Wednesday, September 28, 2022
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ED (प्रवर्तन निदेशालय) की सार्वभौमिकता बरकरार:- भ्रष्टाचार के शहंशाहों और मनी लाउंड्रिंग के बादशाहों में मातम

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

जी हाँ मित्रों जिस प्रकार भ्रष्टाचार के महारथियों और काले धन के कारोबारी नेताओं पर ED ने कार्यवाही आरम्भ की है, तब से उनमे हड़कंप मचा हुआ है। कांग्रेस पार्टी के तो आधे दर्जन से अधिक राष्ट्रिय स्तर के नेता (जिसमें श्रीमती सोनिया गाँधी और उनके पुत्र श्री राहुल गाँधी का नाम शामिल है) अपने अपने कर्मो के अनुसार ED के शिकंजे में है और ज्यादातर नेता जमानत पर अपनी जिंदगी जी रहे हैं।

मित्रों यंहा पर मैं आपको बताता चलूँ कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) २००२ के अंतर्गत ED को कार्यवाही करने का अधिकार प्राप्त होता है। इसका जन्म तो स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के शासन काल में ही हो चूका था, परन्तु इसे लागू नहीं किया जा सका था। प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) २००२ को मनमोहन सिंह की सरकार (जो श्रीमती सोनिया गाँधी के मार्गदर्शन में चल रही थी) ने वर्ष २००५ में लागू किया परन्तु इसका उपयोग स्वय की स्वार्थ सिध्दि के लिए ज्यादा किया। वर्ष २०१९ में संसोधन विधेयक लेकर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) २००२ में संसोधन करके ED के अधिकारों में और वृद्धि कर दी गयी और उसे कार्यवाही करने की पूरी छूट दे दी गयी।

मित्रो ताजा समाचार के अनुसार चले तो पश्चिम बंगाल में ममता दीदी की सरकार के सबसे विश्वासपात्र मंत्री श्री पार्थ चटर्जी का भंडाफोड़ ED के द्वारा कर दिया गया है और उन्हें उनके सकुच सहयोगियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है। श्री पार्थ चटर्जी शिक्षक भर्ती घोटाला के मुख्य कर्ता धर्ता के रूप में सामने आये हैं। ED ने उनके मुख्य सहयोगी अर्पिता मुखर्जी से अब तक ५० करोड़ से ऊपर की नगद राशि , कई बेनामी सम्पत्तियों के दस्तावेज और कई किलो सोना बरामद किया है।

खैर आपको विदित है की जैसे ही प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) २००२ से सम्बन्धित संशोधन विधेयक वर्ष २०१९ में परम आदरणीय श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी की सरकार द्वारा पारित किया गया, वैसे ही भ्रष्टाचारियों और काले धन के कारोबारियों द्वारा अलग अलग कई जनहित याचिकाएं आदरणीय सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल कर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) २००२ में वर्ष २०१९ में किये गए संशोधनों को चुनौती दी और इन्हे निरस्त करने की गुहार लगाई।

मित्रों २२/जुलाई /२०२२ को आदरणीय सर्वोच्च न्यायालय (जस्टिस एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सीटी रविकुमार की तीन-न्यायाधीशों की पीठ) ने सभी याचिकाकर्ताओं के अनवांक्षित उम्मीदों पर पानी फेरते हुए, जनता, समाज और देश के हित में एक प्रमुख आदेश पारित करते हुए प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के प्रावधानों को बरकरार अर्थात कायम रखा और इसके साथ ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शक्तियों को भी बरकरार रखा। शीर्ष न्यायालय ने सभी पक्षों को ध्यान से सुनते हुए अपना आदेश पारित किया और निम्नलिखित बिन्दुओ को स्पष्ट करते हुए कहा कि:१:- “गिरफ्तारी” और “जमानत” से संबंधित प्रावधान उचित हैं और इसका प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के उद्देश्यों से सीधा संबंध है।

२:- आरोपी को शिकायत की प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर ECIR ) की प्रति (Copy) की आपूर्ति करना आवश्यक नहीं है।

३:- आरोपी को उन आधारों के बारे में सूचित करना पर्याप्त है जिनके आधार पर उसे गिरफ्तार किया जा रहा है।

४:-“इस अधिनियम के तहत नागरिक कार्रवाई (संलग्नक Attachment और जब्ती Seize) के माध्यम से संपत्ति (अपराध की आय Proceeds of Crime) के खिलाफ कार्यवाही के लिए जांच / जांच के तंत्र को ध्यान में रखते हुए, प्राथमिकी के पंजीकरण के विपरीत औपचारिक रूप से ईसीआईआर दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है।

५ :- ईडी (ED) द्वारा न्याय पटल पर प्रेषित किये गए इस कथन में बल है कि ईसीआईआर (ECIR) अपराध की आय (Proceeds of Crime) से जुड़ी प्रक्रिया या गतिविधि में शामिल व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई या अभियोजन शुरू करने से पहले विभाग द्वारा बनाया गया एक आंतरिक दस्तावेज (Internal Document ) है। ED द्वारा व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधारों के बारे में सूचित कर दिया जाता है जो संविधान के अनुच्छेद 22(1) के अधिदेश का पर्याप्त अनुपालन है।

६:-“अपराधों का “मनी लॉन्ड्रिंग” के अपराध के गठन के लिए प्रासंगिक मानने के लिए वर्गीकरण या समूहीकरण करना विधायी नीति का विषय है। संसद ने अपने विवेक से निर्दिष्ट आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप प्राप्त संपत्ति को अनुसूची (Schedule) में उल्लिखित संबंधित कानून के अंतर्गत अपराध माना है।”

७:-“कुछ अपराध संबंधित कानून के तहत गैर-संज्ञेय अपराध (अर्थात जिसमें २ से काम वर्ष की सजा का प्रावधान होता है) हो सकते हैं या उन्हें मामूली और कंपाउंडेबल अर्थात क्षमायोग अपराध माना जा सकता है, फिर भी, संसद, अपने ज्ञान में, अपराध की आय (Proceeds of Crime) से संबंधित प्रक्रिया या गतिविधि के संचयी प्रभाव को समझती है। देश की आर्थिक स्थिरता, संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा पैदा करने वाली ऐसी आपराधिक गतिविधियों से उत्पन्न और इस प्रकार, इसे धन शोधन के अपराध के रूप में मानने के लिए एक साथ समूहीकृत करना, विधायी नीति का विषय है। इस तरह की नीति पर दूसरा अनुमान लगाने के लिए कोई मार्ग न्यायालय के लिए उपलब्ध नहीं है।

८:- “प्रवर्तन निदेशालय, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के अधिकारी, पुलिस की श्रेणी में नहीं आते अत: किसी जांच के दौरान प्रवर्तन निदेशालय, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के अधिकारीयों के समक्ष दर्ज बयान एक “वैध सबूत हैं।”

९:-शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि हम इस बात से सहमत नहीं हैं कि “मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध, टाडा अधिनियम के तहत निपटने वाले आतंकवाद के अपराध की तुलना में कम जघन्य अपराध है या मनी-लॉन्ड्रिंग के अपराध से निपटने में कोई अनिवार्य राज्य हित नहीं है।” अंतर्राष्ट्रीय निकाय काफी समय से नियमित रूप से मनी-लॉन्ड्रिंग के खतरे पर चर्चा कर रहे हैं और उन्होंने अपराधियों पर मुकदमा चलाने , वित्तीय प्रणालियों और देशों की संप्रभुता और अखंडता पर सीधा प्रभाव डालने वाले अपराध की आय को कुर्क करने और जब्त करने सहित धन-शोधन की रोकथाम और उसके खतरे से निपटने के लिए कड़े कानून बनाने की जोरदार सिफारिश की।”

१०:-“इस अपराध की गंभीरता को कम करने का आधार नहीं हो सकता है। सजा की मात्रा विधायी नीति का मामला है। अपराध के लिए प्रदान की गई सजा निश्चित रूप से अपराध की गंभीरता को तय करने के सिद्धांतों में से एक है। हालांकि, यह नहीं कहा जा सकता है कि यह याचिकाकर्ताओं के तर्क के अनुसार अपराध की गंभीरता को तय करने वाला एकमात्र कारक है। मनी लॉन्ड्रिंग जघन्य अपराधों में से एक है, जो न केवल राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है, बल्कि अन्य जघन्य अपराधों को भी बढ़ावा देता है, जैसे कि आतंकवाद, एनडीपीएस अधिनियम से संबंधित अपराध, आदि। यह एक सिद्ध तथ्य है कि अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क जो घरेलू उग्रवादी समूहों का समर्थन करता है वह देश भर में बेहिसाब धन के हस्तांतरण पर निर्भर करता है, इस प्रकार, कल्पना के किसी भी हिस्से से, यह नहीं कहा जा सकता है कि धन-शोधन के अपराध के लिए जमानत की कठोर शर्तें प्रदान करने में कोई अनिवार्य राज्य हित नहीं है।”

११:-अदालत ने यह स्पष्ट किया कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) की धारा ३ के तहत अपराध एक अनुसूचित अपराध से संबंधित आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप संपत्ति के अवैध लाभ पर निर्भर है। यह ऐसी संपत्ति से जुड़ी प्रक्रिया या गतिविधि से संबंधित है जो मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध का गठन करती है।

हालांकि, अदालत ने माना कि 2019 में पीएमएलए में धन विधेयक के रूप में संशोधनों को लागू करने के सवाल पर सात न्यायाधीशों की एक बड़ी पीठ द्वारा फैसला किया जाना है, जिनके समक्ष वही प्रश्न पहले से ही लंबित है।

आइए समझते हैं कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) की कौन सी धाराएं अदालती जांच के दायरे में थीं और सभी धाराओं में शीर्ष न्यायालय ने क्या बरकरार रखा है:-
१) धारा ३:- मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध को परिभाषित करता है। शीर्ष न्यायालय ने माना कि काला धन पैदा करना भी मनी लॉन्ड्रिंग है, यहां तक ​​कि वास्तव में इसे लॉन्ड्रिंग करने या इसे सफेद धन में बदलने के सबूत के आभाव में भी यह मनी लांड्रिंग है।
२) धारा ५ और ८ (४ ): इसके तहत ईडी के पास आरोपी की संपत्ति कुर्क करने की विवेकाधीन शक्तियां हैं, जिसे अवैधानिक मान कर चुनौती दी गयी थी पर माननीय शीर्ष न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि आरोपियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय संबंधित अधिनियम में दिया गया है।
३) धारा १७:- यह धारा ईडी को न्यायिक अनुमति के बिना संदिग्ध संपत्ति में प्रवेश करने और तलाशी लेने का अधिकार देती है, इसे भी अवैधानिक मानकर चुनौती दी गयी थी और निरस्त करने हेतु प्रार्थना की गयी थी परन्तु शीर्ष न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया और प्रावधान को बरकरार रखा।
४) धारा १९ :- यह धारा ईडी को गिरफ्तारी की शक्तियां देती है। शीर्ष न्यायालय ने इसकी संवैधानिकता को बरकरार रखा।
५) धारा २४ :- पीएमएलए मामले में, न्यायाधीश को यह मान लेना चाहिए कि आरोपी व्यक्ति तब तक दोषी है जब तक कि वह इसे अस्वीकार नहीं कर देता। शीर्ष न्यायालय ने इस प्रावधान को वैध पाया।
६) धारा ४५ : जमानत की शर्तों से संबंधित है। शीर्ष न्यायालय ने माना कि पीएमएलए के उद्देश्य को हासिल करने के लिए यह प्रावधान जरूरी है।
७) धारा ५० : शीर्ष न्यायालय ने कहा कि धारा ५० के तहत कार्यवाही एक जांच है जो आपराधिक जांच नहीं है। ईडी अधिकारी को इसलिए पुलिस की श्रेणी में नहीं रखा जाता। जांच के लिए सीआरपीसी के नियम ईडी पर लागू नहीं होते।

मित्रों इस प्रकार हम देखते हैं कि, भ्रष्टाचारियों के अरमानो पर कुठाराघात करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने ED की सार्वभौमिकता को बरकरार रखा और उसके अधिकारों में किसी भी प्रकार की कटौती करने से इंकार कर दिया। मित्रों नवाब मलिक, संजय राउत, राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी, ममता बनर्जी के भतीजे और उनकी पार्टी के कई नेता, झारखण्ड राज्य के कई नेता, बिहार राज्य के कई नेता, देश को छ्लने वाले कई बड़े बड़े सरकारी अफसर अर्थात लालफितशाह आज ED के जांच का सामना कर रहे हैं, ज़रा सोचिए यदि ED इतनी शसक्त नहीं होती तो क्या इतने ऊंचे कद के लोग जांच के दायरे में आ सकते थे, नहीं ना। मित्रों पिछले आठ वर्षो में ED ने ५००० से ज्यादा छापेमारी की कार्यवाही कि है और 1 लाख करोड़ से ज्यादा की रकम और सम्पत्ति जब्त की है। ED की स्वतन्त्रता यूँ हि बरकरार रखकर सर्वोच्च न्यायालय ने समाज को स्वच्छ रखने की दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया है।

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