कृषि प्रधान व्यवस्था का त्यौहार- बिहू

भारत विविधिता भरा देश है। जहां उत्तर से लेकर दक्षिण में प्रत्येक दिन त्यौहार होता है। भारत में व्यक्ति अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए त्यौहार मानते हैं। इसका उदहारण फसल काटने पर मनाया जाने वाले त्यौहार हैं। जब उत्तर भारत के पंजाब में लोग वैशाखी की खुशियाँ मना रहे होते हैं, तब सुदूर पूर्वोत्तर के असम में लोग हंसते गाते नाचते हुए ‘बिहू’ मनाते है।

बिहू शब्द प्राचीन काल के एक कृषि समुदाय दिमासा लोगों की भाषा से लिया गया है। ये लोग अपनी शांति और समृद्धि के लिए फसल को देवताओं को समर्पित कर देते थे। बिहू शब्द बी+शू शब्द से बना है जिसमे बि का अर्थ होता है पूछना और शू का अर्थ है पृथ्वी पर शांति और समृद्धि। एक अन्य मान्यता के अनुसार शू अर्थ होता है देना । बिशु शब्द आम भाषा में बिहू के रूप में परिवर्तित हो गया।

असम के सभी लोग जाति-पांति, ऊँच–नीच एवं सम्प्रदाय आदि के भेदभावों को भूलकर बड़े उत्साह से बिहू पर्व को मनाते हैं।असम के हरे–भरे व वर्षा से तृप्त मैदानी भागों में तीन बिहू मनाए जाते हैं, जो कि तीन ऋतुओं के प्रतीक हैं। पहला बिहू विषुव सक्रांति के दिन, दूसरा कार्तिक सक्रांति तथा तीसरा पौष सक्रांति को मनाया जाता है। इन्हें क्रमशः रोंगाली बिहू, कोंगली तथा भोगाली बिहू के नाम से जाना जाता है।

विषुव संक्रांति (जो लगभग वैशाखी दिन पड़ता है) के दिन का बिहू बहुत ही हर्षोल्लास के साथ एक सप्ताह तक भव्यता से मनाया जाता है। असमिया में इस दिन को रोंगाली बिहू या बोहाग बिहू के नाम से जाना जाता है। रोंगाली का अर्थ होता है आनंदमय होना। क्यूंकि इस समय पेड़ों और लताओं में ढेर सारे रंग-बिरंगे फूल बहुत ही सुन्दर लगते हैं तथा साथ ही पेड़ों में भी फल आने लगते है। इसलिए वसंत ऋतू के आगमन की ख़ुशी को दर्शाने के लिए यह त्यौहार मनाया जाता है। रोंगाली के पहले दिन लोग प्रार्थना, पूजा और दान करते हैं। लोग इस दिन नदियों और तालाबों में पवित्र स्नान करते हैं। लोग अपने पशुओं को नहलाकर उनकी रस्सियाँ बदलते हैं। सभी बच्चे और बड़े इस दिन नए कपडे पहनते हैं।

दूसरा बिहू कार्तिक माह में मनाया जाता है। जिसे कोंगाली बिहू या काती बिहू के नाम से जाना जाता है। कोंगाली बिहू के दिन किसी भी प्रकार के पकवान नहीं बनाये जाते हैं और आनंद भी नहीं मनाया जाता है। इसलिए इस दिन को कोंगाली बिहू कहते हैं। क्यूंकि इस बिहू के समय किसान के खलिहान ख़ाली रहते हैं। इसलिए किसान के पास धन नहीं होता। इसीलिए यह महाभोज या उल्लास का पर्व न होकर प्रार्थना व ध्यान का दिन होता है। इसलिए इसे “कंगाली–बिहू” कहते हैं। इस त्यौहार के समय धान के खेतों में माँ लक्ष्मी की प्रतिमा पर एक माह तक प्रत्येक रात दीपक जलाया जाता है। तुलसी के पवित्र पौधे को घर के आँगन में लगाकर उसे जल अर्पित किया जाता है। एक तरह से देखे तो यह पर्व हमें मितव्ययिता का सन्देश देता है

तीसरा बिहू मकर संक्रान्ति के समय जनवरी के माघबिहू के रूप में मनाया जाता है। यह त्यौहार जाड़े में तब मनाया जाता है, जब फ़सल कट जाने के बाद किसानों के आराम का समय होता है। इस अवसर पर प्रचुर मात्रा में हुई फ़सल किसान को आनन्दित करती है। इसलिए माघबिहू पर मुख्य रूप से भोज देने की प्रथा है। इस कारण से ही इसे “भोगाली बिहू” अथवा “भोग–उपभोग का बिहू” भी कहते हैं। इस त्यौहार के आरंभ में सभी लोग अग्नि देवता की पूजा करते हैं।

यह पर्व हमें अपनी कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ते हैं ताकि हम सिर्फ स्वकेंद्रित न होकर समाज केन्द्रित होकर सोचें।

भारत में कोई त्यौहार हो और उसके साथ नृत्य और संगीत न हो ऐसा संभव नहीं है। इसलिए असम के लोगों के द्वारा इस समय किये जाने वाले नृत्य को बिहू नृत्य कहते हैं । यह असम का लोकनृत्य भी है। बिहू एक प्रकार का समूह नृत्य है जिसमें महिला व पुरुष दोनों साथ साथ नृत्य करते हैं, परन्तु दोनों की भूमिकाएं अलग-अलग होती है। इस नृत्य में भारतीय परम्परागत वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है।

भारत में कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण व्यक्ति सामान्यतया खेल से दूर हो जाता है। इसलिए शायद हमारे पूर्वजों ने त्यौहारों के साथ खेल को भी जोड़ दिया, ताकि हम खेलों से दूर न हो। बिहू के दौरान भी इसी परम्परा का पालन होता है और इस दौरान हमें भारतीय खेल देखने को मिलते हैं।

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