बुलंदशहर काण्ड: वामपंथी गिरोह बी लाइक- ‘दंगे नहीं हुए यार, मज़ा आ जाता’

मेन्स्ट्रीम मीडिया, और वामपंथी प्रोपेगेंडा साइट गिरोह दो-तीन दिनों से नाराज़ दिख रहे हैं। प्राइम टाइम एंकर और स्वयं को दिन में सतहत्तर बार सर्वश्रेष्ठ और निष्पक्ष होने का अवार्ड दे चुके, पत्रकारिता के खोखले स्तंभों और प्रतिमानों के पुरोधा खासे विचलित हैं। बुलंदशहर में जो होते-होते रह गया उसके न होने की टीस आप महसूस कर सकते हैं।

इनकी नाराज़गी या इनके विचलित होने का इनकी संवेदनशीलता की जगह इनकी संवेदनहीनता से बहुत लेना-देना है। राजदीप सरदेसाई जैसे मदांध पत्रकार ने जिस तरह से पार्लियामेंट पर हुए आतंकी हमले के दिन की याद करते, और हमें दिलाते हुए, बातें की हैं, वो देखकर पत्रकारिता का एक घटिया चेहरा स्पष्ट नज़र आने लगता है।

आतंकी हमले की बात सुनकर पत्रकार को मज़ा आना, लाशों की संख्या बढ़ने पर गिद्ध की तरह खुश होना, पत्रकारिता के व्यवसाय के हिसाब से एक ‘व्यस्त दिन’ होता है, मज़ेदार नहीं। राजदीप ने वह बात सार्वजनिक रूप से स्वीकारी जो हर पत्रकार जानता तो है, लेकिन कहने की हिम्मत नहीं रखता। बाद में नेताओं की तरह ‘बयान को मरोड़ा गया’ कहकर सफ़ाई दे दी।

लेकिन यह सब कहने में राजदीप की आत्मा भी सामने आ गई। बोलते हुए आँखों में एक चमक, हमले की गम्भीरता के बीच, यह सोच लेना कि गेट बंद कर देंगे तो कोई और नहीं आ पाएगा, एक अलग स्तर की गिरी हुई सोच है, जिस पर राजदीप ने गर्व महसूस करना नहीं छोड़ा। उसकी बातों में खुशी का उछाल था, और उसका पूरा शरीर अंदर से खुश हो रहा था कि हमला हुआ, और वो वहाँ था।

लेकिन हमले के हो जाने के बाद भी उस तरह से इसकी याद करना बताता है कि पत्रकारिता की नौकरी एक तरफ, और मन में किसी संस्था, व्यक्ति या पार्टी के लिए घृणा एक तरफ। मुझे नहीं लगता कि देशभक्त होना बुरी बात है, और किसी भी नागरिक को, किसी भी देश के संसद पर हुए हमले की याद में, इस तरह की खुशी दिखाना अभिव्यक्ति के प्रतिमान स्थापित करने जैसा है।

इन लोगों को बुलंदशहर की दो मौतों पर पढ़ने और सुनने पर यही लगता है कि ये लोग निराश हैं। निराश इस बात से नहीं कि एक इन्सपेक्टर और एक युवक की मौत हुई, बल्कि इसलिए कि वहाँ कितना कुछ होने का पोटेंशियल था, जो कि नहीं हुआ।

सोचिए कि कितना कुछ हो सकता था: लाखों मुसलमानों की भीड़ जुटी थी उस इलाके में। लाखों हिन्दू भी वहीं रहते हैं। गोमांस पर हर तरह के प्रतिबंध होने के बावजूद गायें काटी गईं। आज के माहौल में गायों का कटना तो छोड़िए, उसकी ख़बर सुनकर लोग सड़क पर आ जाते हैं। उस माहौल में खेतों से गायों की हड्डियाँ मिलीं। कुछ लोगों की गाय चुराकर काट दी गई, एक लोकल साइट पर ये ख़बर है। उस आदमी की रोज़ी रोटी वही गाय थी।

ऐसे में, जबकि चुनाव होने वाले हैं, उसके बाद आम चुनाव होने वाले हैं, एक बड़ा-सा दंगा कितना ‘मज़ा आ गया’ मोमेंट ले आता इस पत्रकार गिरोह के लिए। ये घटना अखलाख हो सकती थी, मुज़फ़्फ़रनगर हो सकती थी, और हुआ क्या? बस दो मौतें? यही कारण है कि ये गिरोह बौखलाया हुआ है।

रवीश कुमार ने एक पत्र लिखा है, जिनके बारे में उन्हें पता है कि वो कहीं नहीं पहुँचेगा। पत्र लिखा है उस इन्सपेक्टर के नाम जिनकी मौत तब हुई जब एक भीड़ पर किसी ने गोली चलाई और सुमित नाम का युवक मर गया। भीड़ वहाँ अपनी गायों के ग़ैरक़ानूनी तरीके से काटे जाने की रिपोर्ट लिखवाने गई थी, फिर एक शांत भीड़ उग्र हो उठी।

इस कहानी के भी कई तरह के विवरण आए हैं। कहीं कहा गया है कि दोनों को एक ही पिस्तौल की गोली लगी है। कहीं कहा गया कि अख़लाक़ के केस की फ़ाइल वही जाँच रहे थे। कहीं कहा गया कि भीड़ ने पत्थरबाज़ी की, और वो बचाने गए, उसी में पत्थर लगनेसेमौत हुई।

फिर उसी बीच कोबरा पोस्ट की रिपोर्ट, इन्सपेक्टर की मौत को भुनाती हुई, आई कि मृत पुलिस इन्सपेक्टर ने कहा था कि अखिलेश सरकार ने अखलाख मामले में उस पर ‘मीट सैम्पल’ को बदलने का दबाव बनाया था। फ़िलहाल, पुलिस जाँच कर रही है, और एसआईटी गठित हुई है। सत्य या तो बुलंदशहर जाकर पता लगेगा, या फिर जो रिपोर्ट में आए, हम उसे सत्य मान लेंगे।

ख़ैर, रवीश जी ने पत्र लिखते वक्त एक ग़ज़ब की बात लिखी, जो पत्र के मूल भाव के विरोध में दिखती है। उन्होंने इस बात पर लिखा कि पुलिस 27 में से मात्र 3 आरोपियों को पकड़ पाई है, और उन्हें सिस्टम से कोई आशा नहीं। फिर वो आगे जो लिखते हैं, वो लाजवाब करने योग्य बात है, “यूपी पुलिस को अपने थानों के बाहर एक नोटिस टांग देना चाहिए वर्दी से तो हम पुलिस हैं, ईमान से हम पुलिस नहीं हैं।”

मेरा सवाल यह है कि पूरे पत्र में आपने जिस इन्सपेक्टर के गुणों का बखान किया है, वो भी उसी विभाग का है। चूँकि उसकी मौत उस हादसे में हो गई तो क्या वो उस विभाग के उस जेनरलाइज्ड अवधारणा से ऊपर उठ गया कि यूपी पुलिस ईमान से पुलिस नहीं है? इस बात पर अगर कोई स्पष्टीकरण आ जाता तो बेहतर होता। मैं मृत अफसर की ईमानदारी पर सवाल नहीं कर रहा, क्योंकि मेरे पास उन्हें ईमानदार या भ्रष्ट मानने के लिए कोई साक्ष्य नहीं। रवीश जी के पास होंगे, जिससे मुझे इनकार नहीं।

ऐसे पत्रकार पत्र इसी कारण लिखते ही हैं कि वो इन मौक़ों पर अपनी जजपंथी करते रहें। ये जजमेंटल लोग हैं जो हर बार प्रैक्टिकैलिटी से दूर, धुँधले दूरबीन से, दिल्ली में बैठकर ये तय कर देते हैं कि यूपी पुलिस अगर आरोपियों को नहीं पकड़ पा रही है तो पूरा डिपार्टमेंट ही निकम्मा है, सिवाय उसके जिसकी हत्या हो गई।

क्या इन्सपेक्टर की मौत एक हादसा नहीं है? और क्या ऐसे हादसे देश में हर दिन नहीं होते? पत्रकारों की मौत पर आप तब तक नृत्य नहीं करते जब तक वो गौरी लंकेश न हो! उसकी हत्या तक बाईस पत्रकारों को अलग-अलग राज्य में मार दिया गया था, आपको ख़बर भी नहीं मिली होगी। चाहे वो किसी विचारधारा का हो, हर पत्रकार की हत्या अभिव्यक्ति पर हमला है, और सीधा हमला है।

आप इस बात से क्यों अनजान बन जाते हैं कि हमारी पुलिस सिर्फ एक जगह निकम्मी नहीं है? निकम्मी से मतलब यह है कि उस पर हर तरह के दबाव होते हैं, और वो भी आप ही की तरह ‘नौकरी’ बचाने का हर प्रयत्न करता है। उसी के कारण घूस, एनकाउंटर और साक्ष्यों को मिटाने से लेकर झूठी जाँच और रिपोर्ट बनाती फिरती है।

फिर आप किस आधार पर तीन दिन में सारे आरोपियों को गिरफ़्तार करने का सवाल पूछ रहे हैं? किस केस में इतने आरोपी इतने कम समय में गिरफ़्तार हो गए थे? तीन हज़ार हत्याएँ हुई थीं, और 34 साल बाद पाँच साल की सजा मिली है इस देश की राजधानी में। सामाजिक न्याय के मसीहा चुनाव लड़ते रहे, घोटाले करते रहे और पुलिस ने कितनी बार क्या केस बनाया?

आपको, और फ़ेसबुकिया जीवनशैली जीनेवाले हर व्यक्ति को एक लत है कि उन्हें आधे घंटे में हर जाँच का परिणाम समझ में आ जाता है। इसमें आप भी हैं, मैं भी हूँ, हर आदमी है। गुस्सा करना ज़ायज है, लेकिन वास्तविकता से दूर होकर मोटिवेटेड बातें लिखना, ताकि किसी की मौत को भुना लिया जाए, ये ग़ज़ब के स्तर की नीचता है।

दंगे हो जाते तो ये गिरोह दिन भर टीवी पर चिल्लाता, गले फाड़ता और शाम में प्रेस क्लब में हैप्पी आवर में दारू गटकते हुए अपनी धूर्तता पर बात करते हुए आनंदित होता। समाज या देश से इन्हें कोई सरोकार नहीं, इनका एकसूत्री लक्ष्य है एक सरकार के ख़िलाफ़ विषवमन करना। इन्होंने अपने मतलब के लिए सामाजिक अपराधों को राजनैतिक और साम्प्रदायिक रंग दिया है। इन्होंने हिन्दुओं की भीड़ हत्या पर हमेशा चुप्पी साधी है। इन्होंने सीट के झगड़े में गोमांस डालकर घंटों प्राइम टाइम शो किया है।

इन ज़हरीली प्रजाति के घटिया लोगों की नीच बातों को सुनकर कम से कम यह तो पता चल ही जाता है कि इनकी सेलेक्टिव रिपोर्टिंग और दोहरेपन की गंध में नहाए ऐसे पत्रों के पीछे की मंशा क्या है। ये पत्रकार नहीं, गिद्ध हैं, जो ऐसी मौतों के इंतज़ार में रहते हैं। फिर ये जुटा लेते हैं तमाम विशेषण जिनमें दलित, मुस्लिम, सवर्ण, हिन्दू का ज़ायक़ा हो।

तब मरनेवाला सिर्फ़ इंजीनियर नहीं होता, वो मुस्लिम इंजीनियर हो जाता है। दंगों की रिपोर्टिंग बस तभी होती है जिसमें हिन्दू नकारात्मक दृष्टिकोण से उभारे जा सकें। बंगाल के दंगों पर इनकी रिपोर्टिंग और फ़ेसबुक पोस्ट में बंगाल की मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं आता। जब दिन भर लोग गाली देकर पूछते हैं कि इन दंगों पर क्यों नहीं लिखते, तब वो लिखते हैं कि संवेदनशील मुद्दों पर लिखने से मामला और भयावह हो सकता है।

ग़ालिब का एक शेर है, “बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे, होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे’। मतलब खुद ही ढूँढकर पढ़ लीजिएगा।

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