Thursday, January 28, 2021
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प्रधानमंत्री जी को खुला-पत्र – एक राष्ट्रवादी मन की व्यथा!!

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Shwetank Bhushan
Student of Indian history. Random blogger. Passionate painter. Sports fanatic. Movie buff.

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

आज, 18 सितंबर, 2016 को कश्मीर के उरी में आतंकियों के हमारे जवानों के उपर हुए दर्दनाक हमले के बाद जो देश के लोगों में आक्रोश और व्यथा है, मैं उन्हे अपने शब्दों मे आपसे अभिव्यक्त करना चाहता हूँ। उन देश वासियों की बात, जिन्हें किसी पार्टी-राजनीति से कोई मोह नहीं है, जिन्हे सिर्फ़ अपने देश और देश के हित की चिंता और व्यथा है।

यह आतंकी घटना किसी ट्रेन में, किसी बस या बाज़ार में नहीं नहीं हुई है। यह आक्रमण हमारी देश की सेना के उपर है, और ऐसी घटनाएँ लगातार बढ़ती ही जा रही हैं।

माना की हर हर फिदायीन हमले में एक आश्चर्य तत्व अवश्य होगा, जिसमें आतंकवादी उचित समय और स्थान का चयन करेंगे, लेकिन फिर यह हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों की चूक है जो सेना को सही समय पर इन संदेहों से अवगत ना करा दे। लेकिन जैसी सूचनाएँ मिल रहै हैं, इस फिदायीन समूह के घुसपैठ होने की सामान्य ख़ुफ़िया जानकारी भी उपलब्ध थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र महासभा में बोलने वाले हैं, उस से पहले ऐसी घटनाओं का होना किसी अचंभे की बात नहीं, बल्कि, ऐसी उम्मीद होनी चाहिए।

पाकिस्तान के भेजे हुए चंद आतंकियों का घात लगा कर आक्रमण, जिसमें हमारे 17 जवान शहीद हो जाते हैं (और काई बुरी तरह घायल हैं), ये मामूली बात नहीं। यह अब परोक्ष युद्ध कत्तयि नहीं रहा. यह पाकिस्तान की सुनियोजित, गहरी और घिनौनी चाल अब एक प्रत्यक्ष युद्ध है और इसका मूह-तोड़ जवाब देना हमारा उत्तरदायित्व है।

आज के दिन, जब हमारे देश ने अपने 17 वीर सैनिकों की बलिदानी दी, गत ढाई वर्षों का सबसे दर्दनाक दिन है। माना की चारों आतंकी भी मार गिराए गये, लेकिन यह अनुपात पचने लायक नहीं है। ऐसी घटनाएँ लगती तो बिखरी हुई हैं हैं, पर यह पाकिस्तान के हमारे देश के खिलाफ एककृत युद्ध को परिभाषित करती हैं।

दो साल पहले जब आपने कार्य-भार संभाला था, उस समय भी उरी में आतंकियों ने हमारी सेना पर हमला किया था और हमारे जवान देश के लिए शहीद हुए थे। उस वक़्त आपने उस घटना की ‘कड़ी-निंदा’ की थी।

“आतंकी हमलों में शहीद हुए सैनिकों को श्रृद्धांजलि देने श्रीनगर के सेना मुख्यालय में शहीद स्मारक पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।”

लेकिन गत वर्षों में, आपने अपनी कुशल विदेश-नीति का परिचय दिया है। पाकिस्तान के साथ भी आपने कुशल राजनयिक हथकंडे अपनाए और बहुत सहजता से विश्व के समक्ष उनके मुखौटे को हटा उनकी कालगुज़ारी से सबको अवगत कराया है। आपके हर एक कदम को देश और दुनिया ने सराहा है जो सर्व ज़ाहिर भी है।

देशवासी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं की जैसे-जैसे पाकिस्तान को राजनयिक तरीके से कोना किया जाएगा, ऐसी घटनाएँ तीव्र होंगी। पहले पुंच्छ सेक्टर, फिर पठानकोट, कूपवाड़ा और अब उरी। गत ढाई वर्षों में ऐसी कई घटनाएँ हुई है। लेकिन आज उरी के इस दर्दनाक घटना ने सारी सीमाओं को लाँघ दिया है। राजनयिक मसले और उपाय बिल्कुल सर्वोपरि हैं, लेकिन उसकी लागत हमरी सेना की लाशें नहीं हो सकतीं, और ख़ास कर सेना का टूटता मनोबल तो बिल्कुल ही नहीं हो सकता।

अब ऐसी घटनाओं के बाद “कड़ी-निंदा’ जैसे शब्दों से देशवासियों का मन दुख़ता है। कोई भी पीछे मुड़ कर इन संदेशों को टटोलेगा, और फिर ऐसी घटनाएँ बिना किसी अनुकूल प्रतिक्रिया के दोहराती रहेंगी, तो लोगों का इस सरकार और उसके नेतृत्व और उसकी सबलता से विश्वास उठना लाज़मी है। मुझे आम जनता का किसी राजनीतिक दल पर से या किसी नेता-विशेष पर से विश्वास उठना उतना नहीं कचोटेगा, जितना हमारी गौरवशाली सेना का अपने ही सरकार पर विश्वास ना होना। यह निहायत ही दुखद होगा, और आप ही शायद आख़िरी उम्मीद भी हैं।

उम्मीद है कि इस बार हमारी सरकार पाकिस्तानी सरकार या न्यायालयों को दस्तावेज और प्रमाण उपलब्ध कराने में नहीं उलझेगी और आज हुए उच्च-स्तरीय बैठक में एक एक्शन प्लान तैयार कर रही होगी, ना की और दस्तावेज़ों के लिए जमीन। राजनीतिक प्रक्रिया अपनी जगह पर है, सटीक मुँहतोड़ पार्तिक्रिया अपनी जगह पर। “पूरी दुनिया को पता है, की भारत कुछ भी नहीं करेगा”, ख़ास कर पाकिस्तान की इस धारणा के अब बदलने का अहम वक़्त है।

एक दीवालिएपन से जूझता देश, जो ना तो आकार में, ना तो औकात में, कहीं भी अपने देश के सामने नहीं टिक सकता, केवल परमाणु हथियार के प्रयोग की धमकी दे-दे कर हमें फिरौती पे नहीं रख सकता। यह मात्र उनका एक शाब्दिक धोखा है।

और यदि युद्ध हो भी, तो मुझे पाकिस्तान के शस्त्र और हथियारों की चिंता नहीं। अगर कोई चिंता है, तो अपने ही देश के अंदर बैठे मीडीया-कर्मियों की, उन उदार-चरित्रवानों की, उन जाली-धर्म-निरपेक्षियों की, जो अपने ही देश को कमज़ोर करने मे चौबीसों घंटे लगे रहते हैं।

आज उरी में भी दुश्मनों के पास अंदरूनी सूत्र से ये जानकारी थी, और वे हमारी सेना के चाल को बहुत अच्छी तरह जानते थे, तभी उन्होने ‘एडवांस-पार्टी’ के आगमन के दिन पर हमला किया। ऐसे समय में जब वास्तविक घटना-स्थल के बारे में पूर्ण-चुप्पी होनी चाहिए, हमारे कुछ मीडीया-कर्मी उरी में चल रहे आतंकवादी हमले पर हर मिनट की खबर टीवी पर दिखाए जा रहे थे। ये पहले भी इन बातों पर माफ़ी भी माँग चुके हैं. हमारी पत्रकारिता ने तो अपनी विश्वसनीयता बहुत पहले खो दी, लेकिन इसनमें से चंद लोग हैं, जो इस पत्रकारिता की आड़ में देशद्रोह का बाज़ार भी चला रहे हैं।

ये कौन लोग हैं? सरकार इनपर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई कड़ी कार्यवाही क्यूँ नहीं करती? जहाँ एक ओर ये देशद्रोही लोग खुलेआम देश को तोड़ने के अपने इरादे में सुबह शाम व्यस्त हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे राजनेता (जिनका ना जनता से कोई संपर्क है ना वास्ता) बिना कोई समय खोए, बिना राष्ट्र की सुरक्षा और इसकी अखंडता के बारे में एक बार भी सोचे, राजनीतिक रोटियाँ सेंकने मे लग गये।

यह हमारे लिए सबसे बड़ा अभिशाप है, कि एक दुष्ट, आतंकवादी राष्ट्र हमारा पड़ोसी है। हमेशा की तरह हमारे पड़ोसी हमें उकसाने, आतंकवादियों को प्रशिक्षण, अनुदान, और सहायता देने के काम मे संलिप्त है। लेकिन इस तथ्य पर अफ़सोस करने के अलावा, अब समय उनके नापाक कर्जों को चुकाने का उपर्युक्त एहसास दिलाना नितांत आवश्यक है। हमारे शहीद सानिकों के पार्थिव शरीर सिर्फ़ ताबूतों के लिए नहीं हैं।

पाकिस्तान सोचता है कि उरी-हमला भी हमेशा की तरह “भारतीय-गैर-प्रतिक्रिया” होगा, और हम इस बार भी चूक गये तो यह भारत वर्ष को सामरिक संयम से पार ले जाना होगा।

श्री मोदी जी, हम जैसे राष्ट्रवादी सोच वाले लोगों ने बस सिर्फ़ एक कारण आपको अपना वोट और समर्थन दिया है, और वो है ‘देश-हित’. ये हमेशा याद रहे, देश के हित के सामने ना तो किसी राजनीतिक दल की कोई हस्ती है, और ना ही कोई मोल। यह चेतावनी कत्तयि नहीं है, यही वास्तविकता है, और शायद ऐसा ही होना भी चाहिए।

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल, सबका लिया सहारा

पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे, कहो, कहाँ कब हारा?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष, तुम हुये विनीत जितना ही

दुष्ट कौरवों ने तुमको, कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का, कुफल यही होता है

पौरुष का आतंक मनुज, कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो

उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो ।

सच पूछो , तो शर में ही, बसती है दीप्ति विनय की

सन्धि-वचन संपूज्य उसी का, जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है

बल का दर्प चमकता उसके पीछे, जब जगमग है।

[‘शक्ति और क्षमा’ – दिनकर ]

अधिकांश राष्ट्रवादी सोच रखने वाले लोगों नें गत चुनाव में आप के नेतृत्व पर विश्वास किया, और कमोबेश, आज भी करते हैं। आज तकरीबन दो साल और चार महीने की इस सरकार के शासन के बाद, देश एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ हर देश-भक्त आपके नेतृत्व की ओर टकटकी लगाए देख रहा है। वे सब इस दुविधा में है, कि कहीं आज फिर एक बार इस निर्णायक क्षण में, देश किसी नेतृत्व संकट में तो नहीं। समस्त देशवासी आपके नेतृत्व पर शत-प्रतिशत विश्वास जताते हुए आपके साथ बिना-शर्त-समर्थन मे खड़े हैं, और अपनी सरकार से एक सटीक प्रतिक्रिया की उपेक्षा में है।

प्रधानमंत्री जी, यह आपके नेतृत्व का वही अपेक्षित क्षण है, देश को एक बार फिर, परशुराम की प्रतीक्षा है।

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