भारत के मुख्य न्यायाधीश के नाम एक खुला पत्र – कृप्या जेएनयू मामले में दख़ल करें

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,

मैं आज आपको एक आम भारतीय की हैसियत से एक खुला पत्र लिख रहा हूँ। मुझे नहीं पता कि मेरा यह पत्र आप तक पहुँचेगा भी या नहीं। मुझे एक उम्मीद है कि एक लोकतांत्रिक देश में एक आम भारतीय की भी आवाज भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक पहुँच सकती है। बस उसी उम्मीद से यह पत्र लिख रहा हूँ।

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय जिससे पहले मैं अपनी बात कहूँ मैं यह साफ कर देना चाहता हूँ कि मैं यह खुला पत्र आपके नाम पर ही क्यूँ लिख रहा हूँ। महोदय भारत एक लोकतांत्रिक देश है जिसमें संविधान की सर्वोच्चता को अपनाया गया है और संविधान की सर्वोच्चता बनाये रखने का दायित्व भारत का मुख्य न्यायाधीश होने के नाते आपके कंधों पर ही है।महोदय मैं एक आम भारतीय हूँ, जिसकी इस देश के संविधान एवं न्यायपालिका में पूर्ण आस्था है। जब न्यायपालिका इंसाफ की कसौटी पर सच और झूठ को तोल कर सच्चाई का निर्धारण करती है, तो मुझ जैसे अनेक आम भारतीयों को उम्मीद की एक किरण दिखायी पड़ती है।

महोदय अभी हालिया समय में जे०एन०यू० प्रकरण में जो कुछ भी हुआ, वो हर आम भारतीय की तरह मुझे भी सोशल मीडिया, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया आदि के माध्यम से पता चला। कहा गया कि देश के विरुद्ध नारे लगाये गए, देश को तोड़ने की कोशिश की गई और सबूत के तौर पर कुछ वीडियो भी सामने आये।

स्वाभाविक सी बात है जब देश के शीर्ष शिक्षण संस्थान में ऐसी घटनायें घटित हों, तो एक आम भारतीय आहत होता ही है। लोगों का यह गुस्सा सोशल मीडिया पर सबसे पहले फूटा और फिर एक मुहिम सी इस देश में शुरु हो गई, जिसमें उन कथित छात्र नेताओं और उस आयोजन के आयोजकों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की जाने लगी। सरकार ने भी शायद जनता का दबाव महसूस कर देर से ही सही लेकिन आनन-फानन में जे०एन०यू० ते छात्र नेता कन्हैया कुमार को आई०पी०सी० की धारा 124 के तहत राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

अब कन्हैया ने राष्ट्रद्रोह किया या नहीं यह कहने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। यह मामला माननीय न्यायपालिका के विचाराधीन है और मुझे पूरी उम्मीद है कि माननीय न्यायपालिका हमेशा की तरह इस प्रकरण में भी जो न्यायसंगत होगा वो ही निर्णय देगी।

माननीय मुख्यन्यायाधीश महोदय अब मैं मुख्य विषय पर आता हूँ जिसके लिए मैं आपको यह पत्र लिख रहा हूँ। महोदय जे०एन०यू० में जो कथित तौर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, उसके पोस्टर का जो शीर्षक था वो ही मेरे इस पत्र का केंद्र बिंदु है। उस शीर्षक में कहा गया कि अफज़ल गुरु की “न्यायिक हत्या” (Judicial Killing) की गई।

contempt of court

ओमर खालिद के संगठन की तरफ से लगाया गया पोस्टर

महोदय जहाँ तक मुझे पता है स्वयं माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने दिशा निर्देश में कही है कि किसी भी व्यक्ति को फाँसी की सजा “दुर्लभ में दुर्लभतम” (rarest of the rare) परिस्थितियों में ही दी जायेगी। ऐसे में जब माननीय न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अफज़ल गुरु को 2001 के भारतीय संसद पर हमले के आरोप में दोषी ठहराये जाते हुए फाँसी की सजा दी, तो मुझे इसमें रत्ती भर संदेह भी नहीं हुआ कि अफज़ल गुरु भारतीय लोकतंत्र पर हुए उस खौफनाक हमले का दोषी होगा।

अफज़ल गुरु ने अपने बचाव कि लिए उपलब्ध सभी विकल्पों को अंतिम समय तक अपनाया परंतु उसे हर बार न सिर्फ दोषी पाया गया अपितु माननीय न्यायालय ने उसकी सजा की प्रवृत्ति को बदलने या फिर कम करने से भी मना करते हुए यह स्थापित कर दिया कि अफज़ल गुरु अपने अपराध के लिए मृत्यदण्ड का ही हकदार है। भारतीय संविधान जो किसी व्यक्ति के प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को इतना महत्वपूर्ण मानता है कि राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में भी अनुच्छेद 21 निलंबित नहीं होता है। अगर ऐसे प्रावधानों के बाद भी अफज़ल गुरु को फाँसी दी गई तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि माननीय न्यायालय ने पूर्ण विवेक से इस निर्णय को लिया होगा।

इसके बावजूद अफज़ल गुरु ने अंतिम विकल्प के रूप में महामहिम राष्ट्रपति महोदय से क्षमा याचना की, जिसे माननीय राष्ट्रपति महोदय ने भी पूर्णविवेक के आधार पर खारिज कर दिया और अफज़ल गुरु को उसके कुकृत्य का यथोचित दण्ड प्राप्त हुआ।

इतनी कठिन प्रक्रिया को अपनाने के बावजूद जब ऐसे अपराधी के दण्ड को “न्यायिक हत्या” बोला जाये, तो माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय क्या यह माननीय न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) नहीं है? क्या यह भारत के महामहिम राष्ट्रपति और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के विवेक पर प्रश्नचिह्न लगाकर उसे विवेकहीन नहीं बताता है?

महोदय यह कोई पहला वाकिया नहीं है। महोदय अभी कुछ समय पहले की ही बात है जिस दिन याकूब मैमन को फाँसी की सजा दी जाने वाली थी, उस दिन रात को ढाई बजे भी माननीय न्यायालय ने आखिरी सुनवाई का मौका दिया था। मुझे नहीं मालूम कि दुनिया के किसी और देश में इतना स्पष्ट न्याय किया जाता हो। फिर भी याकूब मैमन के संबंध में भी हैदराबाद के एक विश्वविद्यालय में ऐसा ही आयोजन हुआ और पुन: न सिर्फ माननीय सर्वोच्च न्यायालय अपितु महामहिम राष्ट्रपति के विवेक को चुनौती दी गई। क्या यह माननीय न्यायालय की अवमानना और महामहिम राष्ट्रपति के विशेषाधिकार का हनन नहीं है?

जो लोग ऐसी बातें करते हैं उनका बस एक ही तर्क होता है कि हमें बोलने की आजादी है। माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय मैं कोई संविधान विशेषज्ञ नहीं हूँ, फिर भी मुझे इतना पता है कि संविधान का जो अनुच्छेद 19(1) बोलने की आजादी देता है, उसी अनुच्छेद की धारा 19(2) इस आजादी पर युक्तियुक्त निर्बंधन भी लगाती है। इसमें लिखा हुआ है कि यह निर्बंधन राष्ट्र की एकता अखण्डता को खतरे, न्यायपालिका की अवमानना के आधार पर लगाया जा सकता है। ऐसे में माननीय न्यायालय ने क्यों अफज़ल के मृत्युदण्ड को “न्यायिक हत्या” कहे जाने को न्यायपालिका की अवमानना नहीं माना और इसका स्वत: संज्ञान लेते हुए क्यों कोई कार्यवाही नहीं की, यह मेरी समझ से परे है।

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय मुझे समझ नहीं आता है कि मीडिया द्वारा कैसे यह प्रचार किया जा रहा है कि “भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह” जैसे नारों को कुछ लोगों का सरकार के प्रति विरोध करार दिया जा रहा है? महोदय अाप इस देश के सबसे बड़े न्यायाधीश हैं और संविधान की सर्वोच्चता ही नहीं देश की एकता और अखण्डता को भी सुनिश्चित रखना आपका उत्तरदायित्व भी है और आप इसके सक्षम प्राधिकारी भी हैं। मेरी आपसे विनती है कि माननीय न्यायालय सारे देश को बताये कि बोलने की आजादी कहाँ तक है और कितनी है? वरना ये मीडिया वाले और राजनेता इस आजादी की आड़ में इस देश को कहाँ ले जायेंगे, इसका ईश्वर ही मालिक है।

मेरा निजी तौर पर मानना है कि अगर माननीय न्यायालय इस विषय पर स्वत: संज्ञान लेकर कार्यवाही करती, तो इस देश के लिए शायद ज्यादा अच्छा होता क्योंकि तब न तो राजनीतिक रोटियाँ सिक पातीं और न ही खबरों का धंधा हो पाता। माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय मुझे उम्मीद है कि इस आम भारतीय की आवाज इस देश में न्याय की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े न्यायाधीश तक अवश्य पहुँचेगी।

महोदय अगर मुझसे कोई गलती हो गई हो तो इसे मेरा अल्प ज्ञान समझ कर क्षमा कर दें।

* इस पत्र को मैं छद्मनाम से इसलिए भेज रहा हूँ ताकि न तो इस पर कोई राजनीति हो सके और न ही मुझे या मेरे पत्र को मीडिया वाले अपने धंधे की कमाई बढ़ाने जरिया बना सकें।

– नकली चाणक्य उवाच
( एक आम भारतीय )

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