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भाजपा की अनवरत यात्रा

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भाजपा की अनवरत यात्रा

अक्सर लंबी यात्राओं की शुरुआत सही दिशा में बढ़ाए गए छोटे-छोटे कदमों से होती है. यात्रा में हमें ऐसे साथियों की आवश्यकता होती है, जो उसी समान प्रतिबद्धता से कार्य निष्ठ होकर हमारा साथ दें. अब इस कथन को देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सन्दर्भ में रखेंगे तो ये कथन और अधिक स्पष्ट हो जाएगा. भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को की गई. वर्ष 1980 में एक बीज के रूप में प्रफुस्टित एक दल आज एक विशाल वट वृक्ष बन चुका है. यूँ तो राजनीतिक विश्लेषक भाजपा की जड़ें भारतीय जनसंघ में तलाशते हैं, लेकिन अगर हम कहें कि भाजपा जनसंघ का एक सारगर्भित तथा वयस्क स्वरुप है तो इसमें कोई दो राय नहीं होगी. स्थापना के शुरूआती वर्षों में भाजपा पर तथाकथित तौर पर “सांप्रदायिक” तथा “ब्राह्मण-बनियों-राजपूतों” की पार्टी होने के आरोप मढ़े गए लेकिन बदलते समय के साथ भाजपा की स्वीकार्यता समाज के हर तबके में बढ़ी जिसके साथ इन आरोपों का कोई औचित्य नहीं रहा.

अब सवाल है कि भाजपा को अन्य दलों से क्या अलग बनाता है? इसका उत्तर हमें भाजपा के सुसंगठित कैडर, गतिशील नेतृत्व, दमदार कार्यप्रणाली के साथ पार्टी में “स्वस्थ लोकतंत्र” की मौजूदगी में मिलता है. वर्ष 1984 के आम चुनावों में महज 2 सीटों पर सिमट जाने से लेकर 2021 के आम चुनावों में अकेले 303 सीटें जीतने तक भाजपा की ये यात्रा काफी ‘रोचक’ रही है. भाजपा की यह यात्रा पूरी तरह राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ‘अप्रत्याशित’ है. स्थानीय स्तर पर छोटी इकाईयों के गठन तथा सफल संचालन से लेकर चुनावी प्रबंधन की बारीकियाँ, आगे आने वाले समय में, भारतीय राजनीति के अध्ययन में रुचि रखने वाले शोधार्थियों के लिए काफी शोधपरक होंगी.

हाल ही में संपन्न हुए ५ राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों में ४ राज्यों में भाजपा ने फिर से विजय हासिल की. २०२४ के बड़े आम चुनावों के मद्देनजर भाजपा की यह जीत शायद आने वाले सुखद परिणामों की आहट है. उत्तर भारत के राज्यों में पैठ जमाने के भाजपा का अगला लक्ष्य दक्षिण भारत में जीत हासिल करना है. इसकी सुगबुगाहट हमें पिछले काफी समय से देखने को मिल रही रही है. दक्षिण भारत के सबसे बड़े राज्य कर्नाटक में तो भाजपा सत्ता पर काबिज है.

आज भारतीय जनता पार्टी की स्थापना को 42 वर्ष पूर्ण हो गए हैं, तथा, कम से कम फिलहाल तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का कोई “उचित विकल्प” जनमानस को सुहाता नहीं दिख रहा है.

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