रंगा सियार और भोली प्रजा

सियार ओढ़ कर नीला रंग
चले भेड़िए भेड़ के ढंग।
गये गांव को ठगने दोनों, देख खुदा भी रह गये दंग।।
-सुभद्र पापडीवाल

आपको पंचतंत्र की मशहूर कहानी, “रंगा सियार” तो याद होगी। एक धूर्त्त सियार किस तरह नीले रंग में रंगे जाने से उत्पन्न भय और रहस्य का लाभ उठाता है और शेरों पर भी तब तक रौब गांठता है जबतक उसकी असलियत की पोल नहीं खुल जाती है। भोले भाले जंगली जानवर, यहां तक कि शेर जितने ताकतवर जीव भी रंगा सियार के रहस्यमयी रंग के भ्रम का शिकार हो गए थे। यह कहानी बहुत खूबसूरती से यह समझाती है कि भ्रम और छद्म आवरण इतना ताकतवर होता है कि मनुष्य के विवेक पर भी ग्रहण लगा देता है और उसे दृष्टि भ्रम यानि delusions  होने लगते हैं। वसुधैव कुटुंबकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनां के दर्शन पर टिकी भारत की संस्कृति ऐसे बहरूपिए और हिंसक दैत्यों की पहचान कर उनसे निजात पा सकती है ?

ये जर्मनी की 24 वर्षीय सैलिन गोरान हैं। Independent, secular, liberal, progressive intellectual young leftist  नेता हैं। ये अपनी पार्टी की प्रवक्ता भी हैं, जो जर्मनी में शान्तिदूत रिफ्यूजियों यानि इस्लामिक देशों से आए शरणार्थियों को बसाने की पक्षधर हैं। इनकी महानता और दरियादिली की कोई बराबरी नहीं कर सकता। आपको मेरा पिछला आलेख “वाकई सैक्यूलरिज्म या स्टाकहोम सिंड्रोम” स्मरण होगा। उसी कड़ी में इस आलेख को देखिए।

Figure 1 स्त्रोत: वाशिंगटन टाइम्स

ये मोहतरमा अपनी कार्य योजना यानि Agenda के प्रति इतनी समर्पित हैं, या इनका Indoctrination इस हद तक हो चुका है कि जब इनके प्रिय उन्ही शान्तिदूत रिफ्यूजियों में से 3 ने एक दिन इन्हें पकड़कर इनका सामूहिक बलात्कार कर दिया, तो मोहतरमा ने पुलिस में जाकर एक शिकायत दर्ज करवाई कि कुछ जर्मन नागरिकों ने उनके साथ जोर-जबरदस्ती की वारदात को अंजाम दिया है।

मोहतरमा ने सच इसलिए नहीं बताया क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं सत्य सामने आने से शान्तिदूत रिफ्यूजियों के प्रति स्थानीय जर्मन नागरिकों में द्वेष की भावना न घर कर जाए, और वे शान्तिदूत रिफ्यूजियों को जर्मनी में बसाने का विरोध करना न शुरू कर दें, इसीलिए इन्होंने स्वयं के बलात्कारी शांतिदूतों को बचाने हेतु अपने ही देश के अपने ही साथी जर्मन नागरिकों पर झूठा आरोप लगा दिया।

इस त्याग दरियादिली एवं समर्पण की प्रतिमा मोहतरमा के मित्रों को जब सच्चाई पता चली तो उन्होंने इन महान liberal मैडम को बताया कि उसी क्षेत्र में कुछ और जर्मन महिला के साथ भी शांतिदूत रिफ्यूजियों ने बलात्कार किये थे।

शांतिदूतों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इन मोहतरमा के साथ वहां के राजनीतिज्ञ, अनेकों एन जी ओ के कार्यकर्ता और मीडिया के लोग भी जुडे हुए थे जिन्होंने इस घटना से देश की जनता का ध्यान हटाने की भरपूर कोशिश की। तथ्यों को देखने से यह सच साबित भी हो जाता है। इन मोहतरमा ने पुलिस में जो रिपोर्ट लिखवाई थी वो “बलात्कार की नहीं बल्कि बैग छीनने” की थी। जबकि शासन, प्रशासन और मीडिया सच जानता था।

खैर, उन मित्रों ने चेतावनी दी और भर्तस्ना की और दबाव बनाया कि उसे पुलिस को सच बताना चाहिए अन्यथा ये घटनाएं ऐसे ही चलती रहेंगी। मजबूरी में मैडम ने सच बोला।

अब इस एक घटना से आप वामपन्थियों की धूर्तता का अनुमान लगा सकते हैं कि ये लोग अपने कुत्सित षड्यंत्रों के लिए खुद का बलात्कर करने वालों के बचाव हेतु अपने ही देश के निर्दोष साथी नागरिकों को बदनाम करने से भी संकोच नही करते, जैसा आप अपने देश में हर दिन देख रहे हैं। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। पिछले पांच वर्षों में ही देख लीजिए। भीड़ द्वारा हत्या के दर्जनों मामलों में, दलित नाबालिग लड़कियों के बलात्कार के मामलों में और हत्याओं के मामले में भारत के इन समूहों की प्रतिक्रिया की गहराई से और तथ्यपरक छान बीन कीजिए। किन मामलों को उठाया और किन घटनाओं पर नजरें चुरा ली, शुद्ध शब्दों में चश्म फरौशी की गई। इनकी गहराई सिर्फ शासन प्रशासन तक ही मत देखिए, न्यायालयों तक देखिए और सिर्फ भारत ही नहीं अपितु सभी लोकतांत्रिक देशों में हो रही इन सभी घटनाओं का अन्वेषण कीजिए। आपको इनकी व्यापकता और गहराई का अंदाजा हो जाएगा।

सोशल मीडिया का आभार व्यक्त कीजिए कि इन घटनाओं पर आपको तथ्यों की जानकारी मिलने लगी है। वामपंथी योजनाकार अभी तक इसका तोड़ नहीं तलाश सके हैं। लेकिन एक बात साबित हो जाती है कि सोशल मीडिया के पहले के जमाने में इन बुद्धिजीवियों ने कितने बड़े बड़े हथकंडे अपनाए हैं और अपने षड्यंत्रों को अंजाम देने में सफल भी हुए हैं। आज फर्क इतना हुआ है कि इनकी कुटिलता सतह पर आ गई है।

इन वामपंथियों की धूर्त प्रकृति उन सभी देशों में एक ही मिलेगी जहां बहुत अधिक उदारता है, लोकतंत्र मजबूत है और धर्म निरपेक्षता और मानव अधिकारों की दुहाई दी जाती है। यूरोप के प्रमुख विकसित देश आज अपनी इस लचीली नीति के दुष्परिणामों की समीक्षा करने पर मजबूर हो चुके है। स्वीडन और नार्वे जैसे देशों में बलात्कार और हत्याओं की घटनाओं ने उनके सामाजिक ढांचे की नींव हिला दी और न्याय व्यवस्था की नींद उडा दी है।

इस वामपंथी मानसिकता का इकतरफा सैक्यूलर एजेंडा देखिए। इंग्लैंड के बर्मिंघम में जहां शांति दूतों की आबादी 25% से अधिक हो चुकी है वहां उन्होंने अपने क्षेत्रों में देश के किसी भी कानून को मानने से इंकार कर दिया है। शरिया अदालतों में विधिवत कार्य संचालित हो रहा है। कुल मिलाकर समानांतर शासन व्यवस्था यानि Parallel Government की ना सिर्फ घोषणा हुई है अपितु सबकुछ मध्ययुगीन अमानवीय मानसिकता के साथ संचालित भी हो रहा है। ठीक से देखिए। उसी Mainstream Media को, Political Dispensation को और खासकर इन Amnesty और Human Rights Organisations को। कहीं से कोई आवाज नहीं।

…….कुल मिलाकर वही पुरानी कहानी है। जो अधिक उदार और सहिष्णुतावादी हैं, दुष्टों का कहर उसी पर सबसे अधिक बरसना है।

भूमध्य सागर के उत्तर पश्चिम की तरफ वाले लगभग सभी देशों में लोकतंत्र कायम है। यहां मानवाधिकारों का बहुत बोलबाला है और कुछ देशों में धर्मनिरपेक्षता की पालना बहुत सख्ती से की जाती है। ये देश द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से चहुंमुखी विकास, समृद्धि और समग्र उत्थान में लगे हैं। यहां जीवन अधिक शांत, सरल और सुखद माना जाता है। उत्कृष्ट जीवन स्तर के लिए समस्त विश्व में इन देशों के प्रति आकर्षण बना रहता है।

इन्ही देशों के पडौस में मध्यपूर्व के देश हैं जहां विगत 1000 वर्षों से तथाकथित शांति और धर्म की स्थापना के लिए हिंसक संघर्ष हो रहा है। ये एक ही सोच से निकली अब्राहिमिक संस्कृतियों का समूह है जिनमें से एक समूह अब शांति स्थापना कर सर्वांगीण विकास की राह पकड़ चुका है और दूसरा समूह इस शांति को निगल जाना चाहता है।

यदि खाड़ी के 6 अमीर इस्लामिक देशों को छोड़ दें तो बचे हुए लगभग सभी 50 इस्लाम प्रभुत्व देशों में खूनी संघर्ष रोजमर्रा की बात है।

इस संघर्ष ने समस्त विश्व के सामाजिक आर्थिक ढांचे को बहुत गहरा आघात पहुंचाया है। इन इस्लामिक देशों में शिक्षा, स्वास्थ, व्यापार और उद्योग जैसे सभी विकासोन्मुखी कार्य हाशिये पर हैं। यहां मानवाधिकारों की अपेक्षा करना कल्पना से परे है। लेकिन विकसित देशों में कार्यरत मानव अधिकार संगठनों की दृष्टि में यहां सबकुछ सामान्य है। ना जाने किस दूरगामी योजना के तहत एक बहुत मजबूत वैचारिक समूह यानि Lobby बनाई गई है जो अपने आप को वाममार्गी बताती है और इसने संयुक्त राष्ट्र संघ में भी अपनी गहरी पैठ बना ली है। इस वाममार्गी समूह यानि Left Lobby का यह मानना है कि जिन देशों में लोकतंत्र मजबूत है और जहां धर्मनिरपेक्षता का प्रमुखता से निर्वहन किया जाता है केवल उन्हीं देशों का दायित्व है कि वे जिहाद समर्थक इस्लामी अतिवादियों को संरक्षण दें। इस समूह का कमाल है कि उसने बहुत पहले ही यूरोपीय संघ से शरणार्थियों के लिए खुले दरवाजे की नीति बनवा ली थी।

आप Asylum Policy of European Union एवं UNHCR के Asylum Procedures Directives को विस्तार से देखिए। Geneva Convention से लेकर Treaty of Amsterdam 1999 और Treaty of Lisbon को भी देखिए।

एक ताकतवर समूह ने मानवाधिकारों की आड़ में समस्त विश्व के देशों की जनसांख्यिकी यानि Demography में बदलाव का आधार बना लिया। सबकुछ ठीक एक दूरगामी योजना के अनुसार। आखिर कौनसे लाभ के लिए यह सबकुछ किया गया है और इसके पीछे कौन-सी शक्तियां कार्य कर रही हैं यह गहराई से अध्ययन का विषय है।

सन् 2015 – 2016 में ही स्पेन, इटली, ग्रीस, माल्टा, साईप्रस जैसे देशों में 10 लाख शरणार्थी पहुंच गए थे। ये सभी हिंसा ग्रस्त इस्लामिक देशों से आए थे। आश्चर्य इस बात का है कि इन शरणार्थियों के साथ हमेशा एक मानव तस्करों का समूह सक्रिय रहता था जिसने कभी भी इन शरणार्थियों को अन्य इस्लामिक देशों में शरण लेने के लिए प्रेरित नहीं किया। इन मानव तस्करों ने अपने ही मुस्लिम समुदाय के लोगों को लूटा भी और उनकी स्त्रियों से अनगिनत जघन्यतम बलात्कार किए लेकिन शरण मांगने के लिए सिर्फ गैर इस्लामिक देशों में ही गये। इन लुटेरों के विरोध में बोलना तो बहुत दूर, इन वामपंथी मानवाधिकारों के पैरोकारों ने उन्हीं यूरोपीय देशों के विरोध में गगनभेदी चित्कार किया जिन्होंने इन्हें शरण दी।

देखिए ये सभी रिपोर्ट।

लगभग सभी 56 इस्लामिक देशों ने अपने ही मुस्लिम भाइयों के लिए ही अपने दरवाजे बंद कर दिये। मध्यपूर्व के सभी 6 अमीर इस्लामिक देशों में कुल मिलाकर 36 शरणार्थियों को आश्रय दिया वो भी संयुक्त राष्ट्र की दखल के बाद। यहां मानवाधिकारों के पैरोकारों की, लिबरल वामपंथियों की चुप्पी गंभीर प्रश्न उठाती है। शरणार्थी टर्की से ग्रीस, मोरक्को से स्पेन जा रहे हैं। अपने नजदीकी पड़ोसियों के यहां नहीं जाना चाहते।

जब इनकी दृष्टि में इस्लाम ही शांति का अंतिम संदेश है तो ये लोग गैर इस्लामिक देशों में ही क्यों जाना चाहते हैं ?

वही योजना भारत में भी चल रही है। बुद्धिजीवियों और “लैफ्ट लिबरलों” के अनुसार तो भारत में मुस्लिम समुदाय सुरक्षित नहीं है फिर रोहिंग्या भारत में कौन-सी शांति की तलाश में आना चाहते हैं? ये लोग म्यांनमार से 2500 किमी दूर जम्मू में बसना चाहते हैं लेकिन जम्मू से 25 किमी दूर पाकिस्तान नहीं जाना चाहते हैं? इससे भी रोचक तथ्य तो यह है कि इनको बसाने वाले इन्हें घाटी में भी नहीं ले जा रहे हैं जहां इनकी धार्मिक मान्यता अधिक संरक्षित और सुरक्षित है।

यहां आकर कांनवैंट की नन से बलात्कार करते हैं क्योंकि यहां के लिबरल उसके लिए कवर फायर देने हेतु तत्पर रहते हैं।

2011 से 2017 के बीच सिर्फ सीरिया से ही 10 लाख शरणार्थी ईसाई देशों में पहुंच गए। वहां होने वाले जघन्यतम बलात्कारों की संख्या में अप्रत्याशित (सुनियोजित) वृद्धि हुई।

जर्मनी में 2015/16 के नववर्ष के उत्सव वाली रात को बड़े पैमाने पर महिलाओं के यौन उत्पीडन हुए। 2000 मुस्लिम युवकों ने 1200 महिलाओं के साथ यौन हिंसा की जिसमें 22 मुकदमे बलात्कार के दर्ज हुए हैं। जर्मनी के ही विभिन्न शहरों में यौन हिंसा के मामलों में जबरदस्त उछाल आने के बाद भी चांसलर एंजेला मर्केल को सच स्वीकार करने में बहुत मुश्किल हुई।वे किस योजना का हिस्सा रही हैं अथवा फ्रांस की Atheist सरकार एक ही संप्रदाय के लिए इतनी संवेदनशील कैसे हो जाती है ? इसी काल खंड में अमेरिका सहित समस्त यूरोपीय देशों एवं जर्मनी में भी राष्ट्रीय विमर्श वाले राजनीतिक दलों का उद्भव हुआ है। यहां तक कि इंग्लैंड में भी। स्मरण कीजिए ब्रैक्जिट पर हुए जनमत संग्रह यानि Referendum को।

जर्मनी में गठबंधन की सरकार को गिरा देने की धमकी दी गई। इसके बाद मर्केल को आव्राजन नीति यानि Immigration Policy पर चर्चा करने हेतु मजबूर किया गया। कोलोन शहर में अनगिनत बलात्कार हुए जिनमें सभी में एक ही शैली थी, महिला को घेर कर सामुहिक बलात्कार। यानि अपनी धार्मिक मान्यता की एकदम शुद्ध एवं ईमानदारी से पालना। इसी कोलोन शहर की मेयर हैनरिट रैकर ने बलात्कारों के लिए अपने ही देश की महिलाओं को जिम्मेदार ठहराया था। वहां के प्रमुख मीडिया ने इस मामले पर पूर्ण Blackout किया। सबकुछ ठीक वैसे ही जैसा हम भारत में हर रोज देखते हैं। हममें से अधिकतर यदि ऐसा मानते हैं कि राजनीतिक पाखंड हो अथवा मीडिया की दोहरी भूमिका अथवा बुद्धिजीवियों का Selective Outrage हो, यह सब सिर्फ हमारे ही देश में होता है तो वे बिल्कुल ग़लत सोचते हैं। दरअसल यह “लिबरल” समूह समस्त विश्व में अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है। बस फर्क सिर्फ इतना ही है कि भारत की लचीली और बहुत गहरी सनातन संस्कृति में ये लोग अपनी भूमिका की सार्थकता तलाश रहे हैं। भारत इनके षड्यंत्रों की सबसे बड़ी और पुरानी प्रयोगशाला है। भारत ने इस मानसिकता को वर्षों सहन किया बिना विचलित हुए। लेकिन यूरोपीय देशों में जब इस मानसिकता ने पैर पसारे तो वहां सरकारें गिरने लगी, समाज की नींव हिलने लगी और हिंसक संघर्ष का सूत्रपात हो गया है। उधर यूरोपीय देशों में एक और क्रूसेड की आहट सुनाई दे रही है।जबकि सैलिन गोरान जैसे अनगिनत किरदारों को विश्व भर में जन्म दिया जा चुका है। अकेले भारत में गोरान जैसे सैंकड़ों अभिकर्ता कार्यरत हैं।

क्या भारत की संस्कृति में इतनी क्षमता है कि वो सरलता, सहनशीलता और सहिष्णुता के बल से इन कुटिल योजनाकारों द्वारा निर्मित इस Zombie यानि ‘विवेक हीन बुद्धि-नियंत्रित’ मानवों की विशाल सेना पर विजय प्राप्त कर लेगी?

यूं तो भारत ने संसार को सहिष्णुता यानि Tolerance और करुणा यानि compassion का संदेश दिया है लेकिन दुष्टों के संहार की अपनी अप्रतिम क्षमताओं को भूला भी नहीं है।

तो क्या हम यह समझें कि भारत ने अपने वैभवशाली, गौरवशाली शौर्य गाथाओं से ओतप्रोत अतीत के स्वाभिमान को पुनः खोज लिया है?

Mr. Subhadra Papriwal is a senior political analyst, columnist, entrepreneur and President of Karuna, a non-governmental organisation which works on issues of national importance.

[1] https://myvoice.opindia.com/2019/06/vaakai-secularism-ya-stockholm-syndrome/

Figure 1 स्त्रोत: https://www.washingtontimes.com/multimedia/image/selin-gorenjpg/. 2

Figure 2 स्त्रोत: https://isgp-studies.com/immigration-the-rape-of-norway.

Figure 3 स्त्रोत: https://www.forbes.com/sites/rogerscruton/2014/08/30/why-did-british-police-ignore-pakistani-gangs-raping-rotherham-children-political-correctness/                                                                                                                                                                                                                                Figure 4 https://en.wikipedia.org/wiki/2015%E2%80%9316_New_Year%27s_Eve_sexual_assaults_in_Germany

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