभावित हुआ है.

गौरतलब बात यह है कि पाक अधिकृत कश्मीर में की गयी सर्जिकल स्ट्राइक हो या फिर काले धन और जाली धन पर कि गयी सर्जिकल स्ट्राइक, मोदी सरकार ने देश में पहली बार एक जबरदस्त “मास्टर स्ट्रोक” खेला है, जिससे समूचा विपक्ष चरों खाने चित हो गया है और दोनों ही क़दमों की तीखी आलोचना कर रहा है. अगर यह दोनों फैसले घटिया है, जनहित और देशहित में नहीं हैं, फिर उसका अंजाम तो भाजपा के खिलाफ ही जाने वाला है. भाजपा के खिलाफ जाने वाले फैसलों का तो विपक्षी नेताओं को मन ही मन स्वागत करना चाहिए. लेकिन भाजपा के साथ साथ पूरा विपक्ष यह जानता है कि यह दोनों फैसले ऐसे हैं जो पिछले ६७ सालों में कोई भी सरकार नहीं ले सकी और क्योंकि यह फैसले ऐतिहासिक एवं  अभूतपूर्व हैं और देशहित एवं जनहित में हैं, मोदी सरकार को इनका फायदा लेने से कोई नहीं रोक सकता.

लगभग सभी विपक्षी नेता और राजनीतिक दल मन ही मन इस बात पर एकमत हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की बम्पर जीत को कोई नहीं रोक सकता लेकिन इसी कड़वे सच को खुलकर मानने के लिए तैयार नहीं हैं. अब सभी विपक्षी नेताओं की उम्मीद इसी बात पर टिकी हुयी है कि वे जाति-धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीती को अंजाम देने और जनता को दिग्भ्रमित करने में कितने कामयाब होते हैं. जिस तरह से सभी पार्टियां अल्पसंख्यक वर्ग के मतदाताओं को भाजपा से डरा कर  अपनी तरफ करने में लगी हुयी हैं, उससे यह सवाल भी खड़ा हो रहा  है कि जो मीडिया भाजपा को सांप्रदायिक कहने में एक मिनट नहीं लगाता वह मुस्लिमों को भाजपा से डराने वालों को कब “सांप्रदायिक” कहना शुरू करेगा?

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