Saturday, May 25, 2024
HomeHindiबेल और जेल की कशमकश में भारतीय न्याय व्यवस्था

बेल और जेल की कशमकश में भारतीय न्याय व्यवस्था

Also Read

किसी की नजर में एक सामाजिक कार्यकर्ता, तो किसी की नजर में धोखाधड़ी की आरोपी- तीस्ता सीतलवाड़, एक बार फिर से चर्चा में है। लेकिन उनसे भी ज्यादा चर्चा में है सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हे कुछ ही घंटों के भीतर अंतरिम बेल दे देना। लोग इस बात पर हैरानी व्यक्त कर रहे हैं कि एक तरफ तो कुछ लोगों को बेल पाने के लिए महीनों- सालों का इंतजार करना पड़ता है, वहीं कुछ लोग महज कुछ ही घंटों में जेल और बेल की दूरी को कैसे पाट लेते हैं। इसका जवाब छिपा है भारतीय न्यायालय की बेल और बॉन्ड प्रणाली में, जिसे आज हम जानने की कोशिश करेंगे।

बेल मिलने के कानूनी पहलू

आमतौर पर बेल सत्र न्यायालय या हाई कोर्ट द्वारा सीआरपीसी, 1973 के अनुच्छेद 436 (जमानती अपराध), अनुच्छेद 437 (गैर जमानती अपराध) और अनुच्छेद 438 (अंतरिम बेल) के तहत दी जाती है। वैसे तो कुछ मामलों, जैसे हिमांशु चंद्रवादन देसाई बनाम गुजरात, में यह कहा गया है कि बेल देने या न देने का अंतिम फैसला हाई कोर्ट पर छोड़ दिया जाना चाहिए, मगर फिर भी सुप्रीम कोर्ट इसमें एक सक्रिय प्रतिभागी की भूमिका निभाता है।

इसका कारण सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र बनाम कैप्टन बुद्घिकोटा सुब्बा राव के मामले में बताते हुए कहा था, “यह सच है कि इन मामलों में हमारी भूमिका कम होनी चाहिए। मगर चूंकि ये मामले न्यायमूर्तियों के विवेक पर भी निर्भर करते हैं, ऐसे में एक न्यायिक अनुशासन बनाए रखने के लिए हमारा इन मामलों में दखल देना जरूरी हो जाता है”। अब क्योंकि भारत में एकीकृत न्याय व्यवस्था है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बेल के मामलों में दखल देना कोई ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य नही लगता।

अब यह तो बात हुई कि बेल देता कौन है। अब सवाल बनता है कि बेल दी किसे जाए? इसका जवाब सीआरपीसी के 33वें अध्याय में छिपा है। कोई भी आरोपी, चाहे उस पर जमानती या गैर जमानती अपराध का आरोप हो, वह बेल के लिए आवेदन कर सकता है। हालांकि इसकी कुछ शर्तें होती हैं और साथ ही साथ कुछ अपवाद भी होते हैं। इन अपवादों के साथ दिक्कत यह है कि जैसे ही यह बेल की प्रक्रिया में आते हैं, सारी प्रक्रिया लगभग खोखली सी हो जाती है और अंततः सारा मामला न्यायमूर्तियों के विवेक पर चला जाता है। उन्हे ठीक लगा तो बेल दी अन्यथा अर्जी खारिज।

अब ऐसे किसी निष्पक्ष मानदंड की अनुपस्थिति में मामला कई बार पेचीदा हो जाता है। जैसे दीपक अग्रवाल बनाम महाराष्ट्र मामले में बंबई हाई कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने से इंकार कर दिया। जबकि वह व्यक्ति सीआरपीसी के अनुच्छेद 436ए के तहत जमानत पाने के लिए योग्य था। अनुच्छेद 436ए के अनुसार अगर कोई आरोपी अपने आरोप सिद्ध हो जाने की स्थिति में मिलने वाली अधिकतम सजा का आधा हिस्सा जेल में काट लेता है, तो वह बेल के लिए योग्य होगा। उपर्युक्त मामले में आरोपी जिस अपराध के लिए जेल में 6 साल काट चुका था उसकी अधिकतम सजा 7 साल थी। अब क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के जजों का विवेक हाई कोर्ट के जजों के विवेक से अलग था, तो मामला जब उच्चतम न्यायालय में गया, तो उसे जमानत मिल गई।

तीस्ता सीतलवाड के मामले में भी यही अलग विवेक देखने को मिला। जब हाई कोर्ट के अनुसार, क्योंकि तीस्ता पर अनुच्छेद 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत मामला दर्ज है, जो एक गैर जमानती अपराध है, उसे जमानत नही मिल सकती। मगर सुप्रीम कोर्ट ने उसे तीव्र गति से कुछ ही घंटों के भीतर जमानत दे दी।

बेल देने और लेने के बीच एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर ध्यान देना जरूरी है, वह है बेल मिलने की प्रक्रिया। यह जानने में तो सबसे सरल प्रतीत होती है, मगर हकीकत में भारतीय समाज के विरोधाभास का प्रतीक बन चुकी है। दरअसल बेल लेने के लिए एक बॉन्ड जमा कराने की आवश्यकता होती है, जिसकी राशि न्यायमूर्तियों के विवेक पर निर्भर करती है।

यह जानकर हैरानी हो सकती है कि भारत में 75 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं। उनमें से अधिकतर लोग, जो बेल पाने के हकदार हैं, वे सिर्फ इसलिए बेल नही ले पाते क्योंकि उनके पास बॉन्ड जमा करा पाने योग्य राशि भी नही होती। छत्तीसगढ़ के भवान सिंह, जय सिंह और सुखसेन गोंड बेल मिलने के बावजूद 9 साल तक जेल में रहे क्योंकि उनके पास बॉन्ड भरने के लिए 5 हज़ार रुपए भी नही थे। कुछ दशक पहले, जस्टिस कृष्णा अय्यर ने इस बॉन्ड प्रणाली के खिलाफ आवाज जरूर उठाई थी, मगर यह प्रणाली आज भी जस की तस है।

आज जब न्यायिक सक्रियता अपने चरम पर है उस समय बेल के लिए एक निष्पक्ष मानदंड और बॉन्ड के लिए एक व्यावहारिक प्रक्रिया, समय की जरूरत है। लोगों का न्यायिक व्यवस्था में विश्वास बना रहे इसके लिए यह जरूरी है कि इन सुधारों को जितनी जल्दी लागू किया जा सके, उतनी जल्दी लागू कर दिया जाए।

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

- Advertisement -

Latest News

Recently Popular