Sunday, July 21, 2024
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संविधान निर्माता ने बौद्ध धर्म अपनाया, इस्लाम क्यों नहीं? एक वामपंथी से एक सनातनी का शाश्त्रार्थ: भाग-२

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

हे मित्रों पिछले अंक में हमने देखा था कि किस प्रकार हमारे जन्म से सनातनी पर कर्म से वामपंथी मित्र ने बाबासाहेब को आधार बनाकर सनातन धर्म की कटु आलोचना शुरू की थी और हमने उसका उचित और समुचित उत्तर देते हुए बाबासाहेब के जीवन काल का कुछ अंश प्रस्तुत किया था। अब आइये देखते हैं कि “बाबासाहेब भीमराव रामजी आंबेडकर का इस्लाम के बारे में विचार क्या था?

वर्ष १९५५  में उन्होंने ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ यानी ‘बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया’ की स्थापना की।उन्होंने अपने अंतिम प्रसिद्ध ग्रंथ, ‘द बुद्ध एंड हिज़ धम्म’, जो उनकी मृत्यु के पश्चात सन १९५७  में प्रकाशित हुआ की प्रस्तावना में लिखा हैं कि “मैं बुद्ध के धम्म को सबसे अच्छा मानता हूं। इससे किसी धर्म की तुलना नहीं की जा सकती है। यदि एक आधुनिक व्यक्ति जो विज्ञान को मानता है, उसका धर्म कोई होना चाहिए, तो वह धर्म केवल बौद्ध धर्म ही हो सकता है। सभी धर्मों के घनिष्ठ अध्ययन के पच्चीस वर्षों के बाद यह दृढ़ विश्वास मेरे बीच बढ़ गया है।मैं भगवान बुद्ध और उनके मूल धर्म की शरण जा रहा हूँ। मैं प्रचलित बौद्ध पन्थों से तटस्थ हूँ। मैं जिस बौद्ध धर्म को स्वीकार कर रहा हूँ, वह नव बौद्ध धर्म या नवयान हैं।” 

दिनांक १४ अक्टूबर १९५६  को नागपुर शहर में आम्बेडकर जी  ने स्वयं और अपने  समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक धर्मांतरण समारोह का आयोजन किया और अपनी पत्नी सविता एवं कुछ सहयोगियों के साथ भिक्षु महास्थवीर चंद्रमणी द्वारा पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। 

हे वामपंथी मित्र अब हम तुम्हे बाबासाहेब के विचार इस्लाम और मुस्लमान के प्रति क्या थे, बताते हैं :- 

१:- बाबासाहेब की दृष्टि में मुस्लमान देशभक्त नहीं होते:- बाबासाहेब ने अपनी किताब ” Pakistan or Partition of India” (जिसका हिंदी में अनुवाद “पाकिस्तान या भारत का विभाजन” के रूप में प्रकाशित हुआ ) में लिखा है कि “इस्लाम एक बंद खिड़की तरह है जो मुसलमानो और गैर मुसलमानो के बिच भेद करता है। इस्लाम में जिस भाईचारे की बात की गयी है वो मानवता का भाईचारा नहीं है बल्कि उसका मतलब सिर्फ मुसलमानो का मुसलमानो से भाईचारा है। मुसलमानो के भाईचारे का फायदा सिर्फ उनके अपने लोगो को ही मिलता है और जो गैर मुस्लिम हैं उनके लिए इस्लाम में सिर्फ घृणा और शत्रुता ही है। मुसलमानो की वफ़ादारी उस देश के लिए नहीं होती जिसमे वो रहते हैं। बल्कि उनकी वफ़ादारी अपने धर्म के लिए होती है जिसका की वो पालन करते हैं।

२:- भारत के सारे मुसलमानो को पाकिस्तान भेज देना चाहिए :- बाबसाहेब अपनी इसी किताब “Pakistan or Partition of India” में लिखते हैं कि “जनसंख्या के तबादले का मजाक उड़ाने वालों को इन देशों (टर्की और ग्रीस) की अल्पसंख्यको की समस्या का अध्ययन करना चाहिए ताकि वो जान पाएं कि अल्पसंख्यको से जुडी समस्या का एकमात्र हल जनसंख्या की अदला बदली ही है।साप्रदायिक शांति स्थापित करने का टिकाऊ तरीका अल्पसंख्यको की अदला बदली ही है। ये व्यर्थ होगा कि हिन्दू और मुस्लमान एक दूसरे को सरंक्षण देने के ऐसे उपाय खोजने में लगे रहें जो इतने असुरक्षित पाए गए हैं। यदि ग्रीस, टर्की और बुल्गारिया जैसे सिमित साधनो वाले छोटे छोटे देश भी यह काम पूरा कर चुके हैं तो ये मानने का कोई कारण नहीं है कि हिंदुस्तानी ऐसा नहीं कर सकते।

३ :- मुसलमान भारत में रहेंगे तो कभी शांति नहीं हो सकती :- बाबसाहेब अपनी इसी किताब “Pakistan or Partition of India” में लिखते हैं कि “ये बात स्वीकार कर लेना चाहिए कि पाकिस्तान बनने के बाद भी हिंदुस्तान साम्प्रदायिक समस्या से मुक्त नहीं हो पायेगा। सीमाओं को बाँट देने से पाकिस्तान तो एक मुस्लिम राष्ट्र बन जायेगा लेकिन हिंदुस्तान एक मिली जुली आबादी का देश ही बना रहेगा। मुसलमान पुरे देश में बिखरे हुए हैं। इसलिए किसी भी तरह की सीमाएं बनाने से हिंदुस्तान एक ही धर्म का देश नहीं बन पायेगा। हिंदुस्तान को एक ही धर्म का देश बनाने का एकमात्र तरीका यही है कि जनसंख्या की अदला बदली की जाये। जब तक ऐसा नहीं किया जायेगा, हिंदुस्तान में बहुसंख्यक यानि हिन्दू और अल्पसंख्यक यानि मुस्लिमो के बीच समस्या बनी रहेगी।

४:- मुसलमान भारत के खिलाफ “जेहाद” छेड़ सकते हैं :- बाबसाहेब अपनी इसी किताब ” Pakistan or Partition of India” में लिखते हैं कि “तथ्य यह है कि भारत, चाहे एक मात्र मुस्लिम शासन के अधीन ना हो, दार -उल -हर्ब (यानि जंहा इस्लाम का शासन नहीं है) है। और इस्लामी सिद्धांतो के अनुसार मुसलमानो द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी कामयाबी के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति यानि किसी मुस्लिम देश की मदद भी ले सकते हैं, और यदि कोई मुस्लिम देश जेहाद की घोषणा करना चाहता है तो उसकी सफलता के लिए भारत के मुस्लमान  उसे मदद भी दे सकते हैं। 

५ :- मुसलमान कभी भी हिन्दुओं की सरकार को स्वीकार नहीं  करेंगे :- बाबसाहेब अपनी इसी किताब “Pakistan or Partition of India” में लिखते हैं कि “हिन्दुओ से नियंत्रित और शासित  सरकार की सत्ता मुसलमानो को किस सीमा तक स्वीकार होगी इसके लिए ज्यादा माथापच्ची करने की जरुरत नहीं है। मुसलमानो के लिए हिन्दू काफिर हैं और उनकी कोई सामाजिक स्थिति यानि हैसियत नहीं होती है। इसलिए जिस देश में काफिरों  का शासन हो, वो देश मुसलमानो के लिए दार -उल -हर्ब है। ऐसी स्थिति में ये साबित करने के लिए सबूत के रूप में खलीफत आंदोलन को देख सकते हैं। इस आंदोलन के लिए हिन्दू काफी कुछ कर  रहे थे तब भी मुसलमान ये नहीं भूले की उनकी तुलना में हिन्दू निम्न और घटिया कौम है।

६:- मुस्लिम शरिया को देश के कानून से ऊपर मानते हैं :- बाबसाहेब अपनी इसी किताब “Pakistan or Partition of India” में लिखते हैं कि “इस्लाम ये कहता है कि अगर किसी गैर मुस्लिम देश में मुसलमानों के कानून यानि शरिया और उस देश के कानून के बीच विवाद पैदा हो जाये तो इस्लामिक कानून को ऊपर यानि सही माना जाये। इस तरह मुसलमानो के लिए ये सही माना जाएगा कि वो मुस्लिम कानून का पालन करें और उस देश के कानून को माने।

७ :- जब मुसलमानों ने की डॉ अम्बेडकर से छुआछूत :- बाबसाहेब अपनी इसी किताब ” Pakistan or Partition of India” में लिखते हैं कि “वो रमजान का महीना था। हमने दौलताबाद किले के बाहर बने तालाब में हाथ मुंह धोये ही थे कि एक बूढ़ा मुसलमान चिल्लाते हुए बोला “तुम अछूतो ने तालाब का पानी गंदा कर दिया। थोड़ी ही देर में कई मुसलमान जमा हो गए और हमें गलियां देने लगे कि “तुम अछूतो का दिमाग खराब हो गया है, तुम्हारी औकात क्या है ? तुम्हे सबक सिखाने की जरुरत है” हमने समझाने की कोशिश की लेकिन मुसलमान हमारी बात सुंनने को तैयार नहीं थे। वो हमें इतनी गन्दी गन्दी गालियां दे रहे थे कि हम भी बर्दास्त नहीं कर पा रहे थे। वंहा दंगे जैसे हालात बन गए थे और हत्या भी हो सकती थी। तब मेरा धैर्य खत्म हो गया। मैनें थोड़ा गुस्से में पूछा “क्या तुमको तुम्हारा धर्म यही सिखाता है? क्या तुम ऐसे किसी अछूत को पानी लेने से रोकोगे जो मुसलमान बन जाये? ये सुनकर वो चुप हो गए। इस किस्से से साफ होता है कि कैसे एक “अछूत हिन्दू” मुसलमान के लिए भी अछूत होता है।

८ :- मुसलमानों को अपना दोस्त ना माने दलित:- पद्मभूषण धनंजय कौर ने  अपनी इसी किताब “डॉक्टर अम्बेडकर -जीवन चरित्र” में लिखते हैं कि “पाकिस्तान के चक्कर में फंसा दलित समाज हर उपलब्ध मार्ग और साधन से भारत आ जाए। मैं कहना चाहता हूँ कि पाकिस्तान और हैदराबाद रियासत के मुसलमानो पर भरोसा करने से दलित समाज का विनाश होगा। दलित वर्ग हिन्दू समाज से नफ़रत करता है, इसलिए मुसलमान हमारे मित्र हैं ये मानने की बुरी आदत दलितों कोलाज गई है, जो अत्यंत गलत है। मुसलमान तो अपने लिए दलितों का साथ चाहते हैं लेकिन बदले में वो कभी दलितों का साथ नहीं देते हैं (डॉ अम्बेडकर का बयान जो दिनांक २७ नवम्बर १९४७  (फ्री प्रेस जर्नल में प्रकाशित हुआ था)|

९:- बुर्के की वजह से मुस्लिम नौजवान यौन विकृति (सेक्सुअल डिसऑर्डर) के शिकार:- बाबसाहेब अपनी इसी किताब “Pakistan or Partition of India” में लिखते हैं कि “पर्दा प्रथा मुस्लिम पुरुषों की नैतिकता पर बुरा प्रभाव डाला है। पर्दा प्रथा के कारण कोई मुसलमान अपने घर परिवार से बाहर की महिलाओ से कोई परिचय नहीं कर पाता है। घर की महिलाओं से उसका सम्पर्क यदा कदा बातचीत तक ही सीमित रहता है। महिलाओं से पुरुषों की ये पृथकता निश्चित रूप से पुरुष के नैतिक बल पर विकृत प्रभाव डालती है। ये कहने के लिए किसी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं कि ऐसी सामाजिक प्रणाली से जो पुरुषों और महिलाओं के बीच के संपर्क को काट दें उससे यौनाचार (सेक्सुअल एक्टिविटी) के लिए ऐसी अस्वस्थ प्रवृत्ति पैदा होती है, जो अप्राकृतिक, गन्दी आदतों और अन्य साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। ऐसा नहीं है कि पर्दाप्रथा हिन्दुओं में नहीं है, लेकिन इस्लाम में पर्दाप्रथा को धार्मिक  मान्यता मिली हुई है जबकि हिन्दुओं में ऐसा नहीं है। हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों में पर्दाप्रथा की जड़ें काफी गहरी हैं।

१०:- मुसलमान समाज सुधार के प्रबल विरोधी हैं :- बाबसाहेब अपनी इसी किताब “Pakistan or Partition of India” में लिखते हैं कि “मुसलामानों ने समाज में मौजूद बुराइयों के खिलाफ कभी कोई आंदोलन नहीं किया, हिन्दुओं में भी सामाजिक बुराईंयां मौजूद हैं, लेकिन अच्छी बात ये है कि वो अपनी इस गलती को मानते हैं और उसके खिलाफ आंदोलन भी चला रहे हैं। लेकिन मुसलमान तो ये मानते थी नहीं है कि उनके समाज में कोई बुराई है। दरअसल मुसलमान समाज सुधार के प्रबल विरोधी हैं। मुसलमानों को ये सिखाया जाता है कि इस्लाम के अलावा कंही सुरक्षा नहीं है और इस्लामी कानून से सच्चा कोई कानून नहीं है। इसी वजह  मुसलमान खुद के अलावा कुछ और सोच पाने के काबिल नहीं बचे हैं। उन्हें इस्लामी विचार के अलावा कोई और विचार पसंद ही नहीं आता है। मुसलमानों के जेहन में ये गहराई से बैठा हुआ है कि सिर्फ वो ही सच्चे हैं और सिर्फ वो ही विद्वान हैं।

हे मित्रों जब तक हम विचारों को बताते रहे, तब तक हमारे वामपंथी मित्र का मुंह खुला का खुला ही रहा, अत: हमने उन्हें होश में लाकर पूछा कि हे सनातन विरोधी वामपंथी ये तो मात्र १० विचार हमने एक ही किताब से निकालकर तुम्हारे सामने प्रस्तुत कर दी, बाबासाहेब ने तो ऐसी कई किताबें लिखी हैं, तनिक सोचो उन किताबों में भी तो भारत रत्न बाबासाहेब के विचार ही होंगे।

मित्रों सच पूछिए तो हमारे वामपंथी मित्र के पास कोई उत्तर नहीं बचा था जिसे देकर वो अपने मिथ्या घमंड को संतुष्ट कर सकें अत: फिर मुरझाये हुए लता की तरह बिना सुर और ताल के लहराते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए। मित्रों हम आपसे अनुरोध करते हैं कि बाबासाहेब की लिखी गयीं पुस्तकों का अध्ययन अवशय करें और इन वामपंथी समुदाय को उचित और समुचित उत्तर दें।

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