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इस्लामोफ़ोबिया का झूठ और घरवापसी

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इस्लामोफ़ोबिया का झूठ और घरवापसी

कुछ माह पूर्व जब तुर्की के राष्ट्रपति एरदोगन के एक एलान/फतवा द्वारा हागिया सोफिया नामक प्राचीन रोमन कैथोलिक चर्च को मस्जिद में परिवर्तित किया गया तो इसी के विषय में अपने एक मित्र से फेसबुक पर कमैंट्स में विचार विमर्श करने के उपरांत एक नए एवं अत्यंत गूढ़ शब्द से मेरा पाला पड़ा जो कि था इस्लामोफोबिया।

विचार विमर्श के दौरान यह तर्क सामने आया कि – एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में अदालत द्वारा आरकियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) जैसे वैज्ञानिक संस्थानों के पेश किए गए सबूतों एवं तथ्यों के आधार पर एक स्थान को उसी राष्ट्र की सबसे बड़ी आबादी द्वारा पूजा जाने वाले देवता का जन्म स्थान घोषित करना किस तरह विदेशी आक्रांताओं द्वारा एक चर्च को मस्जिद में तब्दील कर देने से भिन्न है। भिन्न से कहीं बढ़कर इसे तो आकाश–पाताल जैसे अंतर की तरह आंका जाना चाहिए। इस विषय को तर्क द्वारा न जीत पाने के कारण मित्र ने मुझसे कहा कि मैं इस्लामोफोबिक हूं जिसका सीधा अर्थ पूछने पर मुझे ज्ञात हुआ कि मैं मुसलमानों से ईर्ष्या करता हूं। अचंभे की बात यह है कि मुझे यह पता भी नहीं था और मुझे यह भी समझ में नहीं आया कि मात्र एक राजनीतिक विचारधारा (जिसमें अपने विचारों को दूसरों पर बलपूर्वक थोपना) का आलोचक होने पर मैं सारे मुसलमानों से ईर्ष्या करने वाला कैसे बन गया? 12वीं कक्षा तक मेरा ही अंग्रेजी का पेपर टीप कर पास होने वाले मेरे उस मित्र के इस भारी-भरकम शब्द के ज्ञान पर मुझे संदेह हुआ तो इसके थोड़े जड़ में जाने की चेष्टा की।

वैसे तो इस्लामोफोबिया शब्द काफी पुराना है मगर भारतीय वामपंथियों द्वारा इसका उपयोग पिछले करीब 7–8 साल से होना शुरू हुआ है। इसका कारण भी वही है जो भारतीय वामपंथियों के अन्य विचारों एवं शब्दों के उपयोगों का रहता है कि कब पश्चिमी जगत द्वारा उन विचारों का विमोचन होता है और स्वीकृति मिलती है। इतिहास गवाह है कि भारतीय वामपंथियों द्वारा पश्चिमी जगत का अनुसरण बिल्कुल भेड़ के फूफाओं की भांति होता रहा है। भारत में भी इस मनगढ़ंत शब्द का प्रचार पूरे ज़ोर-शोर से किया गया जिसमें हर एक ऐसे मनुष्य जो इस्लामी आतंकवाद, इस्लामिक विचारधारा, इस्लामिक स्टेट या किसी भी इस किस्म के आतंकवादी संगठन का आलोचक है उसे इस्लामोफोबिक या मुस्लिम हेटर चिन्हित कर दिया गया। इससे बड़े बड़े नेता विचारक एवं बुद्धिजीवी (असली वाले) भी नहीं बच पाए तो आम इंसान की क्या ही औकात थी। इस शब्द को मनगढ़ंत या बेबुनियादी कहना इसीलिए अति आवश्यक है क्योंकि यह विश्व भर से छिपा नहीं है कि कई इस्लामिक राष्ट्र (हमारे पड़ोसी सहित) ,समूह एवं कुछ लोगों द्वारा पिछले कुछ वर्षों में इस्लाम के नाम पर आतंक, हत्याएं, घुसपैठ, अतिक्रमण जैसी कई घटनाओं को अंजाम दिया गया है और विश्व भर में इस्लाम नामक विचारधारा का एक अलग ही अर्थ और संदर्भ स्थापित करने की पूरी कोशिश की है जिसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रहे हैं। ऐसे में इस प्रकार की उग्र विचारधारा की आलोचना एवं इसकी रोकथाम के लिए विशेष कदम उठाया जाना अति आवश्यक हो जाता है।

अगर आप चिकित्सक से इलाज कराने जाएं और वह आपके रोग निवारण के दौरान आपको आपकी बीमारी का नाम बताएं जिसे सुनकर आप आघात हो जाएं और चिकित्सक पर ही बरस पड़े तो इसमें दोष चिकित्सक का नहीं बल्कि आपका है। और इस विषय में (phobic) दिमागी रूप से अक्षम भी चिकित्सक को नहीं आपको कहा जाना चाहिए।

और अगर किसी को इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों द्वारा मात्र एक विचारधारा को न मानने के कारण गला रेत देना सही और उसी इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन की निंदा करने वाला गलत लगता है तो उसे अपना मस्तिष्क पूर्ण रूप से जांच कराने की आवश्यकता है। अब चाहें वह पश्चिमी विचारधारक या बुद्धिजीवी हों या भारतीय। कुछ भारतीयों को यह समझ लेना भी अति आवश्यक है कि पिछले 73 सालों से भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है, इसलिए हर पश्चिमी विचार या मनगढ़ंत सिद्धांत पर एक मूढ़ बंदर की भांति पूंछ हिलाना और अपने भी किसी विचार की स्वीकृति के लिए पश्चिमियों के पगों में बिछ जाना अब उन्हें त्याग देना चाहिए।

विश्व के सामने यह भी स्पष्ट हो गया है कि इस्लामोफोबिया एक मनघड़ंत गैर जिम्मेदाराना बना बनाया शब्द है जिसे सिर्फ कुछ राजनीतिक समूहों द्वारा अपने वोट बैंक की राजनीति के लिए मात्र उपयोग किया जा रहा है। और अगर ये कुछ समूह यह समझते हैं कि समान जनता उनके समक्ष उसी तरह बंदर की भांति पूंछ हिलाएगी जिस तरह वे अपने आकाओं के समक्ष हिलाते हैं तो उन्हें भी थोड़े आत्ममंथन की आवश्यकता है। रही बात अपने से अलग विचार रखने वाले हर दूसरे मनुष्य को एक शब्द या चिप्पी लगाकर संबोधित कर देने की तो यह वामपंथियों का एक प्राचीन स्वभाव रहा है और अब कम से कम भारत की सामान्य जनता को तो इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। ऐसा उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में सिद्ध किया है और आशा है भविष्य में भी करते रहेंगे।

अब विषय आता है भारतीय हिंदुओं का भारतीय मुसलमानों से ईर्ष्या करने का तो यह तर्क बेतुका इसलिए है क्योंकि एक ही संस्कृति से उपजे दो मनुष्य एक दूसरे से ईर्ष्या रखकर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। और इस्लामोफोबिया जैसे कल्पना से भरपूर शब्दों द्वारा छले जाने से बचने के लिए मुसलमानों को भी उनकी जड़ों को पहचानना अति आवश्यक हो जाता है ताकि कुछ भाड़े के टट्टू उन्हें मनघड़ंत ज्ञान की घुट्टी पिलाकर विचलित न कर सकें। हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं बिहार के कुछ मुस्लिम समूहों एवं परिवारों द्वारा अपने संस्कृति व सभ्यता में वापसी इसका प्रमाण है कि समझदार मुसलमान ऐसे भाड़े के टट्टूओं की विचारधाराओं से प्रभावित होने वाला नहीं। हिंदू सभ्यता अपनाना या घरवापसी को कुछ वामपंथियों द्वारा षड्यंत्र की तरह प्रदर्शित करना भी इस बात का प्रमाण है कि वे भी यह समझते हैं कि जितना भारतीय मुसलमान अपनी संस्कृति एवं सभ्यता को समझने और उसके समक्ष आने में सक्षम हो जाएंगे उतना ही वे हमारे काल्पनिक सिद्धांतों को नकारना ही नहीं अपितु संघर्ष और विरोध करना भी शुरू कर देंगे। इसीलिए वे एक भ्रम की स्थिति भी बनाए रखना चाहते हैं ताकि वे समय-समय पर हिंदू उनसे ईर्ष्या करता है, वे अल्पसंख्यक हैं, अल्पसंख्यक खतरे में है, हिंदू उनके खिलाफ षड्यंत्र करता है जैसी आग में घी डालकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेक सकें।

अपनी जड़ों और भारतीय सभ्यता का ज्ञान रखने वाला भारतीय मुसलमान यह जानता है कि वह कौन है और उसके पूर्वज क्या और कौन थे। और अब इस तरीके के समूहों एवं स्वघोषित बुद्धिजीवियों को भी यह प्राचीन सिद्धांत त्याग कर आगे बढ़ना चाहिए कि एक झूठ को बार बार दोहराने से वह सच बन जाता है।

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