Tuesday, April 7, 2020
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जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सकारात्मक प्रयास की ज़रूरत

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भारत का सर्वाधिक उत्तरजीवी व्यंग्य है, उसकी जनसंख्या नियंत्रण को लेकर प्रतिबद्धता। कभी ‘हम दो हमारे दो’ के नारे से शुरू हुआ यह खेल,चुनावों के दौरान आज भी उतना ही प्रासंगिक नज़र आता है, जितना कभी इन्दिरा गांधी के ज़माने में हुआ करता था।

भारत की अदालतों से लेकर जस्टिस वेंकटचलेया आयोग, 42 वें संविधान संशोधन की 7 वीं अनुसूची तथा अलग अलग समय पर 35 सांसदों द्वारा लाए गए प्राइवेट मेम्बर बिल सरकारों से जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की सिफ़ारिश करते आए हैं। लेकिन आम आदमी की समझ से परे है की सरकार जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सचेत क्यूँ नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट ने पुनः मामले को उठाया है तथा केंद्र सरकार को जनसंख्या नियंत्रण पर क़ानून बनाने की सिफ़ारिश की है।जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल तो नहीं उठा सकते क्यूँकि प्रधानमंत्री लाल क़िले से स्वयं कह चुके हैं कि “हमें सोचना चाहिए, जो शिशु मेरे घर में आएगा, क्या उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मैंने अपने आप को तैयार कर लिया है? या में उसको समाज के भरोसे ही छोड़ दूँगा? कोई भी माँ-बाप ऐसा नहीं हो सकता। हमें समझना चाहिए कि परिवार नियोजन भी देशभक्ति का ही एक स्वरूप है।”

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दरअसल जनसंख्या नियंत्रण क़ानून को लेकर भारत में जब भी माँग उठी है तो उसे धर्म की शक्ल देकर दबा दिया गया है। कुछ लोगों को लगता है की ये इस्लाम से षड्यंत्र है तो किसी को लगता है हिंदुत्व ख़तरे में है। लेकिन आजतक किसी के मुँह से नहीं सुना कि ‘भारत ख़तरे में है’, महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है। क्या धर्म देशहित से बड़ा हो सकता है?

भारत की जनसंख्या 1947 में जहाँ 33 करोड़ थी तो वहीं 2020 आते आते 133 करोड़ हो गयी। और संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ अगले 4-5 सालों में हम चीन को पीछे छोड़ देंगे। है ना गर्व की बात?

ब्रिटिश अर्थशास्त्री ‘माल्थस’ ने प्रिन्सिपल ओफ़ पॉप्युलेशन में जनसंख्या वृद्धि और इसके प्रभावों की बड़ी सरल व्याख्या की है। माल्थस लिखतें हैं की जनसंख्या दोगुनी गति से बढ़ती है जबकि संसाधनों में प्रायः सामान्य गति होती है। उनके विचार से पूर्णतया सहमत तो नहीं हुआ जा सकता लेकिन ये तो ज़रूर है कि किसी भी देश में जब जनसंख्या विस्फोटक स्तिथि में पहुँच जाती है तो संसाधनों के साथ उसकी ग़ैर अनुपातिक वृद्धि को स्थिरता में लाना बहुत ज़रूरी हो जाता है।

समझने वाली बात ये है की जो देश 1952 के अंदर दुनिया में सबसे पहले परिवार नियोजन पर नीति बनाता है, उसे 70 साल बाद ये सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि हमारे बच्चों का भविष्य क्या होगा?

जब जनसंख्या बढ़ती है तो उसका तात्पर्य सिर्फ़ आबादी बढ़ने से नहीं होता उसके साथ बढ़ती हैं मानव गतिविधियाँ। जिनमें अत्यधिक पानी की खपत, फ़सलों के लिए भूमि विस्तार तथा जंगलों के कटान से लेकर तमाम ऐसी गतिविधियाँ हैं जो किसी भी देश के लिए चुनौतिपूर्ण हो सकती हैं। हर साल हमारे देश के अंदर एक आस्ट्रेलिया बस जाता है और फिर हम कहते हैं कि देखिए जी प्रदूषण की बड़ी समस्या है।समस्या प्रदूषण नहीं है?

जनसंख्या विस्फोट का सर्वाधिक असर देश के स्वास्थ्य, सामाजिक तथा पर्यावरणीय दाँचे पर पड़ता है। और लम्बे समय बाद भुखमरी तथा ग़रीबी जैसी समस्याएँ प्रखर रहती है।

अगर हम आँकड़ो पर ग़ौर फ़रमाएँ तो दुनिया की फ़सल योग्य भूमि का मात्र 4 प्रतिशत तथा पीने योग्य जल का भी मात्र 4 प्रतिशत हिस्सा भारत में मौजूद है जबकि जनसंख्या का 18 प्रतिशत हिस्सा भारत में बसता है। ऐसे में सरकार को रास्ता खोजना पड़ेगा, भले ही वो किसी को बुरा लगे या भला।

हमें स्वीकार करना होगा कि भारत की जनसंख्या वृद्धि का मुख्य कारण अवांछित प्रजनन है। देश के अंदर १० में से 4बच्चे अनियोजित, अनायास तथा अनचाहे हैं।

इकोनोमिक सर्वे ओफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘पुत्र वरीयता’ के परिणामस्वरूप 2018 में भारत के अंदर 21 लाख अनचाही लड़कियों का जन्म हुआ। जिसका सीधा मतलब है की लिंग प्राथमिकताएँ भी जनसंख्या विस्फोट में बराबर की ज़िम्मेदार हैं।

पिछले साल जुलाई में राज्यसभा के अंदर जनसंख्या नियंत्रण क़ानून को लेकर जो खाखा पेश किया गया वो एक हद तक चीन के जनसंख्या क़ानून से मिलता जुलता था। जिसने दो से अधिक बच्चों पर सरकारी सुविधाओं से वंचित करने की बात थी। मेरी नज़र में ये देश की ग़रीब जनता पर प्रतिकूल असर डालता। हमें ऐसे किसी भी क़ानून तथा चीन की नक़ल करने से बचना चाहिए क्यूँकि चीन उसका परिणाम आजतक भुगत रहा है।

मैं मानता हूँ कि सरकारों की अपनी मजबूरी होती है, उनका हर क़दम वोट को देखकर उठता है लेकिन समाज की तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती? डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, पत्रकार तथा बुद्धिजीवी लोगों को तो इस मामले पर सकारात्मक पहल करनी चाहिए? हमें समझना चाहिए कि बढ़ती जनसंख्या आने वाली पुस्तों के लिए हानिकारक है। जब हम आदर्श समाज की बात करते हैं तो उसमें परिवार नियोजन भी शामिल है। यदि हम दुनिया के पटल पर उभरना चाहते हैं तो हमें समझना चाहिए की देश भीड़तंत्र से नहीं चल सकता।

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