Sunday, June 16, 2024
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The places of worship (special provisions) act, 1991, काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, १९९१
ACT NO. 42 OF 1991 (१९९१ का अधिनियम संख्यांक ४२)[१८ सितंबर, १९९१]

मित्रों आजकल भाग्यनगर (हैदराबाद) के गद्दार रजकरो का खून (ओवैसी) बड़ा उबाल मार रहा है, और जब से वाराणसी दीवानी न्यायालय ने ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे करने का आदेश दिया है तब से वो मानसिक विक्षिप्तता की स्थिति में पहुंच गए हैं और बार बार THE PLACES OF WORSHIP (SPECIAL PROVISIONS) ACT, 1991 की दुहाई देते हुए छाती पीट पीट कर चिल्ला रहे हैं की न्यायालय की कार्यवाही इस अधिनियम के प्रावधानो के विरुद्ध है।

चलीये देखते हैं की आखिर ये THE PLACES OF WORSHIP (SPECIAL PROVISIONS) ACT, 1991 है क्या और कैसे अस्तित्व में आया।

पृष्ठभूमि:-
मित्रों आपको याद होगा की वर्ष १९९१ में किस प्रकार हिन्दुओ ने अपनी एकजुटता का अप्रतिम परिचय देते हुए अद्भुत साहस और शौर्य से अयोध्या में प्रभु श्रीराम के पवित्र जन्मस्थान से विवादित ढांचे को धूल में मीला दिया था। उस समय उत्तर प्रदेश में वीर शिरोमणि स्व. श्री कल्याण सिंह जी का शासन था और केंद्र में स्व.श्री नरसिम्हा राव जी का शासन था।

चुंकि कांग्रेस का शासन था अत: मुसलिम तुष्टिकरण की निति तो अमल में लानी हि थी, अत: तथाकथित शांतिदूतों के तुष्टिकरण करने के लिए नरसिम्हा राव सरकार ने १८ सितम्बर १९९१ को इस अधिनियम को लागू कर दिया।

उद्देश्य:- यदि हम इस अधिनियम के उद्देश्य की बात करें तो ये कांग्रेस के द्वारा हम हिन्दुओ के साथ किया गया एक और छल या धोखा था, जो संविधान के विरुद्ध और देश के धर्मनिरपेक्षता वाले सिद्धांत का शीलभंग करता हुआ आज भी हमारे सामने खड़ा है।

इसके उद्देश्य के अनुसार:-इसे देश में स्थित सभी उपासना स्थल जो १५ अगस्त १९४७ से पूर्व जिस स्थिति में थे, उसी स्थिति में बनाये रखने और १५अगस्त १९४७ के पश्चात उनकी स्थिति में किसी भी प्रकार का सम्परिवर्तन (Conversion) करने से रोकता है अर्थात “किसी उपासना स्थल का संपरिवर्तन (conversion) प्रतिषिद्ध(prohibit) करने के लिए और १५ अगस्त, १९४७ को यथाविद्यमान (existed) किसी उपासना स्थल के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने तथा उससे संसक्त (connected) या उसके आनुषंगिक (incidental) विषयों का उपबंध करने के लिए इस अधिनियम को लागू किया गया।

प्रावधान:-
इस अधिनियम में कुल ७ धाराएं हैं। सबसे महत्वपूर्ण धारा ३ है।
आइये देखते हैं कि धारा ३ क्या कहती है।

उपासना स्थलों के संपरिवर्तन का वर्जन (Bar of conversion of places of worship)-

“कोई भी व्यक्ति (person) किसी धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग के किसी उपासना स्थल का उसी धार्मिक संप्रदाय के भिन्न अनुभाग के या किसी भिन्न धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग के उपासना स्थल में संपरिवर्तन नहीं करेगा।”
अगर अंग्रेजी में देखें तो धारा ३ कुछ इस प्रकार प्रावधान करती है:-“No person shall convert any place of worship of any religious denomination or any section thereof into a place of worship of a different section of the same religious denomination or of a different religious denomination or any section thereof”.

विश्लेषण:-
अब ज़रा इस धारा के अंतर्गत दिए गए प्रावधान के शब्दों पर ध्यान दे तो सर्वप्रथम जो शब्द ध्यान आकृष्ट करता है, वो है ” No Person ” या “कोई व्यक्ति”. अब “कोई व्यक्ति” शब्द को हम कैसे समझेंगे की यह किसकी ओर संकेत कर रहा है।

मित्रों आपने देखा होगा की किसी भी अधिनियम में जो धारा २ होती है, उसके अंतर्गत उस अधिनियम में प्रयोग में लाए जाने वाले कुछ प्रमुख शब्दों की परिभाषा दी गई होती है, अत: इस अधिनियम की भी धारा २ कुछ शब्दों की परिभाषा देती है, परन्तु रुकिए ये क्या, इस अधिनियम कि धारा २(a) ” Commencement of Act” , धारा २(b) “Conversion” की और धारा २(c) “place of Worship” की परिभाषा तो देते हैं, परन्तु “No Person” या “कोइ व्यक्ति” की परिभाषा तो है ही नहीं।

अब हम “Person” या “No Person” या “कोइ व्यक्ति” को कैसे समझेंगे और जब तक समझेंगे नहीं तब तक कैसे जानेंगे की धारा ३ के प्रावधान किसे प्रतिबंधित कर रहे हैं।

आइये Person की परिभाषा देखने का प्रयास करते हैं।
१:-Dictionary. Com इसके अनुसार:- Person means a human being, whether an adult or child:

२:-Wikipedia के अनुसार:- एक व्यक्ति (बहुवचन लोग या व्यक्ति) एक ऐसा प्राणी है जिसमें कुछ क्षमताएं या गुण होते हैं जैसे कि कारण, नैतिकता, चेतना या आत्म-चेतना, और सांस्कृतिक रूप से स्थापित सामाजिक संबंधों जैसे रिश्तेदारी, संपत्ति का स्वामित्व, या कानूनी जिम्मेदारी।(A person (plural people or persons) is a being that has certain capacities or attributes such as reason,morality, consciousness or self-consciousness, and being a part of a culturally established form of social relations such as kinship, ownership of property, or legal responsibility).

३:- Collins Dictionary के अनुसार:-एक व्यक्ति एक व्यक्तिगत इंसान है।( A person is an individual human being).

४:- Oxford Learner’s Dictionary.Com के अनुसार:-a human as an individual.

५:- Britannica Dictionary के अनुसार :- Person means “a human being”.

६:- बॉम्बे जनरल क्लॉज एक्ट, १९०४ भी ‘व्यक्ति’ शब्द को परिभाषित करता है। धारा ३ (३५) में दी गई उक्त परिभाषा नीचे प्रस्तुत की गई है: “३. परिभाषाएँ: इस अधिनियम में, और इस अधिनियम के शुरू होने के बाद किए गए सभी बॉम्बे और गुजरात अधिनियमों में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कुछ भी प्रतिकूल न हो, .. (३५) “व्यक्ति” में कोई भी कंपनी या संघ या व्यक्तियों का निकाय शामिल होगा, चाहे वह निगमित हो या नहीं (Bombay General Clauses Act, 1904 also defines the word ‘person’. The said definition in section 3(35) is extracted below : “3. Definitions : In this Act, and in all Bombay and Gujarat Acts made after the commencement of this Act, unless there is anything repugnant in the subject or context, .. (35). “Person” shall include any company or association or body of individuals, whether incorporated or not);

७:- दूसरे छोर पर नागरिकता अधिनियम है, जिसकी धारा २(f) इस प्रकार है: “व्यक्ति में कोई कंपनी या संघ या व्यक्तियों का निकाय शामिल नहीं है, चाहे वह निगमित हो या नहीं।” इसी तरह, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम १९५० की धारा २(जी) के तहत परिभाषा- “व्यक्ति”, जिसमें व्यक्तियों का एक निकाय शामिल नहीं है(At the other extreme is the Citizenship Act, section 2(f) of which reads thus : “Person does not include any company or association or body of individuals whether incorporated or not.” Similarly, the definition under Section 2(g) of Representation of People Act 1950, is “person” does not include a body of persons).

८:- आयकर अधिनियम में ‘व्यक्ति’ शब्द की परिभाषा बहुत व्यापक है और इसमें एक व्यक्ति, एक हिंदू अविभाजित परिवार, एक कंपनी, एक फर्म, व्यक्तियों का एक संघ या व्यक्तियों का निकाय शामिल है चाहे वह निगमित हो या नहीं, एक स्थानीय प्राधिकरण और प्रत्येक अन्य कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति (The definition of the word ‘person’ in Income Tax Act, is very wide and includes an individual, a Hindu Undivided Family, a company, a firm, an association of persons or body of individuals whether incorporated or not, a local authority and every other artificial juridical person).

९:-सैल्मंड ने ‘व्यक्ति’ को ‘किसी भी व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया है जिसे कानून अधिकारों और कर्तव्यों के लिए सक्षम मानता है’ या ‘एक प्राणी, चाहे वह मानव हो या न हो, जिसके अधिकार और कर्तव्य विशेषताएँ हैं (न्यायशास्त्र: १२ वां संस्करण पृष्ठ २९९] Salmond defines ‘person’ as ‘any being whom the law regards as capable of rights and duties’ or as ‘a being, whether human or not, of which rights and duties are the attributes (Jurisprudence : 12th Edition Page 299]

१०:- गुजरात कृषि भूमि सीमा अधिनियम, 1960:- सीलिंग एक्ट में ‘व्यक्ति’ शब्द, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, का संदर्भ होगा:(Gujarat Agricultural Lands Ceiling Act, 1960:- the word ‘person’ in the Ceiling Act will, unless the context otherwise requires, refer To) :

(i) एक प्राकृतिक इंसान(a natural human being),

(ii) कोई भी कानूनी इकाई जो अधिकारों और कर्तव्यों को रखने में सक्षम है, जिसमें कोई कंपनी या व्यक्तियों का संघ या व्यक्तियों का निकाय शामिल है (चाहे निगमित हो या नहीं); और (any legal entity which is capable of possessing rights and duties, including any company or association of persons or body of individuals (whether incorporated or not); and

(iii) एक हिंदू अविभाजित परिवार या व्यक्तियों का कोई अन्य समूह या इकाई, जिसके सदस्य प्रथा या प्रथा से, संपत्ति और निवास में संयुक्त हैं(a Hindu Undivided Family or any other group or unit of persons, the members of which by custom or usage, are joint in estate and residence).

११:- “व्यक्ति” शब्द को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन हमारे संविधान के अनुच्छेद ३६७ में प्रावधान है कि सामान्य खंड अधिनियम (General Clauses Act 1947) में निहित परिभाषाएं संविधान की व्याख्या के लिए लागू होती हैं। अभिव्यक्ति “व्यक्ति” भारत के संविधान के एक से अधिक अनुच्छेदों में कार्यरत है। हम उन सभी अनुच्छेदों का उल्लेख नहीं करेंगे जिनमें व्यक्ति की अभिव्यक्ति का प्रयोग किया गया है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद २०, २१, २२ और २२६ पर ध्यान देना पर्याप्त होगा जहाँ इसका उपयोग किया गया है। सामान्य खंड अधिनियम, १८९७ का प्रावधान जो संविधान की व्याख्या के लिए लागू है जैसा कि अनुच्छेद ३६७ के खंड (१) के तहत प्रदान किया गया है, अधिनियम की प्रयोज्यता को प्रतिबंधित करता है और इस तरह के आवेदन को संदर्भ के अधीन बनाता है जैसा कि अन्यथा आवश्यकता हो सकती है।

अनुच्छेद २०, २१, २२ की त्रिमूर्ति मोटे तौर पर राज्य के खिलाफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी व्यक्तिगत व्यक्ति को देती है। वे उन सभी के लिए गारंटी नहीं हैं जो सामान्य खंड अधिनियम की धारा ३ (४२) के तहत व्यक्ति की परिभाषा में शामिल हैं। सामान्य खंड अधिनियम की धारा ३ (४२) के तहत व्यक्ति में कोई भी कंपनी या संघ या व्यक्तियों का निकाय शामिल होगा चाहे वह निगमित हो या नहीं।

क्या इसका मतलब यह है कि उच्च न्यायालय सामान्य खंड अधिनियम की धारा ३ (४२) के तहत प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद २२६ के तहत एक रिट या आदेश या निर्देश जारी करने का हकदार है? यह अच्छी तरह से तय है कि अनुच्छेद २२६ के तहत उपलब्ध उपाय एक सार्वजनिक कानून उपाय है और एक रिट, सार्वजनिक कानूनी कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करने वाले व्यक्ति के खिलाफ लागू नहीं होती है।
(The term “person” is not defined in the Constitution. But Article 367 of our Constitution provides that the definitions contained in the General Clauses Act apply for the interpretation of the Constitution. The expression person is employed in more than one Article of the Constitution of India. We shall not refer to all those Articles where the expression person has been used. It would be enough to notice Articles 20, 21, 22 and 226 of the Constitution of India where it has been used. The provision of the General Clauses Act, 1897 which is applicable for the interpretation of the Constitution as provided for under clause (1) of Article 367 itself restricts the applicability of the Act and makes such an application subject to the context as otherwise may require. The trinity of Articles 20, 21, 22 broadly guarantee the personal liberties against the State to individual person. They are not guaranteed to all those who are included in the definition of person under section 3 (42) of the General Clauses Act. Person under Section 3 (42) of the General Clauses Act shall include any company or association or body of individuals whether incorporated or not. Does it mean that the High Court is entitled to issue a writ or order or direction under Article 226 of the Constitution against every person under Section 3 (42) of the General Clauses Act? It is well settled that the remedy available under Article 226 is a public law remedy and a writ and does not lie against a person not discharging public law duties).
तो इस प्रकार हम देखते हैं की Person की कई परिभाषा हमें प्राप्त होती है, परन्तु “THE PLACES OF WORSHIP (SPECIAL PROVISIONS) ACT, 1991” के अंतर्गत धारा ३ के प्रावधान के लिए कौन सी परिभाषा प्रयोग में लायी जाएगी, क्योंकि इस अधिनियम में तो कोई परिभाषा दी हि नहीं गई है।

अब ये तो तय है की न्यायपलिका, विधायिका और संसद तो person की परिभाषा में कंही से भी नहीं आती अत: इन पर धारा ३ के प्रावधान लागू नहीं होते।

इस अधिनियम की धारा ६ दंड का प्रावधान करती है, इसके अनुसार:- Punishment for contravention of section 3.—(धारा ३ के उल्लंघन के लिए दंड-)

(१) जो कोई धारा ३ के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक ही हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा । ( Whoever contravenes the provisions of section 3 shall be punishable with imprisonment for a term which may extend to three years and shall also be liable to फाइन).

(२)जो कोई उपधारा (१) के अधीन दंडनीय कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा या ऐसा अपराध कराएगा और ऐसे प्रयत्न में अपराध करने की दिशा में कोई कार्य करेगा, वह उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा ( Whoever attempts to commit any offence punishable under sub-section (1) or to cause such offence to be committed and in such attempt does any act towards the commission of the offence shall be punishable with the punishment provided for the offence).

(३) जो कोई उपधारा (१) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरण करेगा या उसे करने में आपराधिक षड्यंत्र का पक्षकार होगा, चाहे ऐसा अपराध ऐसी दुष्प्रेरणा के परिणामस्वरूप या ऐसे आपराधिक षड्यंत्र के अनुसरण में किया गया हो या न किया गया हो, वह भारतीय दंड संहिता (१८६० का ४५) की धारा ११६ में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा (Whoever abets, or is a party to a criminal conspiracy to commit, an offence punishable under sub-section (1) shall, whether such offence be or be not committed in consequence of such abetment or in pursuance of such criminal conspiracy, and notwithstanding anything contained in section 116 of theIndian Penal Code (45 of 1860), be punishable with the punishment provided for the offence).

हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद २०, २१, २२ की त्रिमूर्ति मोटे तौर पर राज्य के खिलाफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी व्यक्ति को देती है। पर इस अधिनियम की धारा ४ इन अनुच्छेदों की धज्जियां उड़ा देती है आप स्वयम देखिये।

५.कतिपय उपासना स्थलों के धार्मिक स्वरूप के बारे में घोषणा और न्यायालयों, आदि की अधिकारिता का वर्जन- (Declaration as to the religious character of certain places of worship and bar of jurisdiction of courts, etc.)—

(१) यह घोषित किया जाता है कि १५ अगस्त, १९४७ को विद्यमान उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप वैसा ही बना रहेगा जैसा वह उस दिन विद्यमान था (It is hereby declared that the religious character of a place of worship existing on the 15th day of August, 1947 shall continue to be the same as it existed on that day).

(2) यदि इस अधिनियम के प्रारंभ पर, १५ अगस्त, १९४७ को विद्यमान किसी उपासना स्थल के धार्मिक स्वरूप के संपरिवर्तन के बारे में कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लम्बित है तो वह उपशमित हो जाएगी और ऐसे किसी मामले की बाबत कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही ऐसे प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष नहीं होगी (If, on the commencement of this Act, any suit, appeal or other proceeding with respect to the conversion of the religious character of any place of worship, existing on the 15th day of August, 1947, is pending before any court, tribunal or other authority, the same shall abate, and no suit, appeal or other proceeding with respect to any such matter shall lie on or after such commencement in any court, tribunal or other authority):
(2)

परंतु यदि इस आधार पर कि ऐसे किसी स्थल के धार्मिक स्वरूप में १५ अगस्त, १९४७ के पश्चात् संपरिवर्तन हुआ है, संस्थित या फाइल किया गया कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही इस अधिनियम के प्रारंभ पर लम्बित है, तो ऐसा वाद, अपील या अन्य कार्यवाही इस प्रकार उपशमित नहीं होगी और ऐसे प्रत्येक वाद, अपील या अन्य कार्यवाही का निपटारा उपधारा (१) के उपबंधों के अनुसार किया जाएगा ।
(Provided that if any suit, appeal or other proceeding, instituted or filed on the ground that conversion has taken place in the religious character of any such place after the 15th day of August, 1947, is pending on the commencement of this Act, such suit, appeal or other proceeding shall be disposed of in
accordance with the provisions of sub-section (1)).

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) की कोई बात निम्नलिखित को लागू नहीं होगी,(Nothing contained in sub-section (1) and sub-section (2) shall apply to,)—

(a)उक्त उपधाराओं में निर्दिष्ट कोई उपासना स्थल, जो प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, १९५८ (१९५८ का २४) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अन्तर्गत आने वाला कोई प्राचीन और ऐतिहासिक संस्मारक या कोई पुरातत्वीय स्थल या अवशेष है( any place of worship referred to in the said sub-sections which is an ancient and historical
monument or an archaeological site or remains covered by the Ancient Monuments and
Archaeological Sites and Remains Act, 1958 (24 of 1958) or any other law for the time being in force);

(b)उपधारा (२) में निर्दिष्ट किसी मामले की बाबत कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही, जिसका इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा अंतिम रूप से विनिश्चय, परिनिर्धारण या निपटारा कर दिया गया है ( any suit, appeal or other proceeding, with respect to any matter referred to in sub-section (2), finally decided, settled or disposed of by a court, tribunal or other authority before the
commencement of this Act);

(c)ऐसे किसी मामले के बारे में कोई विवाद जो ऐसे प्रारंभ के पूर्व पक्षकारों द्वारा आपस में तय हो गया है (any dispute with respect to any such matter settled by the parties amongst themselves before such commencement);

(d) ऐसे किसी स्थल का कोई संपरिवर्तन जो ऐसे प्रारंभ के पूर्व उपमति द्वारा किया गया है (any conversion of any such place effected before such commencement by acquiescence);

(e) ऐसे प्रारंभ के पूर्व ऐसे किसी स्थल का किया गया कोई संपरिवर्तन, जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन परिसीमा द्वारा वर्जित होने के कारण किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष आक्षेपणीय नहीं है (any conversion of any such place effected before such commencement which is not liable to be challenged in any court, tribunal or other authority being barred by limitation under any law for the time being in force).

इस् अधिनियम् धारा ५ के अनुसार :-अधिनियम का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद को लागू न होना-इस अधिनियम की कोई बात उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या में स्थित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के रूप में सामान्यतया ज्ञात स्थान या उपासना स्थल को और उक्त स्थान या उपासना स्थल से संबंधित किसी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही को लागू नहीं होगी (Act not to apply to Ram Janma Bhumi-Babri Masjid.—Nothing contained in this Act shall apply to the place or place of worship commonly known as Ram Janma Bhumi-Babri Masjid situated in Ayodhya in the State of Uttar Pradesh and to any suit, appeal or other proceeding relating to the said place or place of worship.
और इस अधिनियम की धारा ७ कहती है”अधिनियम का अन्य अधिनियमितियों पर अध्यारोही होना-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे (Act to override other enactments.—The provisions of this Act shall have effect notwithstanding anything inconsistent therewith contained in any other law for the time being in force or any instrument having effect by virtue of any law other than this act).

तो मित्रों आपने देखा की मुसलिम तुष्टिकरण के अंधी दौड़ में आँखे बांधकर दौड़ने वाली अंग्रेजो द्वारा निर्मित कांग्रेस किस प्रकार हम सनातन धर्मीयो को धोखा देती चली आ रही है। और जब मन्नू भाई ने ये कहा था की ” देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानो का है” तो मुझे बिलकुल आश्चर्य नहीं हुआ था।

खैर ये अधिनियम तो बिलकुल भी ओवैसी और कश्मीर की ज़हर उगलने वाली खातून मेहबूबा मुफ़्ती को कुछ भी नहीं दे पायेगा।

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