Saturday, September 18, 2021
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विचार: क्या बालश्रम में व्यापक बढोत्तरी ले आयी कोरोना महामारी

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Abhishek
A Freelance Writer / Social Activist /News Addict

पुरी दुनिया हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाती है। पिछले माह ही पुरे विश्व ने 19वॉं विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया।मगर विश्व मे करोडों बच्चो का भविष्य जितना आज खतरे में है, शायद उतना पिछले कई दशकों मे नही रहा। कोरोना महामारी की गंभीर चुनौतियों को दृष्टिगत रखते हुए आज हमें नए संकल्प और संसाधनों के साथ बडे कदम उठाने की आवश्यकता है। वर्ष 1998 में 103 देशों की बाल श्रम विरोध के संदर्भ में विश्व यात्रा के बाद हमने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के वार्षिक सम्मेलन मे साल के एक दिन को बाल श्रम विरोधी दिवस के रूप मे मनाने का प्रस्ताव रखा गया था।

संयुक्त राष्ट्र ने सन 2002 मे इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए 12 जून को विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस के रूप मे मनाना सुनिश्चित कर दिया परंतु जिस दृष्टइच्छा और रफ्तार के साथ बाल मजदूरी के उन्मूलन का कार्य होना चाहिए था, वह नही हो पाया। फिर भी दुनिया इस दिशा मे धीरे-धीरे आगे बढ रही है। अत: इस दिवस को मनाने का औचित्य है। अब करोना महामारी और उससे पैदा हुए आद्दथक संकट से यह स्पष्ट हो चुका है कि लाखों नही, अपितु करोडों बच्चो का बाल मजदूरी मे धकेले जाना निश्चित है। एक चिंताजनक पहलू इस संबध ये भी सामने आया है कि पिछले दो दशको मे पहली बार बाल श्रम के आंकडे बढ गये हैं। अत: हमें बाल श्रम निषेध दिवस पर आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है। दुनिया मे आज के समय मे जितना संसाधन और टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, ऐसा पहले कभी नही था। परंतु बावजूद इसके तेजी से आगे बढता मनुष्य अभी भी अपने बच्चों को साथ लेकर चलने मे सक्षम नही बन पाया है। हमारे देश के करोडों बच्चे पीछे छुटते जा रहे हैं। बच्चों की शिक्षा , स्वास्थ्य और सुरक्षा के क्षेत्र में उनकी आबादी के अनुपात मे भले ही न सही, लेकिन आवश्यकता के हिसाब से संसाधनों का उचित हिस्सा खर्च किया जाना चाहिए। विडंबना यह है कि कोरोना महामारी से पुरी दुनिया समान रूप से प्रभावित हुई है, लेकिन उससे निपटने के लिये संसाधनों का जो वितरण किया गया , वह असमान रहा।

महामारी से उपजे आद्दथक संकट से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिये तमाम देश तरह- तरह के आद्दथक पैकेज की घोषणा कर रहे है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि बाल मजदूरी एकांगी समस्या नही हैं। लेकिन दुर्भाग्य से संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं से लेकर विभिन्न देशों की सरकारों ने इन समस्याओं को टुकडों मे विभाजित कर अलग-अलग संस्थाओं और मंत्रालयों को सौंप रखा हैं। जैसे बाल मजदूरी, शिक्षा , स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिये अलग- अलग अंतरराष्ट्रीय संगठन और सरकारी विभाग हैं। हमें समझना चाहिए कि बाल मजदूरी, गरीबी, अशिक्षा और बिमारियों के मध्य एक दुष्चक्र बना हुआ है, जो एक दूसरे को उत्पन्न करते है और फिर आगे बढाते हैं। अगर हम अब भी अपनी गलतियों से नही सीखते हैं और हाशिए पर खडे तथा विकास मे सबसे पीछे छूटे बच्चों के लिये कुछ नही सोचते हैं और कुछ नही करते हैं तो हम अपने बच्चों को कोरोना वायरस के कारण नहीं, बल्कि उससे निपटने की तैयारी की कमी, उदासीनता और अपनी लापरवाही के कारण खो देगें।

महामारी के परिणामस्वरूप दुनिया के लगभग 14 करोड बच्चे और उनका परिवार अत्यधिक गरीबी के दलदल मे धकेल दिया गया। लाखों बच्चे अनाथ हो गए हैं। स्कूल बंदी से करोडों बच्चो की पढाई बाधित है और वे मिड-डे मिल ये भी वंचित हो गए हैं। कई अध्ययनों ये यह स्थापित हो गया है कि इनमें से लाखों बच्चे अपनी कक्षाओं में अब वापस नही आ पाएंगे।#WorldDayAgainstChildLabour #PMOIndia
लेखक- अभिषेक कुमार
(विचार लेखक के व्यक्तिगत है)

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