Friday, May 24, 2024
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क्या हम केजरीवाल का समर्थन करके एक बड़ी निरंकुश व्यवस्था बना रहे हैं?

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आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से 70 में से 23 सीट पे नए चेहरे को मौका दिया है जिसमे से 15 मौजूदा विधायक का टिकट काटा गया और बाकि नए चेहरे जो दूसरी पार्टी से आये थे उन्हें मौका मिला ये स्थिति कुछ सवाल पैदा करती है, क्या ऐसे स्थिति केजरीवाल के निरंकुश स्वभाव के कारण बनी या फिर इतने सीट पे विधायको का काम संतोषजनक नहीं था?

आदर्श शास्त्री जैसे इंसान का टिकट का कटना वो भी आखिरी वक़्त में आए विनय मिश्रा के लिए बहुत आश्चर्यजनक है, विनय मिश्रा की जो सबसे बड़ी योग्यता है, वो है – कांग्रेस नेता महाबल मिश्रा का बेटा होना. ऐसे तो आदर्श शास्त्री भी पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोते हैं, मगर ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है केजरीवाल सरकार में जब किसी ऐसे को बाहर किया गया जो अपने लाखों -करोड़ों की नौकरी छोड़के केजरीवाल से जुड़ा, जो लोग ये कहते है की केजरीवाल ने अपनी बहुत बड़ी नौकरी छोड़के आंदोलन किया वो ये भी याद रखे की आदर्श शास्त्री ‘एप्पल’ में काम करते थे और उनका एक करोड़ से ज्यादा का पैकेज रहा और ऐसे कई और है जो अरविन्द पे भरोसा करके अपनी नौकरी छोड़ के आए मगर अरविन्द ने अपना काम निकलते ही उन्हें बाहर कर दियाI योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण से लेकर आशुतोष तक आप के नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है जो एक एक करके निराश होते चले गये- आदर्श शास्त्री भी अब उसी जमात में शामिल हो चुके हैंI बात साफ़ है जो भी अरविन्द के सामने अपनी बात रखने की गलती करता है उसे पार्टी से बाहर कर दिया जाता हैI

कारण जो भी हो ये स्थिति आप के दावों को खोखला जरुर साबित करती है, याद रहे कि राज्य सभा की टिकट बटवारे के वक़्त भी केजरीवाल ने 2 बहरी ‘गुप्ता’ को टिकट देके अपने ऊपर सवाल खड़ा कर लिया थाI

जहां तक केजरीवाल के स्वाभाव की बात है तो सबको पता है कैसे अधिकारियों और दिल्ली पुलिस के साथ उनके ख़राब सम्भन्ध रहे हैI अपने साथ-साथ पार्टी से जुड़े अधिकतर नेता को केजरीवाल ने बाहर का रास्ता दिखा दिया, भरी सभा में अपने विधायकों से बदतमीजी तक का आरोप लग चुका है मुख्यमंत्री परI

अरविन्द न केवल प्रधान मंत्री के लिए बल्कि वरिष्ठ अधिकारियों के लिए भी खराब भाषा का उपयोग करते रहे है, चाहे वह मुख्य सचिव अंशु प्रकाश का मामला हो या उनके बयान का कि वह दिल्ली के मालिक हैं। एक तरह से यह तानाशाही सोच को दर्शाता है। राजिंदर कुमार और वीकेजैन जैसे अधिकारी को केवल उनकी वजह से नुकसान उठाना पड़ा, अरविन्द के रिश्ते अधिकारियो से ख़राब रहने का सबसे बड़ा कारण अरविन्द का व्यवहार एवं सबकुछ अपने तरीके से कराने की ज़िद रही है।

अरविन्द के किसी भी बात के लिए दोषारोपण करने में देरी न करने की आदत सबको खलती है, उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री के पद के गरिमा को नुकसान पहुंचाया, बल्कि अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर के पद का भी राजनीतिकरण किया। अरविंद ने सबसे पहले यह श्रेय लिया कि केंद्र खुद कह रहा है कि पानी अंतरराष्ट्रीय मानकों का है, लेकिन जब केंद्र ने कहा कि कुछ नमूने बुनियादी गुणवत्ता को पूरा नहीं करते हैं तो उन्होंने केंद्र को कोसना और आरोप लगाना शुरू कर दिया।

केजरीवाल के प्रचार प्रसार और सब्सिडी को समझने की आवश्यकता है,हाल ही में दिल्लीवासियों को 200 यूनिट बिजली सब्सिडी देना सबसे अच्छा उदाहरण है। सोचने की बात है कि उन्होंने यह सब्सिडी गर्मियों में क्यों नहीं दी? उन्होंने इसे अब क्यों लॉन्च किया? इसका जवाब यह है कि सर्दियों में 200 यूनिट एक अच्छी गिनती है, जिससे चुनाव में बेहतर माहौल तैयार होगा। सवाल उठता है कीअरविन्द ने आखिरी समय में महिलाओं को मुफ्त बस की सवारी क्यों दी, वह वही कर रहे है जिसके लिए वह दूसरों पर आरोप लगाते है।

लोक सभा चुनाव के दौरान केजरीवाल के द्वारा दिल्ली में शिक्षा क्रांति का चेहरा कहे जाने वाली अतीशी को अपना उपनाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी, और हर तरह की गंदी राजनीति के बाद भी आतिशी अपनी लोकसभा सीट हार गईI

एक बात और गौर फरमाने लायक है कि जब राज्य सभा के लिए आशुतोष और कुमार विश्वास को पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो ये लगा कि पार्टी वैसे लोगो को मौका नहीं दे रही जिन्हे लोक सभा में मौका मिला था लेकिन अब जब आतिशी,दिलीप पांडेय और राघव को लोक सभा की हार के बाद फिर से दिल्ली विधान सभा 2020 के लिए टिकट मिला तो वह भ्रम भी टूट गयाI

हमें यह समझना होगा कि अरविंद इतने अहंकारी हैं कि जब वह व्यावहारिक रूप से अपना पहला कार्यकाल दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में समाप्त कर रहे हैं जो कि आधा राज्य है तो वह क्या करेंगे जब वह वापस आएंगे या जब उन्हें पूर्ण शक्ति मिलेगी, अगर हम उन्हें चाहते हैं तो हमें अरविंद के अहंकार को भी स्वीकार करना होगा और एक अराजक नेता के लिए तैयार रहना होगा जो अपने आगे किसी की बात नहीं सुनेगा।

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